नये राजनीतिक समीकरण के आसार

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जम्मू-कश्मीर में लोकसभा चुनाव के पहले नए राजनीतिक समीकरण बनने की भूमिका तैयार हो गई है। 20 नवंबर को राज्यपाल द्वारा विधानसभा भंग करने के बाद यहां छह महीने के भीतर विधानसभा चुनाव कराना जरूरी है। राज्यपाल या केंद्र सरकार के लिए इस चुनाव को और अधिक समय तक आगे टालना संभव नहीं है। कानून व्यवस्था के मसले को लेकर अगर यहां विधानसभा चुनाव को आगे खिसकाने की बात सोची जाती है तो स्वाभाविक रूप से राज्य में लोकसभा के चुनाव को भी खिसकाना पड़ेगा। अभी इस बात के आसार नहीं हैं कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव को लंबे समय तक खींचना चाहेगी। यहां की दोनों प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियां पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और नेशनल कॉन्फ्रेंस परंपरागत रूप से एक-दूसरे की विरोधी होने के बावजूद पिछले दिनों कांग्रेस की मदद से मिलकर राज्य में सरकार बनाने की बात को लेकर सहमत होती दिखी थीं।

ये अलग बात है कि उनका यह प्रयास शुरुआती दौर में ही विफल हो गया। इन दोनों विरोधी पार्टियों का राजनीतिक प्रेम भी लंबे समय तक नहीं टिक सका। ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि राज्य विधानसभा को भंग किए जाने के कुछ घंटों बाद ही पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्पष्ट शब्दों में पीडीपी के साथ मिलकर अगला चुनाव लड़ने की संभावना को खारिज कर दिया। उनका कहना था कि ये संभव नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दोनों ही पार्टियां जम्मू-कश्मीर में समान राजनीतिक धरातल के लिए ही आपस में लड़ रही हैं। उमर अब्दुल्ला का यह कथन राज्य की राजनीति की वास्तविकता को ही दर्शाता है। 2014 के चुनाव में पीडीपी 28 सीट जीतकर विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, जबकि 25 सीटों के साथ बीजेपी विधानसभा की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। नेशनल कॉन्फ्रेंस को 15 सीटों और कांग्रेस को 12 सीटों पर सफलता मिली थी, वहीं सात सीटें अन्य छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के पास गई थीं।

ऐसे में अगर चुनाव पूर्व महागठबंधन की बात होती है तो पीडीपी बड़ी हिस्सेदारी की मांग कर सकती है। लेकिन ये भी सच है कि बीजेपी- पीडीपी गठबंधन सरकार के कार्यकाल के दौरान महबूबा मुμती की पार्टी, पीडीपी का जनाधार घटा है। बीजेपी द्वारा सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद तो पीडीपी में विभाजन का खतरा भी बन गया था। उसके कई विधायक अपनी अलग पार्टी बनाने की कोशिश में थे। सच तो ये है कि विधानसभा भंग होना पीडीपी और उसकी नेता महबूबा मुμती के लिए बड़े राहत की बात साबित हुई। अभी जैसे राजनीतिक हालात हैं, उसमें यदि बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन बनता भी है, तो पीडीपी के लिए अधिक सीटें छोड़ने के लिए न कांग्रेस और न ही नेशनल कॉन्फ्रेंस तैयार हैं। पिछले कुछ सालों के दौरान नेशनल कॉन्फ्रेंस का जनाधार बढ़ा है। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर में नए राजनीतिक समीकरण बनने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। राज्य के घाटी क्षेत्र में मतदाता राष्ट्रीय पार्टियों की जगह पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के पक्ष में जाना ज्यादा पसंद करते हैं, जबकि जम्मू और लद्दाख क्षेत्र में राजनीतिक स्थिति अलग है। वहां बीजेपी एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति है। ऐसे में अधिकतम लाभ पाने के लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन कर सकती है।

कांग्रेस का एजेंडा सिर्फ बीजेपी को सत्ता से दूर रखने का है। जम्मू-कश्मीर कांग्रेस के प्रमुख नेता गुलाम नबी आजाद भी नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ गठबंधन करने के पक्षधर हंै। अगर दोनों के बीच गठबंधन हो जाता है, तो विधानसभा चुनाव में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बन सकती है। वहीं कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस से राज्य की छह लोकसभा सीटों को लेकर भी अपने हक में सौदेबाजी कर सकती है।

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