छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल‘बदलापुर’ की राजनीति का मर्म?

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भा री-भरकम बहुमत के साथ सत्ता में आयी कांग्रेस ने बड़ी तेजी के साथ बड़े पैमाने पर प्रशासनिक फेर बदल किए हैं। भाजपा सरकार द्वारा की गई तमाम नियुक्तियों को सिरे से रद्द कर दिया गया है। इससे नेतृत्व के सामने समस्या खड़ी हो गई है कि उनके लिए जोड़-तोड़ में जुटी दावेदारों की भीड़ में से किस-किस को संतुष्ट किया जाए? निर्वाचित 68 विधायकों में से मुख्यमंत्री सहित 13 मंत्री ही शपथ ग्रहण कर सके हैं। अविभक्त मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की प्रथम कांग्रेस सरकार में मंत्री रह चुके अनेक वरिष्ठ नेता मंत्री पद के लिए दबाव बना रहे हैं। लोकसभा चुनाव सामने होने के कारण उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। वर्तमान संवैधानिक प्रावधानों के तहत मंत्रियों की संख्या बढ़ाना संभव नहीं है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार एक अशासकीय संकल्प लाकर मंत्रियों की संख्या निर्वाचित विधायकों के 20 प्रतिशत तक बढ़ाना चाहती है। इसमें सबसे बड़ा व्यवधान केंद्र की स्वीकृति प्राप्त करने में आ सकता है। बस्तर के झीरम घाटी क्षेत्र में नक्सलियों द्वारा 25 मई 2013 को की गई 29 कांग्रेस नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की हत्या के षड्यंत्र को सामने लाने के लिए गठित विशेष जांच समीति ने अभी अपना कार्य आरंभ ही किया था कि उसके एक सदस्य को लेकर आपत्ति खड़ी कर दी गई है। उक्त अधिकारी पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए गए थे। उन्हें तीन अल्प वयस्क लड़कों को जंजीरों में बांधकर रखने की खबरें मीडिया में खूब उछली थीं। वस्तुत: झीरम हत्याकांड एक बहुत ही पेचीदा प्रकरण है जिसमें कुछ राजनेताओं के लिप्त होने के आरोप भी उसी समय लगाए गए थे। प्रश्न उठाया गया था कि कांग्रेस के उस यात्रा दल में नक्सलियों का एक मुखबिर भी था। आखिर वह मुखबिर कौन था?
भूपेश बघेल सरकार ने नक्सल समस्या के समाधान के लिए आदिवासियों का विश्वास जीतने की पहल की है। इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इसी क्रम में उनकी सरकार ने सैकड़ों ऐसे आदिवासियों को रिहा करने की पेशकश की है जो जेलों में विचाराधीन बंदियों के रूप में हिरासत में हैं। तर्क यह दिया गया कि चूंकि उनके पास वकील करने का सामर्थ्य नहीं था इस लिए वे अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर सके। सरकार की इस पहल पर भी अंतिम निर्णय अदालत ही कर सकती है। ऐसा कर पाना तत्काल संभव नहीं हो पाएगा। राज्य में लगभग चार दशक पुरानी नक्सल समस्या का समाधान एक बड़ी चुनौती है। भाजपा को यह समस्या कांग्रेस सरकारों से विरासत में मिली थी। आंतरिक सुरक्षा के विशेषज्ञ और बीएसएफ के पूर्व डीजी प्रकाश सिंह का मानना है कि प्राप्त ताजा संकेतों के अनुसार नक्सलियों के तार उत्तर-पूर्व के राज्यों में सक्रिय चरमपंथियों के साथ जुड़ने की आशंका पैदा हो गई है। यदि ऐसा होता है तो वह बहुत खतरनाक मोड़ ले सकती है। वस्तुत: यह समस्या तभी समाप्त हो सकेगी जबकि उन कारणों का भी निवारण किया जाए जिनसे यह समस्या उत्पन्न हुई थी।
लवादी चरमपंथियों की अघोषित राजधानी बने हुए छत्तीसगढ़ के बस्तर में सुरक्षा बल पिछले कुछ वर्षों में निरंतर हावी होते जा रहे थे। बड़ी संख्या में नक्सली नेताओं सहित उनके हार्डकोर लड़ाकुओं को मारा जा चुका है। फिर भी उनका समूल नाश तब तक संभव नहीं जब तक कि प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छ और निष्पक्ष प्रशासन तंत्र विकसित न कर लिया जाए। दुर्भाग्य से अब तक ऐसा संभव नहीं हो पाया है। स्वयं प्रशासनतंत्र, पुलिस और राजनीति में जो निहित स्वार्थ विकसित हो चुके हैं उनको समाप्त करना अत्यंत दुष्कर है। बड़े अफसरों द्वारा अपने रिश्तेदारों के नाम से खनिज संपदा के दोहन का करोबार किए जाने की जानकारी भी सामने आयी है। इससे आदिवासी का भरोसा शासन और प्रशासन से टूटता है। कांग्रेस ने जिस दम खम से बहुचर्चित ‘नान‘ घोटाले की जांच के आदेश जारी किए हैं उनसे बड़ी राजनीतिक हलचल पैदा हुई है। यह जांच सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से गरीबों को बांटे जाने वाले चावल में कुछ बड़े अधिकारियों की मिली भगत से हजारों करोड़ के घोटाले के आरोप के बारे में भाजपा के शासनकाल में ही शुरू हो चुकी थी। लेकिन वह किसी ठोस अंजाम तक नहीं पहुंच पायी। अब कांग्रेस सरकार द्वारा इसमें कुछ बड़े लोगों के नाम उछाले जाने पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ.रमनसिंह ने कहा है कि ‘बदलापुर की राजनीति’ चल निकली है। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री एवं अध्यक्ष संचार विभाग शैलेश नितिन त्रिवेदी ने कहा कि बदला तो चुनावों में जनता ने ही ले लिया है। हमारे लिए वक्त बदले का नहीं बदलाव का है। █

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