कांग्रेस को मजहबी राजनीति का सहारा

0
19

कावेरी जल विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय के कर्नाटक के हक में फैसले से कांग्रेस खुश है। उसको लगता है कि  उसको फायदा होगा। आने वाले विधानसभा चुनाव में उसने इसे मुद्दा बनाने की रणनीति भी तैयार कर ली है।

हालांकि भाजपा और जद सेकुलर (पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की पार्टी) भी इसे अपनी जीत मान रहे हैं। पानी के मुद्दे पर इन दोनों दलों ने भी लड़ाई लड़ी है।

इस कारण यह मुद्दा बनेगा, इसमें शक है। कावेरी तटवर्ती क्षेत्रों में जनता दल (सेकुलर) और कांग्रेस के बीच ही प्रतिस्पर्धा रही है।

मैसूर,हासन, मण्डया, कोलार और चिकबल्लापुर जिलों के छह लोकसभा सीटों पर सीधी लड़ाई कांग्रेस और जद (से) के बीच ही होती रही है। कावेरी विवाद का इस इलाके पर थोड़ा असर हो सकता है।

हां, आने वाले विधानसभा चुनाव में जद सेकुलर की बसपा प्रमुख मायावती से सीटों का समझौता चुनाव पर असर डाल सकता है।

बीते चुनावों में भले ही बसपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा लेकिन वह एक फीसद मत पाती रही है।

जद सेकुलर के साथ समझौते से थोड़े भी दलित वोट कांग्रेस से खिसके तो उसे बड़ा नुकसान हो सकता है। इसकी भरपाई के लिए कांग्रेस ने आतंकी संगठन पापुलर फ्रंटआफ इंडिया की ओर रुख कर लिया  है।

कर्नाटक सरकार ने आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त के आरोपी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इन्डिया (पीएफआई) के राजनीतिक दल सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी आफ इंडिया (एसडीपीआई) से गठबंधन करने पहल शुरू कर दी है।

पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने की मांग को ठुकराते हुए कर्नाटक के गृहमंत्री रामलिंगा रेड्डी ने कह दिया कि उस पर प्रतिबंध लगाने से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। केन्द्र सरकार को यह कदम उठाना चाहिए।

राहुल गांधी राज्य में चुनावी दौरों की शुरुआत मंदिरों में माथा टेकने और मस्जिद की ओर रुख करने से साफ कर दिया है कि कांग्रेस चुनाव की जातिवादी और मजहबी राजनीति को धार देगी।

कर्नाटक में राजनीतिक शह और मात की शुरुआत हो गई है। यह आगाज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भाजपा की परिवर्तन यात्रा के समापन समारोह में कर्नाटक सरकार को ’10 प्रतिशत भ्रष्टाचार की सरकार’ कहने से नहीं हुआ है।

इसकी शुरुआत तो पिछले साल ही राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्दरामय्या ने जनता को लुभाने के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी के नाम पर ‘इंदिरा कैन्टीन’ को शुरू कर दिया था।

कांग्रेस ने कर्नाटक में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और सोशलिस्ट
डेमोक्रैटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) से गठबंधन
करने की पहल शुरू कर दी है।

 

बेंगलूरु के लगभग सभी वार्डों में इंदिरा कैन्टीनों को पार्कों में बनाया गया। मुख्यमंत्री मुसलमानों को कांग्रेस के खेमे में लाने के लिए विभिन्न आपराधिक मामलों में सजायाफ्ता मुस्लिम समुदाय के लोगों के विरुद्ध मुकदमा वापस लेने का आदेश जारी किया।

इसको विपक्षी दलों द्वारा कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी की गई तो विवादित आदेश वापस ले लिया गया। राज्य में मुसलमानों की जनसंख्या 16 प्रतिशत है।

अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग (हिंदुवडि़त), दलित (अहिंद) के भरोसे मुख्यमंत्री बनने वाले सिद्दरामय्या के नेतृत्व में कांग्रेस आलाकमान ने चुनाव लड़ने का मन तो बना लिया है परन्तु पार्टी दबंग वोक्कालिगा नेता डीके शिवकुमार ने मुख्यमंत्री बनने की दावेदारी छोड़ी नहीं है।

मीडिया में शिवकुमार के ऊर्जा मंत्रालय द्वारा विकास की कहानी अलग से बयान की जा रही है। विज्ञापनों में शिवकुमार का बाइट महत्वपूर्ण और प्रभावी ढंग से दिखाया जाता है।

राज्य में दलितों की जनसंख्या पर नजर डालते हैं तो मामला साफ नजर आने लगता है। उनकी जनसंख्या या फिर चुनाव में उनके मतों की हिस्सेदारी से किसी भी पार्टी की सरकार का बनना या गिरना निर्भर नहीं है।

राज्य में कुल जनसंख्य़ा में दलितों की हिस्सेदारी लगभग 6 प्रतिशत तक ही सीमित है। मुसलमानों की जनसंख्या 16 प्रतिशत है। राज्य के 224 विधानसभा क्षेत्रों में मुश्किल से एक दर्जन क्षेत्रों में उनका मत उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

परन्तु सत्ता में अपनी सशक्त मौजूदगी के लिए यह काफी नहीं है। यह बात सभी पार्टियों का नेतृत्व समझता है। इसीलिए किसी भी पार्टी की ओर से अभी तक राज्य में कोई भी मुख्यमंत्री दलित नहीं बनाया गया है।

यद्यपि दलितों की हक की लड़ाई के नाम पर लड़ने के लिए दर्जनों दलित संघर्ष समितियां हैं लेकिन उनका वजूद केवल किसी न किसी दलित नेता के जेबी संगठन के रूप में ही है।

जब भी दलितों के ऊपर अत्याचार की बात आती है तो यही संगठन केवल धरना प्रदर्शन तक ही सीमित हो जाते हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि का जहां तक सवाल है तो इनसे चुनावी लाभ लेने के लिए वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्दरामय्या ने अल्पसंख्यक, पिछड़ावर्ग और दलित (अहिंद) बनाकर जिस राजनीति की शुरुआत की, उसी का फल है कि वे कांग्रेस के दबंग दलित नेताओं को पीछे धकेल कर राज्य के मुख्यमंत्री बने।

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में योग्य दलित नेताओं की कमी रही है, ऐसा भी नहीं है कि यदि कांग्रेस का नेतृत्व किसी दलित को मुख्यमंत्री बनाने की हठ करता तो राज्य में पार्टी संगठन को कोई खतरा पैदा होता।

कर्नाटक राज्य में कांग्रेस की सरकार तब भी बनी थी जब 1989 में पूरे देश में कांग्रेस के विरुद्ध माहौल बना था और प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह बने थे।

कर्नाटक ने उस समय भी कांग्रेस का साथ दिया था। अब यह अलग ही कहानी है कि तब कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने चुने हुए वीरेन्द्र पाटिल (लिंगायत) मुख्यमंत्री को हटाकर पिछड़े वर्ग के नेता वीरप्पा मोइली को मुख्यमंत्री बना दिया था।

उस समय भी कांग्रेस ने किसी दलित को राज्य की बागडोर नहीं सौंपी। इस घटना के बाद कांग्रेस से जहाँ लिंगायत बिदक गया वहीं अगले चुनाव तक दो मुख्यमंत्री बदले जाने की वजह से कांग्रेस के हाथ से सत्ता जाती रही।

ऐसा नहीं है कि कर्नाटक में दलित नेता ही नहीं हैं, लेकिन देखा यह गया है कि जब भी दलित नेता की बात की जाती है तो उनके रसूख और वे किस हद तक मतदाताओं को पार्टी में लाने की ताकत रखते हैं, इसका आकलन किया जाता है।

यह सच है कि पीएफआई की बढ़ती संदिग्ध गतिविधियों के
कारण केरल के पुलिस महानिदेशक ने इस पर प्रतिबंध
लगाने की पुरजोर वकालत की।

जितने भी दलित नेता बने, वे अपनी जेबी संस्थाओं को तो संरक्षण देते रहे लेकिन दलितों के सशक्त नेता नहीं बन पाए, जैसा कि मुख्यमंत्री सिद्दरामय्या ने बनकर दिखा दिया।

लेकिन उन्होंने उन्हीं दलित नेताओं को अपने साथ रखा जो उनकी जी हुजूरी करते रहे।  उन्होंने अपने धुर विरोधी दलित मंत्री श्रीनिवास प्रसाद को मंत्रिमंडल से बाहर करने में देरी नहीं की।

दलित नेता, पार्टी में मुख्यमंत्री की दावेदारी करने वाले कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष और पूर्व गृहमंत्री जी. परमेश्वर तथा लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ही सिद्दरामय्या के विरुद्ध कुछ नहीं कर पाए।

दलितों की हक की लड़ाई का दावा करने वाली कांग्रेस ने अपने ही दलित नेताओं पर भरोसा नहीं किया जिन्होंने पार्टी को स्थापित करने में जमीनी स्तर तक काम किया है।

1999 में मल्लिकार्जुन खडगे पार्टी के अध्यक्ष थे उस समय वोक्कालिगा नेता एस.एम. कृष्णा को राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया और उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया, खडगे को हाशिए पर डालकर मुख्यमंत्री भी उन्हें ही बना दिया गया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here