रेरा को ठेंगा दिखाते बिल्डर

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नोएडा में यूनीटेक का कास्केड नाम का प्रोजेक्ट है। इसमें कुल आठ टावर हैं निवेशकोंसे वादा किया गया था कि 2012 में उन्हें घर मिल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। घर की जगह खरीददारों को आश्वासन मिला, जो सालों तक चलता रहा।

इससे तंग आकर खरीददारों ने कोर्ट का दरवाजा खट–खटाया। उन्होंने मांग की कि कंपनी उनका पैसा वापस करे। कंपनी बहाना बनाने लगी। कहने लगी कि उसके पास रुपए नहीं हैं। कोर्ट की सख्तीके बाद वह रास्ते पर आई। पर अभी तक खरीददारों को कुछ हासिल नहीं हुआ है।

कुछ इसी तरह के हालात विस्टा प्रोजेक्ट (गुरुग्राम) को लेकर भी है। यहां भी खरीददारों को मकानतय समय पर नहीं मिला है। यूनीटेक से अलग कहानी जेपी इंफ्रा की नहीं है। उनसे भी निवेशकपरेशान हैं। एक दशक बीत जाने के बाद भी उन्हें घर नहीं मिला।

यही नहीं, खरीददारों को मकान देने के बाद भी बिल्डर परेशान करते हैं। उनसे तरह–तरह के खर्चमांगते हैं। मसलन रख–रखाव का। खर्च न देने पर प्रोजेशन तक नहीं देते। विरोध करने पर बाउंसरोंसे मार–पिटाई कराते हैं। हद तो तब हो जाती है जब पुलिस बिल्डरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहींकरती।

कानून को बने तीन महीने हो चुके हैं, पर एनसीआर के खरीददारों को कोई
राहत नहीं मिली है। राज्य सरकार भी इस दिशा में कोई ठोस कदम
नहीं उठा पाई है। उधर बिल्डर लॉबी रेरा को कमजोर करने में जुटी है।

खरीददारों को इस जंजाल से बाहर निकालने और बिल्डरों की धांधली खत्म करने के लिए संसद नेरेरा (रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट एक्ट) लाया। इसमें खरीददारों के हितों की रक्षा के लिएकई प्रावधान किए गए हैं।

हालांकि रियल एस्टेट से जुड़े लोग रेरा को लेकर मायूस हैं। दीपक बंसल कहते हैं, ‘रेरा महजझुनझुना है। उससे बिल्डरों का कुछ होने वाला नहीं हैं। उन्हें कानून से खेलना आता है।‘ लंबी बातचीतमें ‘ग्लोबस इनवेस्टर वेलफेयर एसोसिशन‘ के कर्ताधर्ता बंसल ने यही कहा। वे कहते हैं कि बिल्डरबहुत घाघ होते हैं। निवेशकों का खून चूसना उनका असली धंधा है। उस पर कोई कानून अंकुश नहींलगा सकता है।

उनकी माने तो सरकार जितना मन चाहे उतना कानून बना ले, बिल्डर उसे मानने वाले नहीं हैं।एकबारगी उनकी बात सुनकर लगा कि उन्होंने एक धारणा बना ली है। लेकिन जब 19 जुलाई कादैनिक अखबार देखा तब उनके दावे को नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया। वह अखबार बिल्डरोंकी हेकड़ी को बयान कर रहा था। अखबार में जो खबर छपी थी, वह चौंकाने वाली थी। उससे पताचल रहा था कि बिल्डर कानून को लेकर कितने सजग हैं।

खबर के मुताबिक हरियाणा सरकार ने 10 बिल्डरों को नोटिस भेजा था। उनका अपराध यह है किउन्होंने रेरा में पंजीकृत हुए बिना नए प्रोजेक्ट को शुरू कर दिया। वे लोग जो रेरा को ठेंगा दिखा रहेहैं, उनमें डीएलएफ, सिनटेल इंडिया, मैक्सवर्थ, बेसटेक, टयूलिप इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे दिग्गज शामिल हैं।उस रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ गुरुग्राम में 150 नए प्रोजेक्ट चालू हुए हैं, उनमें से तकरीबन 15 प्रोजेक्ट ही रेरा के तहत पंजीकृत हैं। बाकी सब बिना पंजीकृत हुए ही धडल्ले से चल रहे हैं। यह सबतब हो रहा है, जबकि हरियाणा में रेरा के तहत अंतरिम तौर पर प्राधिकरण का गठन कर दिया गया है।

दरअसल रेरा के तहत बिल्डरों पर लगाम तभी कसी जा सकती है, जब विनियामक प्राधिकरण कागठन हो जाए। इसके बिना रेरा का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि प्राधिकरण के बिना खरीदार अपनीशिकायत कहां करेंगे। इसी तरह बिल्डर और एजेंट पंजीकृत कहां होंगे? बिना यह हुए खरीदारों केहितों की रक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए यह जरूरी है कि रेरा के तहत प्राधिकरण का गठन हो।

इस मामले में उत्तर प्रदेश (नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद) और हरियाणा (गुरुग्राम, फरिदाबाद) में कोई मुकम्मल काम नहीं हुआ है। इन दोनों प्रदेशों के कुछ जिले एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) का हिस्सा हैं। यही वे इलाके हैं जहां बिल्डरों ने सबसे ज्यादा अंधेर मचा रखी है। बावजूद इसके दोनोंसरकार ने कोई समुचित कदम अभी तक नहीं उठाया है। वे तकरीबन ढाई महीने बीत जाने के बादभी एक प्राधिकरण नहीं बना पाए हैं, जबकि रेरा 1 मई 2017 से लागू हो चुका है। इसके बाद भीनोएडा, ग्रेटर नोएडा, वसुंधरा, वैशाली, गुरुग्राम और फरीदाबाद में खरीददारों को कोई राहत नहींमिली है।

रेरा 1 मई 2017 को अधिसूचित हुआ। 31 जुलाई 2017 तक सभी राज्यों को
इसे लागू करना है। रेरा के तहत एक विनियामक प्राधिकरण का गठन करना
है। यह बिल्डर की गतिविधियों पर नजर रखेगा ताकि वे निवेशकों को ठग न पाएं।

खरीददारों के हितों के लिए संघर्ष करने वाले ‘नेफोमा‘ के अध्यक्ष अनू खान बताते हैं, “रेरा से अभीतक कोई फायदा नहीं हुआ है। स्थिति जस की तस बनी हुई है। किसी खरीददार को कोई राहत नहींमिली है।” वजह पूछने पर वे कहते हैं कि प्राधिकरण अभी तक बना ही नहीं। नोएडा प्राधिकरण भीहमलोग कई बार जा चुके हैं। वहां भी यही कहा जा रहा है कि जब कुछ होगा तब सूचना दी जाएगी।

उनका दावा है कि प्राधिकरण बनाने में देरी जान–बूझकर की जा रही है। वे कहते हैं कि प्रदेशसरकार की कवायद बिल्डरों को फायदा पहुंचाने की है। इसलिए रेरा को नरम किया जा रहा है, ताकिबिल्डरों को कोई दिक्कत न हो।

अनू खान कहते हैं कि नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद में तकरीबन 125 बिल्डर हैं जिनकेपोजेशन देने की तारीख बीत चुकी है। फिर भी खरीददार को मकान नहीं मिला है। उनका पैसापचाकर बिल्डर बैठ गए हैं। उनमेंं आम्रपाली, गौड़ संस, सुपरटेक जैसे खिलाड़ी हैं। इनके पास कहींसे भी धन की कमी नहीं है, फिर भी निवेशकों को ठगने से बाज नहीं आ रहे हैं।

दीपक बंसल कहते हैं कि रेरा से खरीददारों को कितना लाभ मिलेगा? इसके बारे में अभी नहीं कहाजा सकता। लेकिन जिस तरह से बिल्डर, खरीददारों का पैसा डकार कर बैठे हैं, वह बहुत हीदर्दनाक है।

वे एक घटना का जिक्र करते हैं। घटना यूनीटेक की है। एक खरीददार यूनीटेक के दμतर गया। उसनेवहां बैठे प्रबंधक से चिल्लाते हुए पूछा कि मेरा मकान कब तक मिलेगा? प्रबंधक ने उससे कहा यहांमत चिल्लाएं। सामने थाना है, वहां जाकर कंपनी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराएं। आप से हम कोर्टमें निपट लेंगे।

बंसल बताते हैं कि बिल्डर निवेशकों को कीड़ा–मकौड़ा समझते हैं। उन्हें पता है कि कोर्ट के चक्करलगाते वे लोग थक जाएंगे और हार कर बैठ जाएंगे। फिर हमारी शर्तों पर ही काम करेंगे। वे कहते हैंकि अगर इस हालात से रेरा खरीददारों को निकाल लेता है तब कहीं जाकर बिल्डरों पर नकेल कसीजा सकती है। अन्यथा वे बिल्डरों के कुचक्र में पिसते रहेंगे।

गुरुग्राम में 150 नए प्रोजेक्ट शुरू हुए हैं। उनमें से महज 15 प्रोजेक्ट ही नए
कानून के तहत पंजीकृत हैं। बाकी बिना पंजीकरण के ही काम कर रहे हैं। उनमें
डीएलएफ जैसे खिलाड़ी भी हैं।

जानकारों की माने तो यही वह धंधा है जिसमें ठगी बहुत ज्यादा है। सुप्रीम कोर्ट में खरीददारों का पक्षऱख रहे हैं वकील ब्रजेश कुमार कहते हैं कि बिल्डर गोरखधंधा करते हैं। उन्हें किसी एक प्रोजेक्ट सेजो पैसा मिलता है उसे दूसरे में लगा देते हैं और उससे जो मिलता है उसे तीसरे में लगा देते हैं।

इस तरह वे जमीन खरीदते रहते हैं और निवेशक घर का इंतजार करते रहते हैं। वे कहते हैं कि कोईबिल्डर यह बताएगा कि उन लोगों का कॉमर्शियल कॉम्पलेक्स का प्रोजेक्ट कैसे तय समय में पूरा होजाता है? उसके लिए उनके पास पैसे रहते हैं। लेकिन जब बात घर की आती है तो वह पूरा होने कानाम ही नहीं लेता। वे कहते हैं कि रियल एस्टेट में यही गोरखधंधा चल रहा है। घर के नाम परनिवेशक से पैसा लेता है और उसे कहीं दूसरी जगह लगा देते हैं।

उनका यह रवैया दिल्ली एनसीआर में तो साफ देखने को मिला है रेरा आने के बाद भी उन पर कोईखास फर्क पड़ता नहीं दिख रहा है महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में बिल्डरों की लॉबी रेरा के प्रावधान केखिलाफ खड़ी हो गई है जहां तक बात एनसीआर की है तो यहां पर संबंधित सरकारों पर ही आरोपहै कि वे रेरा को बिल्डरों के अनुरूप बना रही है। बिल्डर भी यही चाहते हैं कि पुराने प्रोजेक्ट को रेरामें शामिल न किया जाए।

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