गुजरते साल के राजनीतिक खिलाड़ी

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नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में ये साल राजनीतिक परिदृश्य में तेज बदलाव का गवाह बना है। इसका असर 2019 में गठित होने वाली नई लोकसभा के स्वरूप पर भी पड़ेगा। कांग्रेस को दिसंबर 2017 में राहुल गांधी के रूप में अपना नया अध्यक्ष मिला था। लेकिन अध्यक्ष के रूप में उनका काम 2018 में ही नजर आया। इसी साल एनडीए के घटक दल टीडीपी ने अपना रास्ता अलग कर कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों के साथ कदमताल करना शुरू कर दिया। बिहार में लालू यादव की पार्टी आरजेडी ने जेडीयू के साथ गठबंधन तोड़ दिया तो नीतीश कुमार ने अपनी सरकार बचाने के लिए वापस एनडीए का दामन थाम लिया और बीजेपी की मदद से सरकार बचा ली। निश्चित रूप से 2018 को बड़े राजनीति बदलाव वाला साल माना जा सकता है।

राहुल की अगुवाई में कांग्रेस

किसी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सशक्त विपक्ष होना आवश्यक माना जाता है। इसका तात्पर्य संसद में बड़ी संख्या में मौजूदगी नहीं, संसद में प्रभावी उपस्थिति से है। अच्छे सांसद संसद की कार्यवाही प्रभावित करते हैं। जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के कार्यकाल में विपक्ष कई टुकड़ों में बंटा हुआ था। संसद में उनकी उपस्थिति भी बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन तब विपक्ष में प्रभावी नेता थे, जो सरकार को नियंत्रित रखने में सक्षम थे। इन नेताओं में राम मनोहर लोहिया, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, आचार्य जेबी कृपलानी, मधु लिमए, पीलू मोदी, प्रो. मधु दंडवते, राजनारायण, बलराज मधोक, हीरेन मुखर्जी, आचार्य नरेंद्र देव आदि का नाम लिया जा सकता है। इनमें कुछ नेता सांसद नहीं थे, लेकिन वे देश के प्रमुख नेता थे और उन्होंने सरकार को सचेत और नियंत्रित करने का काम लगातार किया। इनमें जयप्रकाश नारायण का भी नाम लिया जा सकता है, जिन्होंने भारतीय राजनीति के इतिहास को बदलने की भूमिका निभाई। दुर्भाग्यवश आज के विपक्षी नेताओं में वैसे गंभीरता नहीं है और वे जमीनी वास्तविकताओं से भी काफी हद तक कटे हुए हैं। राहुल गांधी को जब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया, तो अधिकांश लोगों में और खुद उनकी पार्टी के भी कई नेताओं के मन में उनकी नेतृत्व क्षमता को लेकर संशय की स्थिति थी। लोकसभा सांसद के रूप में अपने पहले दो कार्यकाल में राहुल कभी सदन में अपनी मौजूदगी की छाप नहीं छोड़ सके।

उनके पास मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री बनने का पूरा मौका भी था, लेकिन उन्होंने मंत्री बनने से इनकार कर दिया। उनको पहले पार्टी का महासचिव और फिर उपाध्यक्ष बनाया गया। राहुल गांधी 48 साल के हो गए हैं, लेकिन एक राजनीतिज्ञ के तौर पर उनमें अभी तक परिपक्वता नहीं आ सकी है। इसीलिए उनकी बातों को लेकर चुटकियां ली जाती है और व्यंग्यात्मक तौर पर उनके आलोचक उन्हें पप्पू कहकर भी पुकारते हैं। कांग्रेस की कमान उनके हाथ में आने के बाद समझा जा रहा था कि वे राजनीति के सबक लेकर कठोर परिश्रम करेंगे और गुजरात विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान अपनी छवि सुधार सकेंगे। लेकिन वहां भी कांग्रेस को शिकस्त का सामना करना पड़ा। हाल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में हिन्दीपट्टी के राज्यों में कांग्रेस का प्रदर्शन जरूर सुधरा और राहुल अपनी रैलियों में आक्रामक भाषण देते नजर भी आए, लेकिन उनका पूरा फोकस आरएसएस, बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आक्रमण करने पर ही टिका रहा। चुनाव प्रचार के दौरान ‘चौकीदार चोर है’ का नारा देकर वे राजनीतिक शिष्टाचार के निम्न स्तर तक पहुंच गए। अपने भाषणों के दौरान उन्होंने आरएसएस, बीजेपी या नरेंद्र मोदी की आलोचना करने के अलावा किसी और विषय पर कहा तो वह था किसानों के कर्ज माफ करने का वादा। अपने भाषणों में इसके अलावा उन्होंने यह कभी नहीं बताया कि इन राज्यों में कांग्रेस की सरकार जनता की भलाई में वे शासन प्रणाली में क्या अनोखा परिवर्तन करेंगे। यदि राहुल गांधी अपनी इसी तरह की नारेबाजी वाली शैली में 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भी अपनी पार्टी का प्रचार करते हैं, तो वे अपनी पार्टी को चुनाव जिता सकेंगे, इस बात को लेकर संदेह ही किया जा सकता है।

चंद्रबाबू नायडू बने धुरी

2019 के लोकसभा चुनाव के कुछ समय पहले ही तेलुगू देशम पार्टी का एनडीए से अलग होना बीजेपी के लिए बड़ा झटका रहा। चंद्रबाबू नायडू को गठबंधन की राजनीति का माहिर खिलाड़ी माना जाता है। उन्होंने आंध्र प्रदेश में अपनी पार्टी के अल्पसंख्यक वोट बैंक के बिखरने के डर से बीजेपी से अपना नाता तोड़ लिया। हालांकि एनडीए से अलग होने के लिए उन्होंने आंध्र प्रदेश को विशेष पैकेज दिलाने की मांग को अपना बहाना बनाया। एनडीए से अलग होने के बाद चंद्रबाबू नायडू अब लोकसभा चुनाव के पहले बीजेपी के खिलाफ एक सशक्त फ्रंट बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। उन्हें भी पता है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के दोबारा सत्ता में लौटने की संभावना काफी अधिक है। बीजेपी के खिलाफ विपक्षी महागठबंधन बनाने के इरादे से उन्होंने सबसे पहले कांग्रेस को अपने साथ लिया, जो परंपरागत रूप से आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी रही है। हालांकि चंद्रबाबू नायडू की जैसी मनोवृति है, उसके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि राहुल गांधी के साथ उनके अच्छे संबंध आगामी लोकसभा चुनाव तक बने ही रहेंगे। नीतीश की एनडीए में वापसी 2018 में ही नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के एनडीए में शामिल होने से इस गठबंधन को मजबूती मिली है। बीजेपी के लिए बिहार महत्वपूर्ण राज्य है, जहां पिछले चुनाव में उसने 40 में से 22 सीटें जीती थी। 2014 के चुनाव में जेडीयू अकेले चुनाव में उतरी थी और उसे सिर्फ दो सीटों पर सफलता मिली थी। अब 2019 के लोकसभा चुनावों में जेडीयू और बीजेपी का गठबंधन लालू यादव की आरजेडी और कांग्रेस को कड़ी टक्कर दे सकता है। आरजेडी और कांग्रेस ने पहले ही गठबंधन के तौर पर लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। राज्य में जेडीयू की प्रमुख शक्ति वहां का कुर्मी वोट है। इन वोटों के बल पर नीतीश कुमार एनडीए को फायदा पहुंचा सकते हैं। लेकिन बिहार में उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी ने एनडीए से अपना रिश्ता खत्म करके गठबंधन को झटका भी दिया है। राज्य में कुशवाहा वोटों की संख्या भी करीब छह फीसदी है और इसकी नाराजगी एनडीए के लिए परेशानी की वजह बन सकती है।

शाह ने की परिश्रम की पराकाष्ठा

भारतीय राजनीति में अमित शाह ने निश्चित रूप से अपना दम दिखा दिया है। शारीरिक तौर पर वे थुलथुल जरूर नजर आते हैं, लेकिन प्रतिदिन बिना थके 12 से 16 घंटे काम कर उन्होंने अपनी कार्य-क्षमता दिखा दी है। इसी साल मई में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की शवयात्रा के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बीजेपी मुख्यालय से लेकर अंतिम संस्कार स्थल तक गर्मी और उमस के बावजूद पैदल चल कर अपनी शारीरिक क्षमता का भी प्रदर्शन कर दिया है। जब उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली, तो शुरू में उनके बारे में यही समझा जाता था कि वे प्रधानमंत्री के गृहराज्य गुजरात के एक नेता हैं। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, उन्होंने दिखा दिया कि वे देश के प्रमुख रणनीतिकार और राजनीति के प्रभावी प्रबंधक हैं। लोकसभा में 25 सीटों वाले पूर्वोत्तर भारत में उन्होंने पूरी मेहनत की। इसका ही परिणाम है कि असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और मेघालय में भी आज बीजेपी की सरकार है। राजनीतिक संगठक के रूप में उन्होंने आज अपने विरोधियों और आलोचकों के बीच भी अपनी पहचान कायम कर ली है। वे अपने कार्यालय या घर से ही पार्टी की राजनीति नहीं करते, बल्कि प्रतिकूल मौसम और बीजेपी के जनाधार की परवाह किए बिना भी सड़क पर उतर कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते। उनका सबसे बड़ा गुण है कि वे सरकार और प्रधानमंत्री की नीतियों के मुताबिक अपनी बात कहते हैं। आर्थिक और विदेश नीति के संबंध में भी वे वही बोलते हैं, जो सरकार या उनके नेता नरेंद्र मोदी के मुताबिक होता है। शाह के प्रदर्शन के बारे में सेंटर फॉर द स्टडी आॅफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार का कहना है, ‘शाह के प्रदर्शन पर किसी भी तरह का सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता है और मुझे 2019 में बीजेपी के लिए कोई चुनौती तब तक नहीं नजर नहीं आती है, जब तक कि अचानक कोई बड़ी बात न हो जाए।’ बीजेपी अध्यक्ष के रूप में शाह के कार्यकाल को शानदार बताते हुए वे कहते हैं उनकी अगुवाई में पार्टी उन राज्यों में भी जीतने में सफल हुई है, जहां उसे हार का सामना करना पड़ता था।

भारतीय राजनीति में अमित शाह ने निश्चित रूप से अपना दम दिखा दिया है। शारीरिक तौर पर वे थुलथुल जरूर नजर आते हैं, लेकिन प्रतिदिन बिना थके 12 से 16 घंटे काम कर उन्होंने अपनी कार्य-क्षमता दिखा दी है। इसी साल मई में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की शवयात्रा के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बीजेपी मुख्यालय से लेकर अंतिम संस्कार स्थल तक गर्मी और उमस के बावजूद पैदल चल कर अपनी शारीरिक क्षमता का भी प्रदर्शन कर दिया है। जब उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली, तो शुरू में उनके बारे में यही समझा जाता था कि वे प्रधानमंत्री के गृहराज्य गुजरात के एक नेता हैं। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, उन्होंने दिखा दिया कि वे देश के प्रमुख रणनीतिकार और राजनीति के प्रभावी प्रबंधक हैं। लोकसभा में 25 सीटों वाले पूर्वोत्तर भारत में उन्होंने पूरी मेहनत की। इसका ही परिणाम है कि असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और मेघालय में भी आज बीजेपी की सरकार है। राजनीतिक संगठक के रूप में उन्होंने आज अपने विरोधियों और आलोचकों के बीच भी अपनी पहचान कायम कर ली है। वे अपने कार्यालय या घर से ही पार्टी की राजनीति नहीं करते, बल्कि प्रतिकूल मौसम और बीजेपी के जनाधार की परवाह किए बिना भी सड़क पर उतर कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते। उनका सबसे बड़ा गुण है कि वे सरकार और प्रधानमंत्री की नीतियों के मुताबिक अपनी बात कहते हैं। आर्थिक और विदेश नीति के संबंध में भी वे वही बोलते हैं, जो सरकार या उनके नेता नरेंद्र मोदी के मुताबिक होता है। शाह के प्रदर्शन के बारे में सेंटर फॉर द स्टडी आॅफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार का कहना है, ‘शाह के प्रदर्शन पर किसी भी तरह का सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता है और मुझे 2019 में बीजेपी के लिए कोई चुनौती तब तक नहीं नजर नहीं आती है, जब तक कि अचानक कोई बड़ी बात न हो जाए।’ बीजेपी अध्यक्ष के रूप में शाह के कार्यकाल को शानदार बताते हुए वे कहते हैं उनकी अगुवाई में पार्टी उन राज्यों में भी जीतने में सफल हुई है, जहां उसे हार का सामना करना पड़ता था।

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