कठिन चुनौती में दिग्विजय

चार महीने पहले तक चौराहे पर पस्तहाल पड़ी कांग्रेस को खड़ा करके सत्ता के शिखर पर पहुंचाने के लिए पसीना बहाते रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने शायद यह सपने में भी नहीं सोचा होगा। कल्पना भी नहीं थी कि कमलनाथ उन्हें इस तरह किसी दुर्घर्ष चुनौती में झोंक सकते हैं कि वे राज्य की सबसे मुश्किल भोपाल लोक सभा सीट से चुनाव लड़ें, वह भी तब जबकि राज्यसभा के उनके कार्यकाल में अभी तीन साल बकाया हैं। लेकिन सियासी हकीकत यही है कि, दिग्विजय सिंह को बहत्तर साल की उम्र में जिंदगी की सबसे कठिन चुनावी संघर्ष के लिए मैदान में उतरना पड़ रहा है। दिग्विजय सिंह भले कहते रहे हों कि पार्टी जहां से टिकट देगी वे लडने को तैयार हैं लेकिन वास्तविकता यही है कि राजगढ़ उनकी पसंदीदा सीट रही है। इस इलाके के सौंघिया, गुर्जर दांगी और यादव उनके परंपरागत वोटर बन चुके हैं जो आंख मूंद कर ठप्पा लगाते हैं। लेकिन भोपाल के साथ ऐसा नहीं है। ऐसी सीट जहां पिछले तीस साल से कांग्रेस कभी न जीत पाई हो वहां से दिग्विजय सिंह को चुनाव लड़वाने की क्या वजह हो सकती है? यह समझ पाना दिग्विजय सिंह के समर्थकों के लिए भी मुश्किल साबित हो रहा है। कमलनाथ गृह क्षेत्र छिंदवाड़ा से अपने बेटे नकुल नाथ को मैदान में उतार रहे हैं। कांग्रेस महासचिव ज्योदिरादित्य सिंधिया शिवपुरी, गुना या च्चालियर से स्वयं और अपनी पत्नी प्रियदर्शिनी के लिए टिकट ले सकते हैं। लेकिन दिग्विजय सिंह के लिए इस बात के लागू न हो पाने को भाजपा कमलनाथ की कलाकारी ठहराती है।

पूर्व मंत्री विश्वास सारंग का कहना है कि कमलनाथ ने बड़ी सफाई से अपने रास्ते का कांटा साफ किया है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इसे कांगे्रस के भीतरी घमासान का नतीजा बताते हैं। कांग्रेसी हलकों में भी इस बात के चर्चे हैं कि विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर ज्योतिरादित्य, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह खेमें में जो खींचतान मची थी, ताजा फैसला उसी की देन है। सरकार बनने के बाद दिग्विजय सिंह का पावर सेंटर बनकर उभरना कमलनाथ को नागवार लगने लगा था। इसके संकेत तो तभी मिल गए थे जब दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ कैबिनेट के कुछ मंत्रियों की कार्यशैली को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी तब मंत्री उनके खिलाफ उठ खड़े हुए थे लेकिन कमलनाथ खामोशी ओढ़े रहे।

दिग्विजय सिंह को चुनाव लड़वाने के पीछे किसी भी तरह की राजनीति से कमलनाथ इनकार करते हैं। कमलनाथ का कहना है कि उनसे इंदौर, भोपाल या जबलपुर में से कोई एक क्षेत्र चुनने को कहा गया था। अंत में तय हुआ कि वे भोपाल से चुनाव लड़ेंगे। कमलनाथ का कहना है कि दिग्विजय सिंह खुश हैं या नाखुश, ये वही बता सकते हैं। लेकिन मैं खुश हूं। खुशी न खुशी अपनी जगह है लेकिन राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि दिग्विजय सिंह को भोपाल से चुनाव लड़ाने की घटना राज्य की राजनीति पर दूरगामी असर डालेगी और उसके प्रभाव लोकसभा चुनाव के बाद खुल कर दिखाई देंगे।
दिग्विजय सिंह चुनाव हारें चाहे जीतें दोनों ही स्थितियों में राज्य में कांग्रेस की अंतरकलह, घात-प्रतिघात और कुनबापरस्ती में इजाफा होगा। वैसे भी बेहद महीन बहुमत से जादुई आकड़ा छूने वाली कांग्रेस सरकार के लिए आने वाला वक्त बहुत निरापद नजर नहीं आता। इसे बाहर से समर्थन देने वाले निर्दलीय जिस तरह का दबाव बना रहे हैं। वह कोई शुभ संकेत देने वाला प्रतीत नहीं होता।

एक नजर इस बात पर भी डालते चलें कि दिग्विजय सिंह के भोपाल से लडनÞे पर चुनावी बयार का रुख क्या होगा? शिवराज सिंह चौहान उनके चुनाव लडने के फैसले को ‘बंटाढार रिटर्न्स’ कहते हैं। पंद्रह साल पहले ‘मि. बंटाढार’ का फतवा देकर उमा भारती ने दिग्विजय सिंह से दस साल बाद सत्ता छीनी थी। दिग्विजय सिंह को लेकर जो हिंदू विरोधी छवि गढ़ी जा चुकी है वह भोपाल के चुनावी समर में भारी पडना तय है। हालांकि तीन हजार किमी की नर्मदा परिक्रमा से उनकी इस छवि के दाग काफी हद तक मलिन तो पड़े हैं लेकिन भाजपा नेता विश्वास सारंग और रामेश्वर शर्मा ने उनके नाम का ऐलान होते ही कहा कि, पाकिस्तान में मिठाइयां बंटी हैं। इससे अंदाजा लगता है कि भाजपा ‘हिंदू आतंकवाद’ से लेकर बाटला हाउस एनकाउंटर तक उनके बयानों की शृंखला को चुनाव में भुनाना चाहेगी। जहां तक भोपाल संसदीय क्षेत्र के इतिहास का सवाल है, यहां सरकारी कर्मचारी और कायस्थ मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में मुस्लिम मतों का धु्रवीकरण भी जबरदस्त असर डालता रहा है।

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