क्षेत्रीय दलों के सहारे जगी उम्मीदें

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गर आप जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हैं तो तमिलनाडु की राजनीति की शायद पूरे देश में कोई तुलना नहीं है। जब से द्रविड़ पार्टियां अस्तित्व में आई हैं, तब से आज तक इन क्षेत्रीय संगठनों के नेताओं की मानसिकता में बदलाव नहीं आया। वे आज भी कई बार राज्य की भोली जनता के दिमाग में स्वतंत्र राष्ट्र और अलग मतदाता-समूह जैसी बातें भरकर उन्हें बहकाने की कोशिश करते हैं। देश के दक्षिणी हिस्से में इस तरह की स्थिति का एक लंबा इतिहास है। साउथ इंडियन वेलफेयर एसोसिएशन (दक्षिण भारतीय कल्याण संघ) 1916 में जन्म लेने वाला राज्य का पहला क्षेत्रीय दल था। अंग्रेजी भाषा के एक दैनिक समाचार पत्र के मिलते-जुलते नाम के बाद इस दल का नाम जस्टिस पार्टी कर दिया गया। यह समाचार पत्र अंग्रेजों के मुखर समर्थन के लिए अधिक जाना जाता था।

आजादी के दो दशक तक कांग्रेस का वर्चस्व रहा। उसके बाद दोनों द्रविडि़यन दलों में से किसी न किसी का बारी-बारी शासन रहा।

द्रविड़ आंदोलन के लिए साठ का दशक अनुकूल साबित हुआ, जब राज्यों में कामकाज की भाषा के रूप में हिंदी लाने की कोशिश हुई। इस स्थिति ने द्रविडि़यन दलों को राज्य की धरती पर अपना विस्तार करने में मदद की। वैसे आजादी के दो दशक तक कांग्रेस का वर्चस्व रहा। उसके बाद दोनों द्रविडि़यन दलों में से किसी न किसी का बारी-बारी शासन रहा। यहां केरल का उदाहरण सामने है। वहां कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट या फिर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाली लेμट डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकारें बारी-बारी से बनती रहीं। उसी तरह तमिलनाडु में द्रमुक और अन्नाद्रमुक भी एक-एक कर सत्ता पर काबिज होती रही हैं। राज्य में एक बदलाव आया है। इसका जिक्र करते हुए पंजाब नेशनल बैंक के पूर्व वरिष्ठ शाखा प्रबंधक एमआर पट्टाभिरामन कहते हैं कि पहली बार लोकसभा चुनाव राज्य में आम देवी-देवताओं के बिना हो रहे हैं। उनका इशारा डीएमके नेता एम करुणानिधि और एआइएडीएमके नेत्री जे जयललिता की तरफ था।

द्रमुक के संरक्षक मुथुवेल करुणानिधि और समर्थकों के बीच अम्मा के रूप में चर्चित जयराम जयललिता जैसी प्रभावशाली ताकतें इस चुनाव में नहीं हैं। सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के मोर्चे ने भाजपा, पीएमके, डीएमडीके, पुथिया तमिझगम और एआईएनआरसी दलों के साथ गठबंधन किया है। मुख्यमंत्री के पलानीस्वामी, उपमुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम, टीटीके दिनाकरन, ये अन्नाद्रमुक गुट की तीन प्रमुख नेता मुक्कुलाथोर समुदाय से आते हैं। इस समुदाय की आबादी 80 लाख है। इसी तरह एस रामदास द्वारा स्थापित पट्टाली मक्कल कांची (पीएमके) वन्नियार समुदाय से संबंध रखती है, जिसकी आबादी लगभग 1.20 करोड़ है। एससी/एसटी से संबंधित लोगों की संख्या 1.80 करोड़ मानी जाती है। शेष 1.20 करोड़ में 45 लाख नादर और 75 लाख मुदलियार समुदाय के लोग हैं। इन आठ में से पांच करोड़ लोगों के वोटिंग पैटर्न पर बहुत कुछ निर्भर करता है। द्रमुक का प्रमुख नेतृत्व पिल्लई समुदाय से संबंध रखता है। एससी/एसटी वोट दोनों प्रतिद्वंद्वी गठबंधनों में विभाजित दिखता है। कुल मिलकर और अभी तक द्रमुक-कांग्रेस के लिए एक बेहतर स्थिति की उम्मीद की जा रही है। लगभग दो साल पहले अन्नाद्रमुक को वोट देने वाले सभी लोग इस बार फिर उसे वोट दें, जरूरी नहीं है। इसका कारण सत्ता विरोध हो सकता है। सत्ताधारी अन्नाद्रमुक ने फिल्म अभिनेता विजयकांत की पार्टी देसिया मुरपोक्कु द्रविड़ कषगम (डीएमडीके) को 4 सीटें दी है। वह तेलुगु नायडू समुदाय से संबंध रखते हैं। फिर भी माना जा रहा है कि मतदाताओं पर इसका कम ही प्रभाव देखने को मिलेगा।

न्यूज टुडे प्राइवेट लिमिटेड के पूर्व निदेशक, इनाडू टेलीविजन के मालिक एसआर रामानुजन द्रमुक गठजोड़ के लिए एक सुखद तस्वीर देखते हैं। फिर भी बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक की बदौलत, ऐसा लगता है कि प्रवाह का रुख द्रमुक-भाजपा गठजोड़ की ओर भी होने लगा है। इन दिनों सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जितने भी सामाजिक कार्यकर्ता सक्रिय हैं, वे जमीनी स्थिति को चित्रित करने की कोशिश कर रहे हैं। अब तक भाजपा कोयंबटूर और उत्तर मदुरै में बेहतर स्थिति में दिख रही है, जबकि अन्नाद्रमुक के दक्षिणी क्षेत्र से 3-4 निर्वाचन क्षेत्रों को जीतने की संभावना है। संभवत: इन सभी में द्रमुक-भाजपा का गठजोड़ 5-10 सीटें जीतने की आशा कर सकता है।

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