असम समस्या के लिए जिम्मेदार कौन?

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असल में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश सभी जगह बसे हुए हिन्दुओं को पलायन करना पड़ रहा है। हिन्दू होने के नाते भारत में बसने का उन्हें सहज अधिकार होना चाहिए। वे भारत-विभाजन की त्रासदी झेल रहे हैं। विभाजन में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। वे तो इन सभी क्षेत्रों में बसे हुए मुसलमानों की असहिष्णुता का शिकार हुए हैं। अगर उन्हें भारत में जगह नहीं मिलेगी तो वे कहां जाएंगे?

सम पिछली लगभग एक शताब्दी से अप्रवासियों की समस्या झेल रहा है। इस समस्या की शुरुआत अंग्रेजी शासन काल में ही हो गई थी। ब्रिटिश शासकों ने बीसवीं सदी के आरंभ से ही मुसलमानों के राजनैतिक इस्तेमाल का फैसला कर लिया था। अपनी इसी नीति के अंतर्गत उन्होंने पूर्व बंगाल से मुस्लिम आबादी को असम के उपजाऊ क्षेत्रों में भेजकर यहां का धार्मिक जनभूगोल बदलना शुरू कर दिया था। जब पाकिस्तान की मांग उठी तो असम के जनभूगोल को धार्मिक आधार पर बदलने में मुस्लिम लीग भी लग गई। असम के शांत और समरस समाज पर इसका क्या असर पड़ा होगा, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि देश की आजादी के समय ही असम की समस्या पर केंद्र सरकार तक ने ध्यान दिया था।
केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के निर्देश पर एक राष्ट्रीय नागरिक पंजी तैयार करने का काम शुरू हुआ था। उसका उद्देश्य यह निर्धारित करना था कि कौन असम का मूल निवासी है और कौन पूर्वी बंगाल से आकर वहां जबरन बसाया गया है? 1951 की जनगणना के समय यह पंजी तैयार करने का काम शुरू हुआ था। यह निर्णय लेते समय उसमें क्या समस्याएं आएंगी, इसका किसी को अनुमान नहीं था। पहली समस्या तो विदेशी नागरिक कानून से ही संबंधित थी। 1946 के विदेशी नागरिक कानून में यह स्पष्ट नहीं था कि पाकिस्तान के नागरिक इसकी परिधि में आते हैं या नहीं। 1957 में जाकर कानून में संशोधन हो पाया। इसी तरह पासपोर्ट और वीजा के प्रावधान 1952 में लागू हुए थे। उससे पहले गैर-कानूनी अप्रवासियों को वापस भेजा जाना संभव नहीं था। इन सब व्यावहारिक कठिनाइयों के चलते पंजी पूरी करने का यह काम अटका रहा। लेकिन पूर्वी पाकिस्तान से प्रताड़ित हिंदुओं और जमीन हड़पने के लोभ में आने वाले मुसलमानों की संख्या असम की आबादी में बढ़ती गई। असम में राजनैतिक आंदोलन शुरू होने लगे।

1965 में एक बार फिर यह पंजी पूरी करने और 1966 के बाद वहां आने वाले लोगों को चिन्हित करके उन्हें वापस भेजने का फैसला लिया गया। केंद्र और राज्य सरकार ने असम के सभी नागरिकों को एक पहचान पत्र देने का भी निर्णय लिया। लेकिन अगले ही वर्ष उसे अव्यावहारिक मानकर रद्द कर दिया गया।

इस बीच लोकतांत्रिक राजनीति के निहित स्वार्थ प्रकट होने लगे। राज्य में कांग्रेसी सरकारें थीं। राज्य के कुछ कांग्रेसी नेताओं को इन अप्रवासियों में अपने वोट बैंक दिखाई देने लगे। अंग्रेजों की विदाई के कुछ दशक बाद ही इन कांग्रेसी नेताओं को पूर्वी पाकिस्तान जो बाद में बांग्लादेश हुआ, से आए लोगों का राजनैतिक उपयोग दिखाई देने लगा। इसकी प्रतिक्रिया हुई और 1979 में असम आंदोलन शुरू हो गया। आरंभ में छात्रों द्वारा छेड़ा गया यह आंदोलन जल्दी ही पूरे असमिया समाज को अपने में समाहित करने में सफल हो गया। असम आंदोलन दुनिया का सबसे अहिंसक और सघन भागीदारी वाला आंदोलन था। अंतत: केंद्र सरकार को उस आंदोलन के सामने झुकना पड़ा और राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में 15 अगस्त 1985 को एक समझौता हुआ। इस समझौते के अंतर्गत 1966 के बाद असम में आकर रह रहे पूर्वी पाकिस्तान जो बाद में बांग्लादेश हुआ, के लोगों को चिन्हित करना और वापस भेजा जाना था। राष्ट्रीय नागरिक पंजी पर फिर से काम शुरू हुआ। इस बीच असम आंदोलनकारियों की भी सरकारें बनीं। आज असम में भाजपा की सरकार है। असम की सब सरकारें गैर-कानूनी अप्रवासियों को वापस भेजने का संकल्प दोहराती रही हंै। लेकिन समस्या ज्यों की त्यों बनी रही है। व्यवहार में 2010 में कामरूप और बारपेटा जिले के दो मंडलों में एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर विदेशियों को चिन्हित करने का काम शुरू हुआ था। लेकिन उससे इतनी अशांति भड़की कि पुलिस को गोली चलानी पड़ी और चार लोग मारे गए। उसके बाद यह काम भी ठप हो गया।

उसके कोई तीन वर्ष बाद 2013 में राज्य की ओर से सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया। सर्वोच्च न्यायालय से राष्ट्रीय नागरिक पंजी को अद्यतन करने का निर्देश देने का आग्रह किया गया। यह मामला जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस नरीमन की खंडपीठ के पास गया। जस्टिस गोगोई स्वयं असमिया हंै, इसलिए वे समस्या से परिचित थे। उन्होंने राष्ट्रीय नागरिक पंजी के अद्यतन किए जाने का निर्देश दिया। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर 6 दिसम्बर 2013 से राष्ट्रीय नागरिक पंजी को अद्यतन करने का काम शुरू हुआ। उसका पहला प्रारूप 31 दिसम्बर और 1 जनवरी 1917 की मध्य अवधि तक की गणना पर आधारित था। उसमें एक करोड़ 90 लाख नागरिक दर्ज किए गए थे। अंतिम प्रारूप 20 जुलाई 2018 की मध्य रात्रि तक की गणना पर आधारित था। उसमें 2.89 करोड़ नागरिकों के नाम शामिल हुए। असम की आबादी तीन करोड़ 29 लाख है। इस तरह इस पंजी में लगभग 40 लाख लोगों के नाम नहीं थे। उसके बाद पंजी की भूलों पर ध्यान दिया जाना शुरू हुआ और सर्वोच्च न्यायालय ने जिनके नाम छूट गए हैं, वे दस गिनाए गए प्रमाण पत्रों में से किसी एक के आधार पर नाम जुड़वाने का आवेदन कर सके, इसकी अंतिम तारीख निश्चित की। जिनके नाम गलत दर्ज हुए हैं, उनके बारे में शिकायत दर्ज करने का भी अधिकार दिया गया। इस सबकी अंतिम तारीख बढ़ती रही है। अब सर्वोच्च न्यायालय ने 31 दिसंबर 2018 को अंतिम तिथि घोषित किया है। लेकिन लगता नहीं कि उस तिथि तक भी यह काम संतोषजनक तरीके से पूरा हो पाएगा। लेकिन पंजी आधिकारिक मान ली गई तो भी क्या गैर-कानूनी अप्रवासियों की समस्या समाप्त की जा सकेगी?

मुख्य समस्या यह है कि बांग्लादेश यह मानने को तैयार नहीं है कि उसका कोई नागरिक असम में रह रहा है। इसलिए अगर राष्ट्रीय नागरिक पंजी के आधार पर आप किसी को गैर-कानूनी रूप से बसा अप्रवासी ठहरा भी दें तो उसे वापस बांग्लादेश नहीं भेजा जा सकता। बांग्लादेश में इस समय शेख हसीना का शासन है। वे भारत के अनुकूल मानी जाती हैं। लेकिन इस मामले में वे भी कोई छूट देने को तैयार नहीं हंै। अभी राष्ट्रीय नागरिक पंजी में असम में रह रहे चालीस लाख लोगों के नाम नहीं हंै। अगर पंजी के सुधार की प्रक्रिया में उसमें कुछ और नाम हट भी जाते हैं तो भी 35-36 लाख लोगों का क्या होगा, यह किसी को स्पष्ट नहीं है। आप इतनी बड़ी संख्या में लोगों को कारागार में नहीं डाल सकते। जेलनुमा कैंपों में नहीं रख सकते। जस्टिस रंजन गोगोई जिन्होंने राष्ट्रीय नागरिक पंजी को अद्यतन करने के निर्देश दिए थे, आज देश के मुख्य न्यायाधीश हंै। वे असम की आंतरिक स्थिति को भी जानते हैं। वहां आप कुछ हजार लोगों को गैर-कानूनी रूप से रहने के कारण निकालने की कोशिश करें तो दंगा हो जाएगा। आज जो अंतरराष्ट्रीय स्थिति है, उसे देखते हुए लाखों लोगों को तो घेरकर रखा ही नहीं जा सकता। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार की दुहाई देने वाले अनगिनत समूह खड़े हो जाएंगे। इस समस्या की व्यावहारिक दिक्कतें क्या हो सकती हंै, इसका अंदाज रोहिंग्या समस्या से लगाया जा सकता है। उन्हें म्यांमार से जम्मू-कश्मीर तक पहुंचा दिया गया। हमारा प्रशासन जब चेता तब तक उनकी हिमायत सर्वोच्च न्यायालय तक में होने लगी। हम अभी तक किसी रोहिंग्या को वापस नहीं भेज पाए।

इस समस्या का एक और पहलू बांग्लादेश से आकर बसे हिन्दू हैं। बांग्लादेश में हिन्दू निरंतर प्रताड़ित होते रहे हैं। उनकी जान और संपत्ति की वहां कोई सुरक्षा नहीं है। असल में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश सभी जगह वहां बसे हुए हिन्दुओं को पलायन करना पड़ रहा है। हिन्दू होने के नाते भारत में बसने का उन्हें सहज अधिकार होना चाहिए। वे भारत विभाजन की त्रासदी झेल रहे हैं। भारत के विभाजन में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। वे तो इन सभी क्षेत्रों में बसे हुए मुसलमानों की असहिष्णुता का शिकार हुए हैं। अगर उन्हें भारत में जगह नहीं मिलेगी तो वे कहां जाएंगे? उनके लिए अंतरराष्ट्रीय संगठन भी आवाज नहीं उठाते। अभी भारत सरकार नागरिक कानून में संशोधन करके उन्हें भारतीय नागरिकता दिलवाना चाहती है। लेकिन इसका सबसे अधिक विरोध असम में ही हो रहा है। असमिया नेताओं का कहना है कि केवल वही प्रताड़ित होकर आए हिन्दुओं का बोझ क्यों उठाए? देश बड़ा है और उन्हें अन्यत्र बसाया जा सकता है। बांग्लादेश से प्रताड़ित होकर आए हिन्दुओं की अधिकांश आबादी असम की बराक घाटी में है। वहां की आबादी में आधे हिन्दू हैं और उससे कुछ ही कम मुसलमान। क्या इन हिन्दुओं को वापस बांग्लादेश खदेड़ा जा सकता है? क्या वह नैतिक रूप से सही होगा? असम के नेताओं ने 1979 में जब असम आंदोलन छेड़ा था तब भी यही कहा था कि वे बांग्लादेश से आए सभी लोगों के खिलाफ हंै। उन्होंने असमिया लोगों के समाज की समरसता भंग कर दी है। आज भी वे अपने आपको हिन्दुओं की त्रासदी से अलग ही रखे हुए हैं। उनके विरोध के कारण केंद्र सरकार अभी तक नागरिकता कानून में परिवर्तन करने का निर्णय नहीं कर पाई। उनकी वजह से देश के अन्य भागों में रह रहे उन हिन्दुओं को भी नागरिकता नहीं मिल पा रही, जो पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश से आकर भारत में रह रहे हैं।

हम आज असम में गैर-कानूनी रूप से रह रहे अप्रवासियों की समस्या की छाया से ही लड़ रहे हैं। यह समस्या अगर 1950 में ही देख ली गई थी और केंद्र तथा राज्य दोनों सरकारें उसके बारे में गंभीर थी तो फिर यह पिछले 68 वर्ष लटकी क्यों रही? इसका उत्तर यही है कि हमारा राजनैतिक नेतृत्व प्रकट नहीं तो अप्रकट रूप से बंटा हुआ था। राष्ट्रीय नागरिक पंजी बनाने की पहल केंद्र के गृह मंत्रालय की थी। लेकिन सरदार पटेल के निधन से वह पहल कमजोर पड़ी। हमारा राष्ट्रीय नेतृत्व दुविधाग्रस्त न होता तो उस समय राष्ट्रीय नागरिक पंजी बनाना और पूर्वी पाकिस्तान से आकर असम में रह रहे लोगों की पहचान करना मुश्किल नहीं था। उस समय के माहौल में उन्हें वापस जाने के लिए विवश भी किया जा सकता था। उस समय वे कौन लोग थे, जो इसे लेकर दुविधाग्रस्त थे, इसका हम अनुमानभर लगा सकते हैं। उसके प्रमाण ढूंढ़ना मुश्किल काम होगा। लेकिन यह स्पष्ट है कि इस समस्या को जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा था। अगर हर दस वर्ष पर होने वाली जनगणना को ही देखें तो समझ में आ जाएगा कि 1951 से 1991 तक असम की जनसंख्या में अस्वाभाविक वृद्धि हो रही थी। 1951 से 1971 तक असम की जनसंख्या 35 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी। उसके बाद यह वृद्धि दर 25 प्रतिशत हो गई। 1991 के बाद के दो दशकों में क्रमश: 19 और 17 प्रतिशत वृद्धि हुई है। क्या जनसंख्या में 35 प्रतिशत वृद्धि दर हमारे राजनेतओं और प्रशासकों को दिखाई नहीं दे रही थी? क्यों राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर इतनी लापरवाही बरती गई?

पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भागकर आये लोगों को भारत सरकार नागरिक कानून में संशोधन करके नागरिकता दिलवाना चाहती है। इसका सबसे अधिक विरोध असम में ही हो रहा है। असमिया नेताओं का कहना है कि केवल वही प्रताड़ित होकर आए हिन्दुओं का बोझ क्यों उठाए? देश बड़ा है और उन्हें अन्यत्र बसाया जा सकता है।

हमारे राजनैतिक नेतृत्व की दुविधा उस समय-सीमा को लेकर भी उजागर हो जाती है जब से गैर-कानूनी अप्रवासियों को चीन्ह कर निकाला जाना है। शुरू में यह कहा गया कि 1950 के बाद पूर्वी पाकिस्तान से आए लोगों को पहचान कर वापस भेजा जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और हारकर असमिया लोगों ने 1979 में आंदोलन का रास्ता पकड़ लिया। छह वर्ष तक चले अभूतपूर्व शांतिमय व बड़ी भागीदारी वाले आंदोलन के बाद एक समझौता हुआ, उसके आधार पर 1966 के बाद असम में पूर्वी पाकिस्तान और बाद के बांग्लादेश से आए लोगों को पहचान कर वापस भेजा जाना था। लेकिन इस समझौते की तय सीमा भी अनदेखी कर दी गई। इसके बाद 24 मार्च 1971 की मध्य रात्रि के बाद असम से आए बांग्लादेशियों की पहचान करके उन्हें वापस भेजने की घोषणा होने लगी।

भारत हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं?
समाज में यह सब अनदेखा बना रहा हो, ऐसा नहीं है। उसकी प्रतिक्रिया भी होती है। इस प्रतिक्रिया का एक स्वरूप मेघालय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुदीप रंजन सेन

की हाल में की गई टिप्पणी में देखा जा सकता है। वे राष्ट्रीय नागरिक पंजी से संबंधित एक याचिका की सुनवाई कर रहे थे। अपना निर्णय लिखवाते हुए उन्होंने पंजी के दोषों की ओर संकेत किया और कहा कि उसमें बहुत से अवैध नाम जुड़ गए हैं और जो लोग वास्तव में असम के नागरिक हैं, उनके नाम छूट गए हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह टिप्पणी की कि देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान ने अपने आपको इस्लामी देश घोषित कर दिया। उसी समय भारत को अपने आपको हिन्दू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए था। अगले दिन उन्होंने अपनी सफाई दी कहा कि आज भारत एक सेक्यूलर देश है और वे उसमें मुस्लिम या अन्य धर्मांवलंबियों के शांतिपूर्वक रहने के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन भारत को हिन्दू बहुल होने के कारण हिन्दू राज्य के रूप में देखने की इच्छा देश के बहुत से लोगों में होगी। उसका निश्चय ही यह अर्थ नहीं है कि तब यहां के गैर-हिन्दू अवैध नागरिक हो जाएंगे। उसका अर्थ यह है कि भारत अपने बहुलांश की सभ्यता का वाहक होगा और ऐसा ही उसे होना चाहिए। यह इच्छा किसी भी तरह अनुचित नहीं कही जा सकती। असम समस्या अब इतनी जटिल बना दी गई है कि अब उसका किसी के पास कोई इलाज नहीं है। राष्ट्रीय नागरिक पंजी एक औपचारिक दस्तावेज होकर रह जाने वाली है क्योंकि हमारे राजकीय प्रतिष्ठान में इतनी शक्ति नहीं है कि वह लाखों लोगों को गैर-कानूनी घोषित करके उनके मूल देश वापस भेज सके। असम के राजकीय प्रतिष्ठान ने कुछ अधिक शक्ति दिखाई तो अधिक से अधिक यह होगा कि कुछ लाख लोग असम से निकलकर देश के अन्य भागों में बिखर जाएंगे। देश के अन्य भागों के लिए तो कोई राष्ट्रीय नागरिक पंजी है नहीं। /su_note]

सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर राष्ट्रीय नागरिक पंजी को अद्यतन करने के निर्देश भी इसी तिथि के आधार पर हैं। जो लोग उससे पहले असम में आकर रह रहे हैं, उन्हें वैध मान लिया गया है। यह अपने आपमें इस बात का प्रमाण है कि हमारा राजनैतिक और प्रशासनिक तंत्र इस समस्या को लेकर लगातार दुविधाग्रस्त बना रहा। केवल चुनाव के समय इस समस्या से निपटने की दुहाई दी जाती रही। इससे हमारे यहां की चुनावी राजनीति के स्वरूप का भी पता लगता है कि किस तरह वोट बैंक बनाने के लोभ में राजनैतिक दल देश के व्यापक हितों को भूल जाते हैं। लोकतंत्र दरअसल जनता का शासन नहीं रह गया, जनता को बांटकर शासन करने का तरीका हो गया है। उसका यही स्वरूप अंग्रेजों के समय था। उन्हीं से हमारे नेताओं ने यह सब सीख लिया है।

 

 

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