कांग्रेस : तीन जिलों में हार को न्योता!

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राजस्थान में चुनावी रणनीति के हिसाब से मानवेंद्र सिंह को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ खड़ा करना राहुल गांधी का सही फैसला हो सकता है पर इस नाम के साथ ही उस क्षेत्र से टिकट की उम्मीद से पिछले दो महीने से दिल्ली में कांग्रेस नेताओं की दहलीज पर मत्था टेक रहे जमीनी कार्यकताओं के मुंह से एकदम निकला,‘पैराट्रूपर्स को टिकट नहीं दिया जाएगा’ घोषणा का क्या हुआ? राहुल गांधी इससे पहले कई सार्वजनिक सभाओं में कह चुके थे कि पैराट्रूपर्स को टिकट दिया तो उसकी डोर तुरंत काट दी जाएगी। मानवेंद्र के नाम की घोषणा झालरापाटन से टिकट मांगने वालों के लिए निराशाजनक थी। मानवेंद्र सिंह अकेले पैराट्रूपर्स नहीं हैं। इससे पहले दौसा से भाजपा के सांसद हरीश मीणा, और नागौर से भाजपा विधायक हबीबुर रहमान को पार्टी में शामिल कर दूसरे दिन टिकट दे दिया गया।

इसी तरह नवलगढ़ से निर्दलीय विधायक राजकुमार वर्मा और रायसिंह नगर से जमीदारा पार्टी की विधायक सोना देवी को पार्टी में शामिल कर टिकट दे दिया गया। ऐसा नहीं है कि चयन समिति ने पार्टी अध्यक्ष की ओर से तय मापदंडों के पालन करने की कोशिश नहीं की। राजस्थान की पहली दो सूचियों में जिन टिकटार्थियों को टिकट मिला, उनमें कोई भी ऐसा नहीं था जो लगातार दो बार चुनाव हारा हो। इसी कसौटी के तहत बीकानेर से राजस्थान के दिग्गज नेता बीडी कल्ला के नाम पर विचार नहीं किया गया था। उनकी जगह बीकानेर पश्चिम से कांग्रेस जिलाध्यक्ष यशपाल गहलोत को टिकट दे दिया गया था। पर समर्थकों के जरिए बनाए गए दबाव के आगे चयन समिति ने घुटने टेक दिए और बीकानेर पूर्व से कल्ला के नाम की घोषणा कर दी गई। इस सीट पर निर्दलीय कन्हैयालाल झंवर को कांगे्रस में शामिल कर टिकट दे दिया गया था।

राजस्थान के कोटा, झालावड़ व बीकानेर जिले ही ऐसे हैं जिनमें उम्मीदवारों के नामों की घोषणा में कांग्रेस नेतृत्व को सर्वाधिक समय लगा। यहां उम्मीदवारों के नाम तय करने में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने द्वारा तय मापदंडों को ही ध्वस्त कर दिया। भाजपा नेता मानवेंद्र सिंह का कांग्रेस में आना और वसुंधरा राजे के सामने खड़ा होना इसका साफ संकेत है।

असल में इसके पीछे विधानसभा में विपक्ष के नेता रामेश्वर डूडी का खेल था। कन्हैयालाल डूडी की सीट नोखा से उनके खिलाफ बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ते रहे थे। 2008 में जीते थे और 2013 में उन्हें करारी टक्कर दी थी। इस बार डूडी ने कन्हैयालाल को कांग्रेस में शामिल कर बीकानेर से टिकट का आश्वासन देकर अपनी जीत को सुनिश्चित किया था। इसीलिए जब बीकानेर पूर्व से कल्ला के नाम की घोषणा हुई तो डूडी ने खुलेआम चुनौती देते हुए कहा कि अगर झंवर को बीकानेर पूर्व से टिकट नहीं दिया गया तो वे भी नोखा से चुनाव नहीं लड़ेंगे। अंतत: यशपाल का नाम काट कर कल्ला को बीकानेर पश्चिम से टिकिट दिया गया। लगातार दो बार हारने वालों में से किसी अन्य नेता को खुद को टिकट भले ही न मिला हो पर उनमें से बहुत से अपनी पत्नी या पुत्र को दिलाने में कामयाब हो गए हैं।

कोटा में गुड्डू भाई जानते थे कि लाडपुरा से दो बार लगातार हारे होने के कारण उन्हें टिकट नहीं मिलेगा। इसलिए उन्होंने अपनी पत्नी गुलनाज का नाम चलाया। जब लगा कि बात नहीं बन रही है तो कोटा में भारी शक्ति प्रर्दशन कर शीर्ष स्तर पर दबाव बनाया। इसमें कोटा के ही दिग्गज नेता शांति धारीवाल का भी हाथ रहा जो जानते थे कि अगर उसे टिकट नहीं मिला तो वह उनके मुसलमान वोटर को प्रभावित कर सकता है। उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है। राजस्थान प्रदेश कांगे्रस उपाध्यक्ष लक्ष्मण सिंह रावत और पूर्व विधायक उम्म्ोद सिंह व जुबेर खान तो दो बार हारे हुए होने के बावजूद अपने लिए ही टिकट मांग रहे थे। नहीं मिलने पर बेटे सुदर्शन रावत और पत्नी मीना कंवर व साफिया खान को दिलवा दिया। कहने को तो मात्र कल्ला ही एक मात्र नेता हैं जिन्हें दो बार लगातार हार के बावजूद दबाव के तहत पार्टीे को टिकट देना पड़ा पर व्यवहार में ऐसे नेताओं के परिवार के सदस्यों को टिकट दे दिए जाने से उस क्षेत्र में अपनी जिंदगी पार्टी के लिए लगा चुके कार्यकताओं में घोर निराशा का संचार हुआ है।

ये सभी इस उम्मीद में दिल्ली में बैठे थे कि कम से कम इस बार तो उनका नंबर लग ही जाएगा। राहुल की घोषणाओं से उनकी उम्मीदें बढ़ी थीं पर अंतत: उनके हाथ निराशा ही लगी। पराजित नेताओं की पत्नियों को टिकट दे देने से महिला उम्मीदवारों की गिनती भले ही कर ली जाए पर वास्तव में उन महिला कार्यकर्ताओं को कुछ नहीं मिला जो समझ रही थीं कि पिता राजीव गांधी की तरह राहुल गांधी भी बड़ी संख्या में महिलाओं को टिकट देकर उन्हें ऊपर लाएंगे। लेकिन निराशा मिली।

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