अब कांग्रेसी एजेंडा

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मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वसुंधरा सरकार के चार फैसलों को तत्काल प्रभाव से बदल दिया। उनमें सबसे प्रमुख है नगर निकायों में सभापति, महापौर और पालिका अध्यक्ष का चुनाव सीधे करवाये जाने का फैसला। मुख्यमंत्री ने वसुंधरा सरकार के आखिर छह माह में लिये गये सभी फैसलों की समीक्षा का मन बनाया है।अ

प्रदेश में नई कांग्रेस सरकार के फैसलों की पहली बड़ी धमक 23 दिसम्बर को सुनाई दी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की पहली बैठक में पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के चार अहम फैसलों को बदल दिया गया। अब फिर से प्रदेश में नगर निकायों में सभापति, महापौर और पालिकाध्यक्षों का चुनाव सीधे होगा। अपने पिछले कार्यकाल में कांग्रेस ने इसे शुरू किया था जिसे भाजपा ने बंद कर दिया था। पिछली भाजपा सरकार ने 2014 में पंचायती राज और 2015 में स्थानीय निकायों में शैक्षणिक योग्यता जरूरी की थी। जिला परिषद और पंचायत सदस्य का दसवीं पास होना जरूरी था। इसी प्रकार गैर अनुसूचित क्षेत्र में सरपंच के लिए आठवीं पास होना और अनुसूचित क्षेत्र में पांचवीं पास होना जरूरी था। पंचायती राज संस्थाओं और निकायों के चुनाव के लिए तय की गई न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता को हटा दिया गया है। तर्क दिया गया है कि लोकतंत्र में सभी नागरिकों को चुनाव लड़ने का अधिकार है।
कांग्रेस के पिछले शासन में शुरू किए गए डा. भीमराव अंबेडकर विधि विश्वविद्यालय और हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय को भी फिर से शुरू किया जाएगा । गहलोत ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान वर्ष 2012 में इन संस्थानों की शुरुआत की थी। अंबेडकर विधि विश्वविद्यालय और पत्रकारिता युनिवर्सिटी शुरू की थी। भाजपा सरकार ने इन्हें दो साल पहले बंद कर दिया था। फसली ऋण माफी के महत्वपूर्ण मुद्दे पर मापदंड तय करने के लिए सरकार ने नई अंतवर््िाभागीय समिति के गठन का फैसला किया है। यह समिति सहकारी बैंक, राष्ट्रीयकृत बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक ओर भूमि विकास बैंक की ऋण माफी के लिए पात्रता और मापदंड तैयार करेगी । लोकसभा चुनावों को निकट देख वृद्धावस्था पेंशन में ढाई सौ रुपये की वृद्धि कर दी गई। सरकारी लेटर हेड पर भाजपा के पुरोधा पं. दीनदयाल उपाध्याय का फोटो लगाने की अनिवार्यता को भी खत्म कर दिया गया। भाजपा सरकार ने पिछले साल 13 दिसम्बर को सरकारी लेटर हेड पर अशोक चिन्ह के साथ पं. दीनदयाल उपाध्याय का चित्र अनिवार्य कर दिया था।
इधर परम्परागत तौर पर कांग्रेस सरकार ने भी भाजपा सरकार के आखिरी 6 माह के फैसलों की समीक्षा का मन बना लिया है। मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने चुनावी घोषणा पत्र को नीतिगत दस्तावेज के रूप में रखा और इसमें की गई घोषणाओं में से सात को मंजूरी दे दी। एक अहम फैसले में मंत्रियों को नियमित जनसुनवाई के लिए भी पाबंद किया गया है। सभी मंत्री अपने आवास पर सुबह 9 से 10 बजे तक जनसुनवाई करेंगे। मंत्रिमंडल की बैठक में हुए बड़े फैसलों में बाड़मेर रिफायनरी के काम को गति प्रदान करने का निर्णय लिया गया। स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव करने के लिए भी एक कमेटी का गठन किया गया। शिक्षाविदों की यह कमेटी पिछली सरकार के दौरान हुए बदलावों की जांच करेगी। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने सबसे ज्यादा बदलाव हिन्दी, इतिहास और राजनीतिक विज्ञान की पाठ्य पुस्तकों में किए थे। उदाहरण के लिए हिन्दी की पुस्तक में झांसी की रानी का पाठ हटाया गया था। इसके पीछे तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का कहना था कि झांसी की रानी पाठ के कुछ अंश उनके सिंधिया रजवाड़ा परिवार के पुरोधाओं को लांछित कर रहे थे। अशोक गहलोत सरकार की इस पूरी कवायद में दो बातें विशेष महत्वपूर्ण हैं। पहली-चुनावी घोषणा पत्र को नीतिगत दस्तावेज बनाकर सरकार के प्रति जनता का भरोसा मजबूत किया है। दूसरी-योजनाओं के प्रभावी अमल को लेकर गहलोत की पारखी निगाहें स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल पर टिकी है। नई अंतर्विभागीय समिति समेत सभी योजनाओं के त्वरित क्रियान्वयन की जिम्मेदारी धारीवाल को सौंपी गई है। जाहिर है मुख्यमंत्री गहलोत के बाद धारीवाल सबसे कद्दावर मंत्री के रूप में उभरे हैं।

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