कांग्रेस पर भारी भाजपा

उत्तराखंड की चुनावी बिसात पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होगा। भले ही, प्रदेश में सपा और बसपा के बीच गठजोड़ है, लेकिन इनके प्रत्याशी कहीं सीधे मुकाबले में नहीं दिख रहे हैं। चुनावी शोर में उत्तराखंड के मुद्दों पर ज्यादा बात नहीं हो रही है। हर तरफ मोदी बनाम राहुल पर ही चर्चा है।

त्तराखंड में पहले चरण में 11 अप्रैल को मतदान के चलते चुनावी पारा चरम पर है। वर्ष 2014 के चुनाव में पांचों सीटें भाजपा ने जीती थी। इस बार पार्टी ने पौड़ी के सांसद पूर्व केंद्रीय मंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी और नैनीताल के सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को टिकट नहीं दिया है। कांग्रेस ने भी तीन सीटों पर नए उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को हरिद्वार की बजाय नैनीताल से टिकट दिया है। पांचों सीटों का चुनावी परिदृश्य बता रहा है कि यहां भाजपा और कांग्रेस में आमने-सामने मुकाबला है। टिहरी सीट पर सांसद महारानी राजलक्ष्मी शाह को कांग्रे्रस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह चुनौती दे रहे हैं। पौड़ी सीट पर चुनावी माहौल और भी रोचक है। यहां भाजपा दिग्गज भुवनचंद्र खंडूड़ी के पुत्र कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं। उनके सामने भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह चुनाव लड़ रहे हैं, जो कि भुवनचंद्र खंडूड़ी के निकटस्थ लोगों में माने जाते हैं। नैनीताल में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट का मुकाबला हरीश रावत से होगा। प्रदेश की एकमात्र आरक्षित सीट अल्मोड़ा भी लोगों का ध्यान खींच रही है। इस सीट पर केंद्रीय मंत्री अजय टम्टा को कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा चुनौती दे रहे हैं। हरिद्वार सीट पर मौजूदा सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के सामने कांग्रेस के अंबरीष कुमार चुनाव लड़ रहे हैं। वे संयुक्त उत्तर प्रदेश में विधायक रह चुके हैं और हरिद्वार को उत्तराखंड में सम्मिलित किए जाने के विरोधी रहे हैं। इससे पूर्व वे सपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं।

उत्तराखंड में सपा और बसपा गठजोड़ में पौड़ी सीट सपा के हिस्से में है और बाकी चार सीट बसपा को मिली हैं। लेकिन, अभी गठजोड़ के प्रत्याशी ऐसी स्थिति में नहीं दिख रहे हैं कि वे कहीं भी मुकाबले को तिकोना बना सकें। उनकी उपस्थिति सांकेतिक ही नजर आ रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि सपा का राजनीतिक प्रभाव लगभग खत्म हो चुका है और बीते दिनों में बसपा ने अपने कई प्रमुख नेताओं, पूर्व विधायकों को पार्टी से बाहर निकाल दिया है। इसके चलते पार्टी का आधार केवल दलित वर्ग तक ही सीमित रह गया है और यह वर्ग इस राज्य में प्रभावी नहीं है। क्षेत्रीय पार्टी उक्रांद पांचों सीटों पर लड़ रही है, लेकिन विगत चुनावों में उक्रांद में इतनी बार विभाजन हो चुका है कि वोटरों के लिए यह पता करना मुश्किल हो जाता है कि उक्रांद का प्रत्याशी किस धड़े का है। पार्टी का वोट प्रतिशत एक फीसद पर सिमट चुका है। पौड़ी, टिहरी और नैनीताल सीट पर सीपीआई, सीपीएम और सीएमएम-माले मिलकर चुनाव लड़ रही हैं। वैसे, तीनों के प्रत्याशी वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण ही मैदान में हैं, वे एक भी सीट पर ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकें।

जहां तक मुद्दों की बात है तो वामपंथी पार्टियां और क्षेत्रीय दल उत्तराखंड के स्थानीय मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ रहे हैं, जिनमें गैरसैंण को राजधानी बनाने, पलायन रोकने, प्रदेश को ग्रीन-बोनस दिए जाने और सभी प्राकृतिक संसाधनों को उत्तराखंड के पूर्ण नियंत्रण में दिए जाने के मामले शामिल हैं। इनकी तुलना में दोनों राष्ट्रीय पार्टियां अपने नेताओं के नाम पर ही वोट मांग रही हैं। भाजपा एक बार फिर मोदी-प्रभाव से चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश कर रही है, जबकि कांग्रेस राहुल गांधी के नाम पर आगे बढ़ने के प्रयास में है। ससांधनों और संगठन की मजबूती के मामले में भाजपा को बढ़त हासिल है। भाजपा की तुलना में गुटबंदी का असर कांग्रेस में ज्यादा दिख रहा है। वैसे, बीते चुनावों को देखें तो प्रदेश की पांचों सीट एक ही पार्टी की झोली में जाती रही हैं। भाजपा इस कोशिश में है कि वो पांचों सीटें जीतकर पिछला प्रदर्शन दोहराए, जबकि कांग्रेस दो से तीन सीटें झटकने के लिए पुरजोर कोशिश में जुटी है।

 

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