अंडमान में नेताजी

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त 30 दिसम्बर को पोर्ट ब्लेयर के नेताजी स्टेडियम में एक ऐसा दृश्य उत्पन्न हो गया था जिसे देखकर अनेक वामपंथियों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो पा रहा होगा। वहां जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उपस्थित विशाल जनसमूह से कहा कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए अपने-अपने मोबाइल की μलैश लाइट्स आॅन कर लीजिए, तो कुछ ही सेकंड में पूरा स्टेडियम μलैश लाइट से जगमगा उठा। उसके बाद जब मोदी ने लोगों से नारे लगवाए, तो ‘नेताजी जिन्दाबाद’ और ‘सुभाष बाबू जिन्दाबाद’ के नारों से आकाश गूंज उठा। इसके साथ ही पिछले सात दशकों से वामपंथी बुद्धिजीवियों और कुछ कांग्रेसियों द्वारा फैलाया गया यह भ्रम टूट गया कि अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के लोग नेताजी को नापसंद करते हैं। इसके पीछे उनका यह तर्क हुआ करता था कि जापानी नौसेना ने 1942 से 1945 तक इन द्वीपों पर अपने नियंत्रण के दौरान द्वीपवासियों पर बहुत अत्याचार किए थे। नेताजी ने जापानियों से सहयोग लिया था। लिहाजा द्वीपवासी जापानियों के साथ ही नेताजी के भी विरोधी हैं।
जब-जब लोकसभा में अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह का नेताजी द्वारा दिया गया नाम ‘शहीद और स्वराज द्वीप’ फिर से रखे जाने की मांग उठी, इन द्वीपों से कांग्रेसी प्रतिनिधियों (केआर गणेश और मनोरंजन भक्त) ने उसका डटकर विरोध किया। 70 के दशक में नेताजी के एक अनुयायी पश्चिम बंगाल से सांसद प्रो. समर गुहा ने इन द्वीपों के नाम नेताजी की इच्छानुसार रखने की मांग की थी। इस पर लोकसभा में बहस हुई। इन द्वीपों से प्रतिनिधि केआर गणेश (वे इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में वित्त राज्यमंत्री थे) ने उस मांग का जोदार विरोध करते हुए कहा कि यह सदन द्वीपवासियों की भावनाओं का सम्मान करे, जो कि नेताजी की इस द्वीपसमूह में भूमिका का विरोध करते हैं। 1978 में जनता सरकार के समय में भी कांग्रेसी सांसद मनोरंजन भक्त के विरोध के कारण तत्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह ने यह कहर प्रो. समर गुहा की मांग को खारिज कर दिया था कि ऐसी मांग उन द्वीपवासियों की तरफ से ही आनी चाहिए। उसके बाद किसी ने भी गंभीर प्रयास नहीं किए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण के बीच में जब रॉस आइलैंड का नाम ‘नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वीप’ रखने की घोषणा की, तो द्वीपवासियों ने हर्षोल्लास के साथ इसका स्वागत किया। इसी तरह नील आइलैंड का नाम ‘शहीद द्वीप’ तथा हैवलॉक आइलैंड का नाम ‘स्वराज द्वीप’ रखने की उन्होंने घोषणा की तो उपस्थित जनसमूह ने जोरदार करतल ध्वनि से उसका स्वागत किया। प्रधानमंत्री ने यहां डीम्ड यूनिवर्सिटी का निर्माण करने तथा उसका नाम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नाम पर रखने की घोषणा की। लोगों ने भारी हर्ष व्यक्त किया।

पोर्ट ब्लेयर के नेताजी स्टेडियम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस द्वीपसमूह में राष्ट्रीय शर्म के प्रतीक नील और हैवलॉक के नामों को दो द्वीपों से हटाकर उन्हें शहीद द्वीप और स्वराज द्वीप नाम देकर तथा रॉस आइलैंड का नाम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वीप रखकर एक एतिहासिक कार्य किया है। स्वयं द्वीपवासियों ने स्टेडियम में नेताजी के प्रति असाधारण सम्मान व्यक्त करके यह दिखा दिया है कि नेताजी के प्रति आदर व्यक्त करने में वे मुख्य भूमि के निवासियों से कहीं पीछे नहीं हैं।

पोर्ट ब्लेयर में नेताजी द्वारा 30 दिसम्बर 1943 को तिरंगा फहराए जाने की ऐतिहासिक घटना के 75 वर्ष पूरे होने पर आयोजित समारोह में भाग लेने के लिए ही पोर्टब्लेयर के नेताजी स्टेडियम में इस द्वीपसमूह के कोने-कोने से लोग पहुंचे थे। उनके प्रतिनिधि विष्णु पदा रे, जो कि भाजपा सांसद हैं, टीवी पर नेताजी का गुणगान कर रहे थे। यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि नेताजी के आलोचक वामपंथियों, कांग्रेसियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इन द्वीपों में ‘अंग्रेज़ों के एजेन्ट’ भारतीयों की करतूतों और उनकी प्रतिक्रिया में जापानियों की क्रूरताओं का पूरा सच निष्पक्षता के साथ कभी प्रस्तुत नहीं किया। 7 दिसम्बर 1941 को पर्ल हार्बर (अमेरिका) पर आक्रमण के बाद जापान भी द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल हो गया था। महज तीन महीनों के अंदर जापानी फौज ने फिलीपींस, हांगकांग, मलेशिया, बर्मा आदि को जीत लिया था। दिल्ली स्थित अंग्रेज सरकार समझ चुकी थी कि अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह पर जापानी सेना किसी भी क्षण कब्जा कर सकती है। इसीलिए 1942 के फरवरी-मार्च महीनों में अंग्रेज अधिकारी, कर्मचारी और उनके परिवारों ने बहुत तेजी से द्वीपसमूह छोड़ दिया था। 23 मार्च 1942 को जब जापानी नौसेना ने इस द्वीपसमूह पर कब्जा किया तो उसे किसी भी प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा। द्वीपवासियों का हृदय जीतने के लिए जापानियों ने यहां की कुख्यात सेल्युलर जेल से कैदियों को रिहा कर दिया। उन्होंने मार्शल ला नहीं लगाया। इसके विपरीत भारतीयों को साथ लेकर उन्होंने नागरिक प्रशासन बहाल किया। तीसरे दिन ही एक अप्रिय घटना घट गई। पोर्ट ब्लेयर के अबरदीन क्षेत्र में मुर्गों को पकड़ने की कोशिश में कुछ जापानी सैनिक एक घर में घुस गए। मुर्गे पकड़कर जब वे बाहर आ गए तो वहां उपस्थित मुस्लिम युवाओं ने इस पर घोर आपत्ति व्यक्त की।
उनमें से एक नौजवान जुल्फिकार अली एअर गन निकाल लाया और जापानियों पर फायर कर दिया। सैनिक उस समय तो भाग गए। मगर बाद में बड़ी संख्या में जुल्फिकार को गिरμतार करने आ गए। अगले दिन वह पकड़ा भी गया और उसकी हत्या कर दी गई। इसके बाद द्वीपसमूह में अंग्रेजों के भारतीय एजेंट सक्रिय हो गए। जापानियों के खिलाफ निरंतर अफवाहें फैलाकर उनके विरुद्ध वातावरण निर्मित करने में वे पूरी तरह सफल हो गए। कुछ समय बाद जापानियों पर अंग्रेजों की वायुसेना के हमले होने लगे। जापानियों की हर लोकेशन, उनकी गतिविधियों की ‘सटीक सूचनाएं’ अंग्रेजों के पास होती थीं। जब कुछ जापानी सैनिकों को गावों में शिμट कर दिया गया, तब वहां भी मित्र राष्ट्रों की सेनाएं हवाई हमले करने लगीं। ऐसे ही समुद्र के समीप स्थित एक गांव में सुबह समुद्र में स्रान करते समय जापानियों पर अचानक सतह पर प्रकट हुई पनडुब्बी से हमले में भारी संख्या में जापानी नौसैनिक मारे गए। जापानी समझ गए कि द्वीपों में रहने वाले भारतीय ही अंग्रेजों के लिए जासूसी कर रहे हैं, क्योंकि जो दो-चार अंग्रेज यहां थे, वे जापानियों की कड़ी निगरानी में थे। यह सच भी है कि द्वीपसमूह में अंग्रेजों के वफादार भारतीय बहुत बड़ी संख्या में थे। लेकिन जासूसी के कारण मात्र शक के आधार पर अनेक निर्दोष लोगों को भी जापानियों की कठोरता का सामना करना पड़ा। द्वीपों में भारतीय-जापानियों के मध्य ऐसे तनावपूर्ण संबंधों के बीच नवम्बर 1943 में द्वीपसमूह की स्थिति में महत्त्वपूर्ण मोड़ आया।
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में आज़ाद हिन्द सरकार का गठन किया था, जिसे दो दिन बाद ही जापान सरकार ने भारत की वैध सरकार के रूप में मान्यता दे दी थी। नेताजी की असाधारण कूटनीति और उनके महान व्यक्तित्व से प्रभावित जापानी प्रधानमंत्री जनरल तोजो ने 6 नवम्बर 1943 को यह द्वीपसमूह नेताजी की सरकार को सौंपने की घोषणा कर दी।
सुभाष चन्द्र बोस 29 दिसम्बर 1943 को जापानी वायुसेना के विमान से सुबह 11:30 बजे पोर्ट ब्लेयर आए। जापानी नौसेना के एडमिरल इशीकावा सहित अनेक जापानी अधिकारियों ने हवाई अड्डे पर उनकी आगवानी की। उसी दिन जापानी अधिकारी उन्हें रॉस आइलैंड ले गए। नेताजी यहां चीफ कमिश्नर के बंगले में ठहरे। अगले दिन नेताजी ने पोर्ट ब्लेयर में सेल्युलर जेल का भ्रमण किया। तब इस जेल में कोई भारतीय देशभक्त बंदी नहीं था। सभी स्वाधीनता सेनानियों को ब्रिटिश सरकार 1938 तक या तो रिहा कर चुकी थी या फिर उन्हें मुख्य भूमि की किसी जेल में शिμट कर दिया गया था।
30 दिसम्बर 1943 का दिन भारत के इतिहास का एक अविस्मरणीय दिन है जब भारत के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में नेताजी ने पोर्ट ब्लेयर के जीमखाना मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इसी के साथ अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह आज़ाद हिन्द सरकार के अधीन हो गया। यह पहला भारतीय भू-भाग था जो इस सरकार के अधिकार में आया था और 15 अगस्त 1947 से लगभग चार वर्ष पूर्व ही स्वाधीन हो गया था। नेताजी ने अंडमान को ‘शहीद द्वीप’ तथा निकोबार को ‘स्वराज द्वीप’ नाम दिया। जीमखाना मैदान पर ही नेताजी ने एक जनसभा को सम्बोधित किया जिसमें उन्होंने लोगों से देश की आज़ादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपील की। उसी दिन उन्होंने जापानी एडमिरल इशीकावा को रात्रिभोज दिया। अगली सुबह उन्होंने पोर्ट ब्लेयर में एक और जनसभा को सम्बोधित किया और तत्पश्चात वे सिंगापुर लौट गए।
नेताजी ने सुरक्षा की दृष्टि से इन द्वीपों पर जापानी नौसेना का नियंत्रण बने रहने दिया। यहां का नागरिक प्रशासन संभालने के लिए उन्होंने आज़ाद हिन्द फौज के ले. कर्नल ए.डी. लोगनाथन को चीफ कमिश्नर नियुक्त किया, जो 14 फरवरी 1944 को अपनी टीम के साथ पोर्ट ब्लेयर पहुंचे। उनके आने के बाद स्थितियों में काफी सुधार हुआ। जासूसी के शक में गिरμतार कई लोग रिहा कर दिए गए। बाद में जापानियों द्वारा गिरμतार लोगों पर मुकदमे की विधिवत प्रक्रिया के लिए सिंगापुर से एक जज को भी लाया गया, जिसने निर्दोषों को रिहा किया। परन्तु जासूसी की घटनाएं इतनी बढ़ती जा रही थीं और जापानियों तथा द्वीपों की सुरक्षा को खतरा इतना अधिक बढ़ गया था कि एक सीमा के बाद आजाद हिन्द सरकार के नागरिक प्रशासन ने ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया। बाद में महायुद्ध की स्थितियों में भारी परिवर्तन आया। जापान को लगातार पराजयों का सामना करना पड़ा और 7 अक्टूबर 1945 को अंडमान- निकोबार द्वीपसमूह पर ब्रिटिश फौज का पुन: कब्जा हो गया।

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