बदल गए रोजगार के मायने

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पिछले दिनों एक एजेंसी की रिपोर्ट आई, जिसमें यह कहा गया कि बेरोजगारी की दर बहुत बढ़ गई है। लोगों को उतने रोजगार नहीं मिल पा रहे हैं, जितने अमूमन मिलने चाहिए थे। उस रिपोर्ट में एक दिलचस्प बात यह रही कि रोजगार लेने के लिए पहले की तुलना में कम लोग आने लगे हैं। यह तथ्य चौंकाने वाला है, क्योंकि ऐसा नहीं होता है कि एक ओर बेरोजगारी बढ़ने लगी और दूसरी ओर लोग रोजगार लेने में रुचि नहीं दिखाएं। आखिर यह हुआ क्यों और इसके पीछे क्या कारण है? अगर हम देश की अर्थव्यवस्था को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि उसके विकास की गति अद्भुत है और वह 7 प्रतिशत से भी ज्यादा की गति से बढ़ रही है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल यह 7.5 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। यह बात बहुत हैरान करती है कि जो अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है, वह पर्याप्त रोजगार क्यों नहीं दे पा रही है? ईपीएफओ के आंकड़ों से यह पता चलता है कि देश में रोजगार बढ़ा है और वहां 13 महीनों में 80 लाख लोगों को 2017 से 2018 के बीच रोजगार मिला। वैसे इन आंकड़ों पर उतना भरोसा नहीं जताया जा रहा है और एनएसएस के आंकडे उतने प्रभावशाली नहीं हैं। लेकिन इस बात का कोई खुलासा नहीं कर पा रहा है कि आखिर रोजगार लेने में दिलचस्पी क्यों नहीं दिख रही है।

दिल्ली जैसे महानगर में लाखों नौजवान-नवयुवतियां खाने के स्टॉल से लेकर छोटे-मोटे सामान बेचने का काम कर रहे हैं। इस बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण यह रहा कि अब सरकारी नीतियां बदल गई हैं और लोन लेना आसान हो गया है।

इसका कारण दूसरा है और वह यह कि स्वरोजगार में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है और बड़ी तादाद में लोग अपना काम शुरू कर रहे हैं। मुद्रा लोन जैसी सुविधाओं ने लोगों को मौका दिया है कि वे अपना काम शुरू कर सकें। जब प्रधानमंत्री ने पकौड़े बनाने को एक रोजगार माना तो पी चिंदबरम सरीखे नेता मजाक उड़ाने लगे। लेकिन यह एक सच्चाई है कि भारत जैसे देश में इस तरह के छोटे-छोटे व्यवसाय में बहुत बढ़ोतरी हुई है। जिस देश में सरकारी नौकरियों की ओर आशा भरी निगाहों से देखने का एक रिवाज है वहां यह एक स्वागत योग्य बदलाव है। सरकारी नौकरियां अब दुर्लभ होती जा रही हैं। सातवें वेतन आयोग ने कर्मचारियों का वेतन इतना बढ़ा दिया है कि राज्य सरकारों की हालत खस्ता हो गई है और वे अब ज्यादा नौकरियां देने की हालत में नहीं हैं। ऐसे में और सरकारी नौकरियों की कामना करना व्यर्थ है। ऐसी हालत में स्वरोजगार एकमात्र रास्ता है। देश में पढ़े-लिखे वर्ग ने इस दिशा में बड़ी शरूआत की है। आईआईटी, आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़े-लिखे नौजवानों ने एक नया रास्ता बताया है। ऐसे हजारों नौजवानों ने नौकरी करने की बजाय स्वरोजगार का रास्ता चुनकर अपने को अरबपतियों की सूची में शामिल कर लिया। इससे नई पीढ़ी को बहुत प्रेरणा मिल रही है और बड़ी तादाद में नौजवान अपना काम शुरू कर रहे हैं। उन्हें सफलता भी मिल रही है।

यह तो हुई बहुत पढ़े-लिखे लोगों की बात। कम पढ़े लिखे लोगों ने भी बड़े पैमाने पर अपना काम शुरू किया है। पहले यह सुविधा नहीं थी, जिससे लोग स्वरोजगार या बिजनेस करने से कतराते थे। सरकार की बदली हुई नीतियों और प्रशिक्षण की सुविधा से हालात बदल गए हैं। अब यह पहले जैसा नहीं रहा। घर बैठकर काम करने की भी सुविधा बढ़ी है। बड़ी-बड़ी आॅनलाइन रिटेल कंपनियां पूरे देश से सामान खरीदती हैं। सुदूर इलाकों में रहने वालों को भी इससे सुविधा मिली हैं। वे अपना सामान घर बैठे ही बेच सकते हैं। पहले मार्केटिंग के अभाव में यह संभव नहीं हो पा रहा था। अब इसमें बदलाव आया है। पैसा कमाने के लिए कई रास्ते खुल गए हैं। भारतीयों की मानसिकता में बदलाव के कारण यह संभव हुआ है और आने वाले समय में इसमें और तेजी आएगी। लोग अब स्वरोजगार के जरिये रोजगार देने का रास्ता खोल रहे हैं और आने वाले समय में फर्क देखने को मिलेगा।

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