चर्च की छाया में सरकार

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मिजोरम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गयी। मिजो नेशनल फ्रंट को 40 में से 26 सीटों के साथ बहुमत मिला। जोरामथंगा के नेतृत्व में सरकार भी बनी लेकिन ईसाई रीति-रिवाजों की छाया में शपथ ग्रहण हुआ। सरकार के कामकाज में ईसाइयत की छाया देखने को मिल रही है। राज्य में 85 फीसद जनसंख्या इसाई समुदाय की है।मिजोरम जाने पर ऐसा सहज ही महसूस होता है कि यहां वेटिकन सिटी की तरह चर्च का शासन चलता है। चुनाव के दौरान चुनाव आयोग से ऊपर चर्च द्वारा बनाए गए मिजो पीपुल्स फोरम (एमपीएफ) के नियम प्रभावी होते देखे गए। चुनाव के दौरान चाहे वे उम्मीदवार होंं या मतदान कर्मी- सभी चर्च की निगरानी में कार्य करते देखे गए। चुनाव प्रचार के दौरान चर्च के प्रतिनिधि जनप्रतिनिधियों के साथ साये की तरह बने रहे। चाहे वह भारतीय जनता पार्टी की चुनावी सभा हो या फिर कांग्रेस की- सभी सभाएं चर्च के बनाए गए नियमों के अनुसार ही आयोजित की गयीं। चुनाव में चर्च के फरमान के आगे चुनाव आयोग की कुछ भी नहीं चली। भारतीय प्रशासनिक सेवा एवं भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी चर्च के सामने पंगु बने देखे गए। चर्च और चर्च द्वारा बनाए गए संगठनों का पूरा दबदबा चप्पे-चप्पे पर देखा गया। यहां तक कि मिजोरम के मुख्य चुनाव अधिकारी एसबी शशांक को इन संगठनों के दबाव की वजह से मिजोरम छोड़कर दिल्ली वापस लौटना पड़ा। वह भी इसलिए कि चुनाव से संबंधित कार्यों में वे हस्तक्षेप कर रहे थे। उम्मीद की जा रही थी कि नई सरकार के गठन के बाद मिजोरम में संविधान का राज कायम होगा। लेकिन, जोरामथंगा की सरकार तो पूर्ववर्ती सरकारों से दो कदम आगे ही चल रही है। मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने से पूर्व ही उन्होंने जिस प्रकार ‘चर्च शरणम गच्छामि’ का ट्रेलर दिखाया- उसे देखकर पूरे देश में प्रतिक्रिया हुई। सरकार गठन के बाद तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि ‘गॉड’ ने उन्हें इसलिए सरकार बनाने में मदद की है क्योंकि वे ऐसी मिशनरियां बनाएं जो ईसा मसीह के आदर्शों पर आधारित व्यवस्था बनाने के लिए कार्य करें। उन्होंने कहा कि वह समय आ गया है जब हमें अपने मिशन को पूरी तरह से लागू करना है।

जोरामथंगा का राजनीतिक इतिहास नफरतों से पूरी तरह भरा रहा है। मिजो नेशनल फ्रंट नामक उग्रवादी संगठन बनाकर जिस प्रकार उनके नेतृत्व में गैर मिजो एवं गैर ईसाई लोगों के साथ अत्याचार हुआ- वह इतिहास के पन्नों में दर्ज है। सन 1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मिजो समझौता करके रही सही कसर भी पूरी कर दी। मिजोरम को भी नागालैंड और मेघालय की तरह विशेष दर्जा वाला राज्य बना दिया गया। असम का लुसाई हिल्स आॅटोनोमस काउंसिल क्षेत्र जब मिजोरम राज्य बना तो बाहरी लोगों को काफी शर्मनाक तरीके से वहां से मारपीट कर भगाया गया। इसका ज्वलंत उदाहरण रियांग (ब्रू) जनजाति है। इस जनजाति की पूरी आबादी अपनी जान बचाकर पड़ोसी राज्य त्रिपुरा में चली गई। वहां आज भी वे शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। चकमा जनजाति के लोग कई दशकों तक रहने के बाद भी विदेशियों की तरह माने जा रहे हैं।

जोरामथंगा के पिछले 10 वर्षों के शासन काल (कांग्रेस से पहले) का भी इतिहास कुछ इसी प्रकार से नफरतों से भरा हुआ रहा है। बाहरी लोगों के प्रति अत्याचार एवं उनके अधिकारो का हनन यहां की सामाजिक मान्यता बन गई है। ईसाइयत का एक ऐसा जाल बुन कर रख लिया गया है जिसमें सभी को फंस जाना पड़ता है। क्या यह इसी प्रकार चलता रहेगा? क्या कभी मिजोरम, मेघालय, नगालैंड जैसे राज्यों में भारत के संविधान का शासन स्थापित हो सकेगा? क्या इन्हें इसाई राज्य घोषित कर देने भर से भारत सरकार की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है? यह एक बड़ा सवाल है। यदि इस व्यवस्था में बदलाव नहीं लाया गया तो आने वाले दिनों में भारत के लिए मिजोरम एक सिरदर्द साबित होगा। सर्वोपरि तो यह कि मुख्यमंत्री जोरामथंगा ने भारतीय संविधान के तहत पद और गोपनीयता की शपथ ली है। इसलिए उन्हें संविधान के प्रावधानों को लागू करना चाहिए।

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