नई सरकारें, कई चुनौतियां

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साल का अंतिम पखवाड़ा देश के पांच राज्यों में वहां बनी सरकारों और उनके सामने मौजूद चुनौतियों पर विचार का था। खास यह कि ये चुनौतियां न केवल इन राज्यों के लोगों के लिए, बल्कि कई नेताओं और उनकी पार्टियों के भविष्य के लिए भी अहम होने वाली हैं।

पिछला पखवाड़ा पिछले साल के अंतिम दिनों वाला भी था। इस पखवाड़े में बहुत कुछ हुआ, पर सर्वाधिक चर्चा पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से आये परिणाम और उससे बनने वाली नई सरकारों की थी। पखवाड़ा ऐसा गुजरा, जिसका असर आगे भी बना रहेगा। जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए, उनमें से एक यानी तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव की पार्टी ने अपनी सत्ता बरकरार रखी। दूसरे राज्य मिजोरम में कांग्रेस की हार के साथ पूर्वोत्तर से यह पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। सबसे अधिक उलटफेर हिन्दी हृदय कहे जाने वाले क्षेत्र के तीन राज्यों में हुआ। तीनों जगह भारतीय जनता पार्टी सरकार में थी। परिणाम ने मतदान पूर्व के सारे विश्लेषण धराशायी कर दिए। ऐसा नहीं कि किसी सर्वेक्षण ने तीनों जगह भाजपा के सत्ता से बाहर होने की बात नहीं कही थी। फिर भी जिस छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री रमन सिंह की लोक कल्याणकारी योजनाओं और नक्सल समस्या पर प्रभावी नियंत्रण की शुरुआत के कारण उनकी वापसी तय मानी जा रही थी, उसी राज्य में भाजपा बुरी तरह हार गई। राजस्थान में हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन के आधार पर सरकार बदलना तय माना जा रहा था, पर वहां कांग्रेस जैसे-तैसे ही सरकार में आ पायी। मध्य प्रदेश में भी मामा के नाम से लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में पार्टी की ऐसी हार की कल्पना नहीं की गई थी। बहरहाल, सत्ता बदलने के बाद अब इन राज्यों में नई सरकारों के सामने मौजूद चुनौतियों की चर्चा हो रही है।
कुछ मसले ऐसे हैं, जो प्राय: इन पांचों राज्यों में हैं। सभी पांच मुख्यमंत्रियों को पांच महीने के अंदर ही होने वाले लोकसभा चुनाव में न सिर्फ अपनी साख कायम रखनी है, बल्कि अपनी पार्टी अथवा गठबंधन के लिए अधिक सीटें हासिल करने की चुनौती भी है। इस लिहाज से तेलगांना और मिजोरम भले ही छोटे राज्य हों, वे भी चर्चा में रहेंगे। तेलंगाना के नये मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) तो भाजपा और कांग्रेस से अलग फेडरल फ्रंट के नाम पर गठबंधन की कोशिश में निकल पड़े हैं। अभी तक एनडीए के साथ माने जाने वाले मुख्यमंत्री राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका तय करने में कहां तक सफल होंगे, समय बताएगा। जिन ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और मायावती सरीखे नेताओं से वह उम्मीद पाले हैं, वह खुद की बड़ी छवि वाले हैं।
मिजोरम में मुख्यमंत्री जोरामथांगा को मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरे जेडपीएम और राज्य की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति में चर्च की दखल से सचेत रहना पड़ेगा। फिर जोरामथांगा एनडीए में रहने की इच्छा जताने के बावजूद सरकार में भाजपा को शामिल करने से परहेज कर रहे हैं। यह उनकी क्षेत्रीयता प्रधान छवि को ही बढ़ावा मिलने की तरह है। राज्य हित और स्वयं की छवि के लिए उन्हें इन हालात से उबरना होगा।
हिन्दी पट्टी के तीन राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों की छवि किसी गठबंधन अथवा क्षेत्रीय चेहरे वाली नहीं है। फिर भी इन राज्यों में जीत के साथ उन्हें अपनी पार्टी के लिए अपने राज्य में सचेत रहना होगा। इन प्रदेशों में कांग्रेस की जीत ने इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। सच्चाई यह है कि ये राज्य विधानसभा चुनाव के पहले से ही कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी से दो-चार होते रहे हैं। इसके संकेत मुख्यमंत्री तय करते समय राहुल गांधी के ट्वीट से ही मिल गये थे। जब तीनों राज्यों के मुख्यमंत्री तय हो गये तो कांग्रेस अध्यक्ष ने तीन अलग-अलग ट्वीट कर मुख्यमंत्री पद के चयनित नेता और उसके प्रतिस्पर्धियों के साथ अपनी तस्वीरें डालीं। राहुल गांधी इन ट्वीट में राजस्थान के अशोक गहलोत और सचिन पायलट के साथ, मध्य प्रदेश के कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ और छत्तीसगढ़ के भूपेश बघेल और सीएम पद के अन्य दावेदारों के साथ दिखाई दिए। ऐसा नहीं कि राहुल के साथ में सभी के फोटो आए और उनमें जादू की तरह एका हो गई। कम से कम दो राज्य, मध्य प्रदेश और राजस्थान में मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद भी निर्दलीय और सपा-बसपा की नाराजगी के साथ कांग्रेस का आंतरिक अंसतोष भी बढ़ा है। राजस्थान में सचिन पायलट को भले उप मुख्यमंत्री बनने पर राजी कर लिया गया हो, उनके समर्थक गुर्जर जाति में भारी असंतोष है। इस समुदाय को अपने नेता के लिए सीएम पद से कुछ भी कम पर राजी करना मुश्किल माना गया। अब सचिन पायलट से अधिक जिम्मेदारी मुख्यमंत्री गहलौत की है कि वह पायलट समर्थकों की नाराजगी भी दूर करें।
असंतोष मध्य प्रदेश कांग्रेस में भी कम नहीं है। कमलनाथ को मुख्यमंत्री घोषित करते ही ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक विधायक गुस्से में थे। नयी परिस्थितियों में समर्थक विधायक अपने ‘महाराज’ के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से कम पर तैयार होते नहीं दिख रहे। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह गुट के दबाव के चलते उनके पुत्र को पहली बार विधायक बनने के साथ ही मंत्री पद दे दिया गया। उधर गांधी परिवार के करीबी मोतीलाल वोरा के पुत्र को भी कोई जिम्मेदारी नहीं मिलना नये मुख्यमंत्री परेशान कर सकता है। एक बड़ी मुश्किल यह भी आयी कि सीएम पद की शपथ लेने के दिन ही दिल्ली के सिख हत्याकांड में सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा मिली। इस पर अकाली दल की मांग के साथ इन्ही मामलों में कमलनाथ के आरोपी होने की चर्चा भी चल पड़ी। किसानों की कर्जमाफी और रोजगार की संभावनाओं पर बोलते हुए कमलनाथ ने यह कहकर भी आफत मोल ली कि मध्यप्रदेश के रोजगार पर यूपी-बिहार के लोग कब्जा कर लेते हैं। निश्चित ही कांग्रेस जैसी पार्टी के लिए लोकसभा चुनाव में कमलनाथ का विवादों में घिरना परेशानी का सबब बन सकता है।
छत्तीसगढ़ में मंत्रिपरिषद के विस्तार के बाद भी पार्टी में असंतोष कम नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री पद के दावेदार चरणदास महंत को विधानसभा अध्यक्ष बनाकार संतुष्ट करने की कोशिश की गई है। उधर, राज्य में सबसे अधिक मत से चुनाव जीतकर आने वाले पूर्व मंत्री अमितेष शुक्ल को फिर से मंत्री नहीं बनाये जाने पर खुद शुक्ल ने अपने को गांधी परिवार का करीबी बताकर असंतोष जताया है। दो तिहाई से भी अधिक सीटों के साथ सरकार बनाने वाले भूपेश बघेल के लिए आंतरिक असंतोष के अलावा राज्य की सबसे बड़ी नक्सल समस्या से जूझना होगा। डॉ. रमन सिंह की सरकार के रहते नक्सलियों को एक क्षेत्र विशेष में दुबकने पर मजबूर होना पड़ा था। चर्चा है कि रमन सिंह की हार सुनिश्चित करने में ये नक्सली भी थे। प्रमाण के तौर पर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कांग्रेस की जीत का हवाला दिया जा रहा है।
तीनों राज्यों में नई सरकार ने किसानों के कर्ज माफ करने के वादे पर अमल शुरू कर दिया है। सबसे पहले काम कर्ज-माफी पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। फिर भी राज्यों को ध्यान रखना होगा कि राज्य के खजाने पर इसका बोझ न बढ़े। ऐसा होने से विकास के कार्यों की रμतार कम हो सकती है। कृषि लागत, बीज, सामाजिक सुरक्षा और अन्य मुश्किलें भी हल करनी होंगी। राज्यों में एक और बड़ी चुनौती बेरोजगारी से निपटने की है। बेरोजगारी भत्ता देना भी मुश्किल में डाल सकता है। मुश्किलें और भी हैं। राज्यों में नेताओं के उभार के साथ उन्हें चुनौतियों की खाई पार करनी होगी। तभी वह खुद और अपनी पार्टी के लिए कुछ करते हुए दिखाई दे सकते हैं।

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