असली टक्कर मध्य प्रदेश में

अंतत: ‘न तुझसे कोई गिला और न तू मुझे कुबूल’ के अंदाज में लगभग ‘फिफ्टी -फिफ्टी ’
का जनादेश देकर मतदाताओं ने दोनों प्रमुख पार्टियों-भाजपा व कांग्रेस को बहुमत की
देहरी पर खड़ा कर दिया। मध्य प्रदेश में चुनावी नतीजों में कांग्रेस पार्टी को 114, भाजपा
को 109, बसपा को 2, समाजवादी पार्टी को 1 सीट तथा 4 निर्दलीय चुनाव जीते हैं। हालांकि
वोट हिस्सेदारी के मामले में मैदान में 41-41 फीसद पर अटके रहने के बावजूद केवल पांच सीटों
के अंतर से कांग्रेस जादुई आंकड़े के इतने करीब पहुंच पाई कि सपा-बसपा और पार्टी से बगावत
करके निर्दलीय जीत हासिल करने वाले ‘बागियों’ को साथ लेकर कमलनाथ सरकार बनाने की
दावेदारी करने में कामयाब रहे।


मध्यप्रदेश में इस चुनाव में यद्यपि कोई लहर, हवा या अंडरकरंट जैसी कोई बात भले न हो
लेकिन मंत्रियों-विधायकों, भाजपा कार्यकर्ताओं व नौकरशाहों में बढ़ती अकड़ को लेकर एक
स्वाभाविक जनरोश था। इसे ज्यादा भड़काने का काम दलित एक्ट को लेकर मुख्यमंत्री के ‘माई के
लाल’ वाले बयान ने किया। जैसा कि भाजपा के पूर्व सांसद रघुनंदन शर्मा भी ने स्वीकारा है, इस
एक बयान से पार्टी को कम से कम पंद्रह सीटों का नुकसान पहुंचा होगा। रही-सही कसर कांग्रेस के किसान कार्ड ने पूरी कर दी। कांग्रेस के कर्जमाफी के वायदे से वोटर को डगमगाता देख कर भाजपा ने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की मौजूदगी में छोटी जोत के काश्तकारों को ‘बोनस’ देने की लोकलुभावन घोषणा कर डाली लेकिन यह इतनी देर से हुई कि इसका कोई लाभ भाजपा को नहीं मिला। इसके अलावा स्कूली बच्चियों को स्कूटी देने के अतिरिक्त महिलाओं के हक में पचास से ज्यादा घोषणाएं तो थी हीं।

शिवराज के विरोध में एक बात यह भी गई है कि उन्होने स्वयं वादों और घोषणाओं का अंबार लगा कर अपने लिए ही मुश्किलें खड़ी कर लीं। टिकट वितरण को लेकर कांग्रेस में असंतोष तो था ही, बड़े नेताओं के मतभेद भी ऐन चुनाव के दौरान प्रकट होते रहे लेकिन कांग्रेस से ज्यादा बगावत इस बार भाजपा में दिखाई दी। तीन दर्जन सीटों पर नया चेहरा देने के बावजूद भाजपा के 33 में 13 दिग्गज मंत्री बुरी तरह चुनाव हार गए। उसके बागियों ने भिंड, दमोह, बमोरी, पथरिया, महेश्वर में नुकसान पहुंचाया। हालांकि कांग्रेस को भी बागियों के कारण झाबुआ, महिदपुर में नुकसान का सामना करना पड़ा। कांग्रेस ने पिछले चुनाव की तुलना में अपने वोट बैंक में पांच फीसद का इजाफा किया है जबकि भाजपा को साढ़े तीन फीसद का नुकसान उठाना पड़ा है।

दीगर पार्टियों में बसपा 4.9 फीसद वोट लेकर दो सीटें जीत पाई है, जबकि पिछली बार उसने 6.29 फीसदी मत लेकर चार सीटें जीती थीं। सपा और गोडवाना पार्टी ने एक फीसद वोट लिया भाजपा का गढ़ कहलाने वाले मध्य भारत में इस बार कांगे्रस ने 36 में से 13 सीटें जीतकर शानदार प्रदर्शन किया। कांग्रेस को मालवा निमाड़ में भी जबरदस्त बढ़त मिली, लेकिन विंध्य में उसकी सफलता आशातीत नहीं रही। यहां से उसके दिज्गज नेता अजय सिंह राहुल, राजेंद्र सिंह और सुंदरलाल तिवारी को आश्चर्यजनक तरीके से पराजय का सामना करना पड़ा।

ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस ने अपने वोट बैंक में पांच फीसद का इजाफा करके पिछली बार जीती 38 ग्रामीण सीटों के मुकाबले इस बार 68 सीटें जीत लीं। मोटे तौर पर देखें तो राज्य में भाजपा विरोधी माहौल तो रहा है, लेकिन वैसा भी नहीं कि जैसे छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सुनामी आई है। भाजपा पिछड़ी है, लेकिन पूरी तरह से बाहर नहीं हुई है। इसका श्रेय शिवराजसिंह चौहान की अंत तक किला बचाने के लिए की गई मेहनत को दिया जा सकता है।

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