खाली खजाने पर वादों का बोझ

कर्जमाफी के अलावा वृद्ध किसानों को पेंशन युवाओं के लिए 4 हजार रुपये प्रतिमाह सहभागिता राशि, हर पंचायत में गोशाला, कॉलेज जाने वाली कन्याओं के लिए स्कूटी, महिलाओं को स्मार्ट फोन आदि चुनावी घोषणाएं खाली खजाने में किस मद से पूरी की जाएंगी, यह बड़ा सवाल है।

तीजों के बीस दिन बाद मंत्री पद की बंदरबांट को लेकर कांग्रेस के नेता जब दिल्ली में एक-दूसरे से भिड़ रहे थे उसी दौरान मध्य प्रदेश के गांवों और कस्बों में यूरिया की किल्लत से परेशान हाल हजारों किसान सड़कों पर चक्काजाम करने को विवश थे। नए मुख्यमंत्री कमलनाथ उन्हें अपने ट्विटर पर दिलासा भरे संदेश देने से ज्यादा कोई मदद इसलिए नहीं कर पा रहे थे क्योंकि राजधानी भोपाल सहित राज्य में चुनी हुई सरकार कुर्सी पर कहीं थी ही नहीं। यह नई सरकार के कामकाज से पेश आ रही चुनौती की छोटी सी बानगी है। शपथ लेते ही कमलनाथ ने 34 लाख किसानों का दो लाख रुपये तक का कर्जा माफ करने का एलान करके भले ही वाहवाही लूट ली हो लेकिन 38 हजार करोड़ रुपये का यह आर्थिक बोझ पहले से बदहाल खजाने को बेहाल कर सकता है।
वैसे भी कर्ज माफी की प्रक्रिया बेहद जटिल साबित होने वाली है। राज्य सरकार को अनुपूरक बजट लाकर इसके लिए वित्तीय प्रावधान करने होंगे क्योंकि सरकारी बैंक बिना बजट प्रावधान के इस माफी को मानने से इनकार भी कर सकते हैं। यहां पर यह जान लें कि किसानों पर सर्वाधिक 34 हजार करोड़ रुपये कर्ज इन सरकारी बैंकों का ही है। किसानों को कर्ज माफी के व्यावहारिक क्रियान्वयन में खासी जटिलताएं हैं। सरकार ने 22 सदस्यीय समिति मुख्य सचिव बीपी सिंह की अध्यक्षता में बना दी है पर यह समिति एक्शन मोड पर तब तक नहीं आ सकती जब कर्जमाफी का डाटा प्रस्तावित पोर्टल पर अपलोड नहीं नहीं हो जाता।
सरकार के लिए बड़ी चुनौती तो कर्जमाफी के बाद नए कर्ज की भी रहेगी। रबी फसल की बुआई के लिए किसान कर्ज ले चुके हैं। जब खरीफ की तैयारी की बारी आएगी, तब किसानों को खाद-बीज के लिए कर्ज की दरकार होगी, तब हो सकता है सहकारी बैंक जिनकी माली हालत कर्जमाफी से खस्ता हो चुकी होगी, नया कर्ज देने से ही इनकार कर दें। कृषि विशेषज्ञ सोमपाल शास्त्री मानते हैं कि कर्जमाफी के वादों में उलझने के बजाए सरकारें किसानों की अर्थव्यवस्था सही करने के बारे में सोंचें तो ज्यादा बेहतर होगा। किसानों को फसलों का सही दाम मिले। मप्र के पूर्व आयुक्त (गन्ना)एस आर शर्मा का कहना है कि हमने किसानों की आत्महत्या पर सर्वे करके मानवाधिकार आयोग को दिया था जिसमें बताया था कि कर्ज किसानों की बदहाली का बड़ा कारण है। लिहाजा, ठोस योजना बनाकर किसानों के हित में कदम उठाए जाने चाहिए। मप्र के पूर्व संचालक कृषि, जी.एस. कौशल कहते हैं कर्जमाफी आदत नहीं बननी चाहिए। यहां बता दें कि राज्य में कुल 85 लाख किसान हैं, उनमें से 52 लाख किसान किसी न किसी तरह का कर्ज जरूर लेते हैं। इन किसानों की मुश्किलें केवल कर्ज ही नहीं खाद-बीज भी है। इन दिनों जबकि रबी सीजन चल रहा है, किसानों के सम्मुख यूरिया खाद का संकट खड़ा हो गया है। यहां रायसेन, गुना, विदिशा, राजगढ़, खरगोन, जबलपुर, होशंगाबाद आदि जिलों में खाद की किल्लत से गुस्साए किसान सड़कों पर हैं। यूरिया को लेकर केंद्र व राज्य के मध्य भिड़ंत की नौबत है। राज्य का आरोप है कि उसके हिस्से की यूरिया राजस्थान, पंजाब, हरियाणा को दे दी गई। 4 लाख टन मांग थी। सवा लाख टन ही भेजा गया।
किसानों की कर्जमाफी के अलावा वृद्ध किसानों को पेंशन, युवाओं के लिए 4 हजार रुपये प्रतिमाह सहभागिता राशि, हर पंचायत में गोशाला, कॉलेज जाने वाली कन्याओं के लिए स्कूटी, महिलाओं को स्मार्ट फोन देने आदि की तमाम चुनावी घोषणाएं खाली खजाने में किस मद से पूरी की जाएंगी, अभी इस पर रहस्य बना हुआ है। पिछली सरकार जैसे ही पदच्युत हुई, उसके वित्तमंत्री जयंत मलैया ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि राज्य का खजाना खाली है और ऐसी हालत नहीं हैं कि उस पर कर्ज माफी का बोझ डाला जा सके। चुनाव की समाप्ति से पहले-पहले राज्य सरकार को अपना राजकाज चलाने के लिए कर्ज लेना पड़ा था। सरकार ने विभिन्न संस्थाओं से बतौर कर्ज मांगे आठ सौ करोड़ रुपये थे, लेकिन मिले केवल पांच सौ करोड़ रुपये थे। लगभग दो लाख करोड़ के कर्ज में डूबी राज्य सरकार को वित्तीय संस्थाएं भी हाथ खींच कर पैसे दे रही हैं।

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