चर्च के आगे चुनाव आयोग बेबस!

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मिजोरम का चुनाव अन्य राज्यों के चुनावों से बिल्कुल ही अलग है। यहां के राजनीतिक दल वही करते हैं जो स्थानीय चर्च कहता है। यहां चुनाव आयोग के नियम नहीं, बल्कि चर्च द्वारा बनाए गए मिजो पीपुल्स फोरम (एमपीएफ) द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार चुनाव में सभी राजनीतिक दल और उम्मीदवार कार्य कर रहे हैं।

मिजोरम में 28 नवंबर को मतदान होना है। राजधानी आइजोल समेत पूरे राज्य में चुनावी गहमागहमी दिख रही है। यहां का चुनाव अन्य राज्यों के चुनावों से बिल्कुल ही अलग है। यहां के राजनीतिक दल वही करते हैं जो स्थानीय चर्च कहता है। यहां चुनाव आयोग के नियम नहीं, बल्कि चर्च द्वारा बनाए गए मिजो पीपुल्स फोरम (एमपीएफ) द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार चुनाव में सभी राजनीतिक दल और उम्मीदवार कार्य कर रहे हैं।
यथावत को दिए गए एक साक्षात्कार में डावरपुई पास्टर बिअल के पास्टर रेव आर लालचांगलियाना कहते हैं कि एमपीएफ ने चुनाव के लिए जो शर्तावली तैयार की है, उस पर भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों ने हस्ताक्षर किए हैं। यदि कोई दल या उम्मीदवार इस शर्तावली में वर्णित प्रावधानों का उल्लंघन चुनाव के दौरान करता है, तो उसका सामूहिक बहिष्कार किया जाएगा। पास्टर का कहना है कि हम लोगों को बाइबिल का उपदेश पढ़ाते हैं। यहां चुनाव में कोई भी हिंसा नहीं होती है। देश में सबसे अधिक शांतिपूर्ण तरीके से मतदान मिजोरम में ही होता है। सबसे अधिक मतदान भी यहीं होता है। एमपीएफ की शर्तावली के अनुसार कोई भी उम्मीदवार चुनाव में 30 से अधिक झंडे, पोस्टर, बैनर आदि नहीं लगा सकता है। न लाउडस्पीकर आदि का ही उपयोग कर सकता है। चुनावी सभाएं भी आयोजित नहीं की जा सकती हैं। मतदाता के घर जाकर उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार करना होगा। इस दौरान उस दल के बड़े नेता को साथ मौजूद रहना होगा। पार्टी का आम कार्यकर्ता घर-घर जाकर चुनाव प्रचार नहीं कर सकता है। वहीं, इस दौरान एमपीएफ का एक प्रतिनिधि भी साथ होना आवश्यक है।

यह चर्च की शर्तावली है। इस पर सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने हस्ताक्षर किया है।

पास्टर का कहना है कि वोटों की खरीद बिक्री न हो, इसलिए ऐसी व्यवस्था की गई है। वहीं साफ तौर पर यह चेतावनी दी गई है कि कोई भी उम्मीदवार या राजनीतिक दल मतदाता की खरीद बिक्री नहीं कर सकता है। चंदा नहीं ले सकता है। सभी राजनीतिक दल अपना चुनावी घोषणा पत्र एमपीएफ को दे चुके हैं। रविवार को चर्च में इस पर चर्चा की जाती है।
चुनाव में चुनाव पर्यवेक्षक का कार्य भी चर्च करता है। चुनाव के दौरान सुरक्षाबलों, सैनिक-अर्धसैनिक बलों आदि की तैनाती करने से भी मना किया गया है। मतदान केंद्रों पर राजनीतिक दलों का पोलिंग एजेंट नहीं रह सकता है। सारा कार्य एमपीएफ द्वारा किया जाएगा। यहां तक कि मतदान केंद्रों पर आवश्यकता होने पर चाय की व्यवस्था भी चर्च द्वारा की जाएगी। चर्च के संगठन एमपीएफ की सभी शर्तावली मानने को राजनीतिक दलों को बाध्य होना पड़ेगा। सभी दलों ने हस्ताक्षर किए हैं।
स्पष्ट है कि मिजोरम में चुनाव चर्च के पर्यवेक्षण में करवाया जा रहा है। यहां चुनाव आयोग चर्च के आगे घुटने टेककर खड़ा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा चुनावी गतिविधियां को देख कर लगाया जा सकता है। चुनाव आयोग के हस्तक्षेप को सीधे मिजो अस्मिता से जोड़कर आयोग को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया गया है। 1997 में रियांग (ब्रू) जनजाति के कथित उग्रवादी संगठन द्वारा एक मिजो फॉरेस्ट गार्ड की हत्या का मामला इतना तूल पकड़ा कि मिजोरम के सभी रियांग लोगों को मिजोरम छोड़कर पड़ोसी राज्य त्रिपुरा में जाकर शरण लेनी पड़ी। आज भी वे त्रिपुरा के छह शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। केंद्र सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद रियांग मिजोरम नहीं लौट पा रहे हैं। चुनाव में रियांग शरणार्थी शिविरों में रहने वालों को वहां से वोट नहीं देने से संबंधित आदेशों के कारण मिजोरम के गृह विभाग के प्रधान सचिव एल चुआऊंगो को चुनाव कार्य से अलग करने के चुनाव आयोग के आदेश को मिजो अस्मिता से जोड दिया गया है।
ऐसा आदेश देने वाले मिजोरम के मुख्य चुनाव अधिकारी एसबी शशांक को 72 घंटे के अंदर मिजोरम छोड़ देने का अल्टीमेटम दिया गया। 72 घंटे का अल्टीमेटम की मियाद पूरी होने के बावजूद शशांक के मिजोरम में बने रहने के विरोध में एनजीओ कोआॅर्डिनेशन कमेटी के बैनर तले यंग मिजो एसोसिएशन समेत मिजोरम के दर्जनों संगठनों के कार्यकर्ता राज भवन का घेराव करने पहुंच गए।
एनजीओ कोआर्डिनेशन कमेटी तथा यंग मिजो एसोसिएशन के प्रमुख वनलालरूआता समेत अनेक संगठनों के वक्ताओं ने भारत सरकार को धमकी दी कि यदि इसी प्रकार केंद्र सरकार की दखलअंदाजी मिजोरम में चलती रही तो उनके लिए दक्षिण पूर्व एशिया के देशों का द्वार खुला हुआ है। कई वक्ताओं ने फिर से हथियार उठाने की धमकी तक दे डाली। मिजोरम के कोलासिब के जिला उपायुक्त कार्यालय को जला दिया गया।
इन वक्ताओं के विरुद्ध कार्रवाई करने की बात तो दूर, चुनाव आयोग ने घुटने टेक दिए। आखिरकार शशांक को मिजोरम छोड़कर बैरंग लौट जाना पड़ा। चाहे वह कोई भी राजनीतिक दल हो या मिजोरम सरकार का अधिकारी- सभी एक ही सुर में बात करते हैं। चुनाव आयोग की आचार संहिता और शर्तों को मिजो अस्मिता से जोड़ लिया जाता है। भारत में लोकतंत्र है और यहां कानून का राज है, यह गलतफहमी पूर्वोत्तर के तीन ईसाई बहुल राज्यों मिजोरम, नगालैंड और मेघालय में जाकर दूर हो जाती है। हालांकि, राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी शशांक के मिजोरम छोड़ने के बाद यहां सब कुछ सामान्य हो गया है। चुनाव आयोग द्वारा मिजोरम के चुनाव प्रभारी सुदीप जैन के नेतृत्व में एक टीम भेजी गई है। इसमें चुनाव आयोग के सचिव एसबी जोशी, झारखंड के मुख्य चुनाव अधिकारी एल खिआंगटे तथा मिजोरम की अतिरिक्त चुनाव अधिकारी सुश्री लाजारमावी शामिल हैंं। इनमें से दो अधिकारी मिजो हैं।
इसी बीच चुनावी उथल-पुथल जारी है। जहां मिजोरम विधानसभा के अध्यक्ष हिफेई समेत अन्य दो विधायकों के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद भाजपा की स्थिति चुनाव में मजबूत हुई है।
वहीं, भाजपा छोड़कर मिजो नेशनल फ्रंट एमएनएफ में शामिल हुए भाजपा के प्रखंड स्तर के दो नेता यह प्रचार कर रहे हैं कि वे मिजो अस्मिता के मुद्दे पर भाजपा छोड़कर एमएनएफ से चुनाव लड़ रहे हैं। साथ ही वे यह भी दुष्प्रचार कर रहे हैं कि चुनाव में भाजपा प्रत्येक उम्मीदवार को 50-50 लाख रुपये बांटने के लिए दिये हैं। एमएनएफ का दावा है कि राज्य में उसकी सरकार बनने जा रही है। कांग्रेस 10 सीटों पर और भाजपा दो सीटों पर सिमट रही है।
वहीं, राज्य की सत्तारूढ़ कांग्रेस यह प्रचारित कर रही है कि एमएनएफ और भाजपा का अंदरूनी गठजोड़ है। एनएमएफ भाजपा का मुखौटाभर है। राज्य में कांग्रेस की ही सरकार बनेगी। इधर चार स्थानीय दलों को मिलाकर तैयार किया गया जोरम पीपुल्स मूवमेंट जेडपीएम क्षेत्रीयता के मुद्दे को हवा देकर मिजो लोगों को भावनात्मक रूप से उत्तेजित कर वोट लेने की राजनीति करने में लगी हुआ है।

 

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