किसानों की किस्मत से धोखा

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मानेसर जमीन घोटाले को अंजाम देने के लिए सरकारी मिलीभगत से बिल्डरों ने पहले किसानों को धमकी दी कि अगर वह जमीन नहीं बेचेंगे तो सरकार उनकी भूमि का अधिग्रहण कर लेगी। इसके लिए सरकारी अधिसूचना जारी करवा दी गई। इस अधिसूचना की धारा-4 में बताया गया कि लोकहित में भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा। इस बीच बिल्डरों ने किसानों की मजबूरी का जमकर फायदा उठाया।

किसानों के हितैषी होने का दम भरने वाली कांग्रेस की करतूत उसके खुद के शासनकाल में ऐसी रही कि वह किसानों को धमकी देकर उन्हें उनकी रोजी-रोटी (जमीन) से ही बेदखल करने लगी। इसका जीता जागता उदाहरण हरियाणा से जुड़ा मानेसर भूमि सौदा (लैंड डील) है। 1600 करोड़ रुपये के इस घोटाले में याचिका कर्ता व मानेसर के पूर्व सरपंच ओम प्रकाश यादव को पांच साल तक न्यायालय की खाक छाननी पड़ी तब जाकर उनकी आवाज को सुनी जा सकी। इस बीच उन्हें कई बार जान से मारने की धमकी भी मिली लेकिन वह लड़ते रहे। आज भी उनके साथ हरियाणा पुलिस के अंगरक्षक चलते हैं।
पिछले 28 दिसंबर को प्रवर्तन निदेशालय ने मानेसर लैंड डील में शामिल कंपनी एबीडब्लू इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड की लगभग 42.19 करोड़ रुपये की संपत्ति औपबंधिक रूप से जब्त कर ली। इससे पहले सितंबर 2016 के दौरान प्रवर्तन निदेशालय ने मामले के आरोपित भूपिंदर सिंह हुड्डा के खिलाफ मनी लांंिड्रग का मामला भी दर्ज किया था। इसी मामले में कार्रवाई की कड़ी के तहत प्रवर्तन निदेशालय ने आरोपियों की संपत्ति भी जब्त की है।
इस घोटाले में बिहार के चारा घोटाले में अपनाए गए तरीके से भी ज्यादा शातिराना खेल-खेला गया। बिहार के घोटाले में पशुओं के चारे की चोरी की गई लेकिन मानेसर लैंड डील में तो देश के अन्नदाताओं की ही रोटी छीनने का प्रयास किया गया। अलग बात है कि आज कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी उठते-बैठते किसानों की कंधे पर रखकर बंदूक चलाते हुए नहीं थक रहे हैं कि मौजूदा केंद्र सरकार किसानों की तकदीर के साथ खिलवाड़ कर रही है। मानेसर लैंड डील के खिलाफ कांग्रेस के पास एक ही रटा रटाया जवाब है कि केंद्रीय जांच एजेंसियां केंद्र सरकार के इशारे पर सियासी दांव खेल रही है और कांग्रेसी नेताओं को निशाना बना रही है। चारा घोटाले की जांच का रास्ता अपने मंजिल तक पहुंच गया है, लालू प्रसाद यादव अभी भी इसी मामले में सजा भुगत रहे हैं।
लेकिन इस घोटाले ने कांग्रेस के राजनीतिक रास्ते पर कांटा बिछाने का काम किया है। क्योंकि कांग्रेस के उस नेता के शासनकाल में इस घोटाले को अंजाम दिया गया जिन्हें पार्टी के तत्कालीन उपाध्यक्ष व मौजूदा अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा कृषि गरीबी उन्मूलन पर नीति तैयार करने वाली समिति का अध्यक्ष बनाया गया। इस समिति के अध्यक्ष हुड्डा थे और पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह व आजकल कांग्रेस मीडिया सेल की अध्यक्षता करने वाले रणदीप सुरजेवाला को इस समिति का माननीय सदस्य बनाया गया था। कहने की जरूरत नहीं है कि आज हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार सत्ता में है।
पिछले साल 14 मार्च को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने बजट सत्र के दौरान विधानसभा में कहा था, ‘ऐसा, कोई सगा नहीं, जिनको कांग्रेस ने ठगा नहीं। दरअसल खट्टर वृहत मानेसर लैंड डील की चर्चा कर रहे थे। लेकिन ठीक दूसरे दिन खट्टर ने हुड्डा पर फिर हमला बोला, जब सुप्रीम कोर्ट ने मानेसर डील में शामिल 688 एकड़ भूमि के अधिग्रहण को खारिज कर दिया। लेकिन दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने एक तरफ आवास के लिए लालायित निवेशकों पर कहर बरपाया तो दूसरी तरफ कोर्ट की ओर से भूमि को राज्य सरकार को ही सुपुर्द किए जाने से किसान भी उदास हुए। अब उन पर विपत्ति का पहाड़ टूटना था क्योंकि क्षति पूर्ति के लिए सरकारी दμतरों के चक्कर काटते-काटते एड़ी घिस जानी थी। कोर्ट के आदेश पर मामले के याचिका कर्ता ओम प्रकाश यादव भी उदास हुए थे क्योंकि किसानों के लिए उनकी ओर से किए गए परिश्रम का कोई मोल नहीं रहा। शायद खट्टर भी कांग्रेस पर हमला बोलकर यही कहना चाह रहे थे कि हुड्डा की नेतृत्व वाली सरकार ने किसानों व गृह निवेशकों दोनों को ठगा।
इस घोटाले को अंजाम देने के लिए सरकारी मिलीभगत से बिल्डरों ने पहले किसानों को धमकी दी कि अगर वह जमीन नहीं बेचेंगे तो सरकार उनकी भूमि का अधिग्रहण कर लेगी। इसके लिए सरकारी अधिसूचना जारी करवा दी गई। इस अधिसूचना की धारा-4 में बताया गया कि लोकहित में भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा। इस बीच बिल्डरों ने किसानों की मजबूरी का जमकर फायदा उठाया। सरकारी दर से कुछ ज्यादा देकर किसानों को जमीन बेचने के लिए मजबूर किया गया। लेकिन जब बिल्डरों ने भूमि का अधिग्रहण कर लिया तो सरकारी अधिसूचना को वापस ले लिया गया। इतना ही नहीं, इन जमीनों के सीएलयू (उपयोग परिवर्तन) को भी लागू कर दिया गया। इस सीएलयू के मुताबिक अब भूमि पर आवासीय परिसर भी बनाए जा सकते थे। फिर बिल्डरों ने गृह निवेशकों से पैसे लेने शुरू कर दिए । इससे जमीन के दाम में कई गुना बढ़ोतरी देखी गई। यानी बिल्डरों ने जमकर मुनाफा कमाया। लेकिन किसानों व सरकार दोनों को नुकसान उठाना पड़ा। एक तरफ किसानों को जमीन के कई गुना कम दाम मिले तो दूसरी तरफ सरकार को कर का नुकसान हुआ। सरकारी आदेश के मुताबिक चार भवन निर्माण करने वाली चार कंपनियों एबीडब्लू, कर्मा, यूनिटेक व आरपी एस्टेट को आवास बनाने का लाइसेंस जारी किया गया था। उल्लेखनीय है कि सीबीआई की ओर से दर्ज मामले में इन सभी कंपनियों को आरोपी बनाया गया है। हालांकि मामला सीबीआई तक ही सीमित नहीं रहा। इस बाबत प्रवर्तन निदेशालय ने भी एक मामला दर्ज किया क्योंकि सीबीआई की जांच में यह जानकारी मिली कि इसमें मनी लॉड्रिंग के अपराध को भी अंजाम दिया गया था। प्रवर्तन निदेशालय की टीम द्वारा हाल में एबीडब्लू के संपत्तियों को जब्त किया गया है।
इस डील की असली कहानी है कि 2004 के दौरान हुड्डा सरकार ने एक अधिसूचना जारी किया। इसके तहत 688 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना था। लेकिन सरकार ने अपनी अधिसूचना को वापस ले ली। हालांकि इस बीच बिल्डरों ने किसानों से 400 एकड़ भूमि महज 100 करोड़ रुपये में खरीद ली जबकि इस भूमि की बाजार दर 1,600 करोड़ रुपये थी। इस प्रकार किसानों को इस डील से 1500 करोड़ का नुकसान हुआ। यानी इस डील का कोपभाजन मानेसर, नौरंगपुर व लखनौआ गांव के निवासी हुए।

इस जमीन घोटाले की असली कहानी है कि 2004 के दौरान हुड्डा सरकार ने एक अधिसूचना जारी किया। इसके तहत 688 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना था। लेकिन सरकार ने अपनी अधिसूचना को वापस ले ली। हालांकि इस बीच बिल्डरों ने किसानों से 400 एकड़ भूमि महज 100 करोड़ रुपये में खरीद ली जबकि इस भूमि की बाजार दर 1,600 करोड़ रुपये थी। इस प्रकार किसानों को इस डील से 1500 करोड़ का नुकसान हुआ। यानी इस डील का कोपभाजन मानेसर, नौरंगपुर व लखनौआ गांव के निवासी हुए।

इस मामले में मानेसर के पूर्व सरपंच ओमप्रकाश यादव की ओर से दायर की गई याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए मामले की जांच करने के लिए सीबीआई को आदेश दिया। इस आदेश के तहत सीबीआई ने 17 सितंबर 2015 को कई कानूनी धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए पिछले साल मार्च के दौरान मानेसर लैंड डील के तहत किए गए भूमि अधिग्रहण को खारिज कर दिया। लेकिन भूमि को कोर्ट ने हरियाणा सरकार की ईकाई एचयूडीए व एचएसआईडीसी को वापस कर दिया। इस आदेश के तहत बिल्डरों से कहा गया कि वह किसानों से अपना पैसा नहीं मांग सकते। लेकिन कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि किसी भी स्थिति में 5,000 गृह निवेशकों का हित प्रभावित नहीं होगा। कोर्ट ने अपने आदेश में सीबीआई से कहा कि वह इस मामले में शामिल बिचौलिये की भूमिका को उजागर करे। कोर्ट ने हरियाणा राज्य सरकार को आरोपियों से एक एक पैसे वसूलने को कहा।
मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरकार की ओर से वापस लिए जाने का उद्देश्य पूरी तरह से धोखाधड़ी है। सक्रिय सरकारी मिलीभगत से बिल्डरों ने जमीनों की खरीद की। हालांकि बिल्डरों को पहले से जानकारी थी कि अधिग्रहण गैरकानूनी है। इसलिए यह न्याय के समक्ष टिक नहीं पाएगा। मामले में जमकर लेनदेन किया गया है। लेकिन इस मामले के सरकारी सूत्रधार भूपिंदर सिंह हुड्डा इस मामले में जमानत पर हैं। हालांकि कांग्रेस के लिए यह कोई नई बात नहीं है। इसके मौजूदा अध्यक्ष राहुल गांधी व उनकी माता सोनिया गांधी भी नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं। कुसंयोगवश यह मामला भी जमीन से ही जुड़ा है।

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