पुनरुत्थान के लिए शिक्षा पर पहली राष्ट्रीय ‘उपनिषद’

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वैसे तो भारतीय शिक्षा पर चिंतन करने के लिए इसके पूर्व भी कई महत्वपूर्ण
आयोजन हुये हैं तथा कई समितियों में चर्चा हुई है, लेकिन आत्म पे्ररणा से
सभी शिक्षा शाास्त्रियों का इतनी बड़ी संख्या में एकत्रित होकर चिंतन करना
शायद इससे पहले नहीं हुआ। इस प्रकार पुनरुत्थान के लिए शिक्षा पर
यह आधुनिक भारत की पहली राष्ट्रीय ‘उपनिषद’ है। जिसमें प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी सहभागी बने।

भारतीय शिक्षण के लिए समर्पित रिसर्च फार रिसर्जेंस फाउण्डेशन और यूजीसी, एआईसीटीई, इग्नू, जेएनयू,आईसीएसएसआर, आईजीएनसीए तथा एसजीटी विश्वविद्यालय जैसी प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं के सह आयोजकत्व में 29 सितम्बर को नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में हुआ शिक्षा शास्त्रियों का सम्मेलन अपनी तरह का पहला और अनूठा सम्मेलन था। इस सम्मेलन की आयोजन समिति के अध्यक्ष पत्रकार रामबहादुर राय थे तथा उपरोक्त संस्थाओं के प्रमुख इस समिति के सदस्य थे। सम्मेलन का विषय था ‘पुनरुत्थान के लिए शिक्षा’ और इसमें भाग लेने के लिये
आमंत्रित थे उच्च शिक्षा जगत की श्रेष्ठतम संस्थाओं के नेतृत्वकर्ता। कोई आश्चर्य नहीं कि इसे शिक्षा जगत की पहली ‘उपनिषद’ की संज्ञा दी गई क्योंकि ऐसा बौद्धिक समागम पहली बार ही हुआ था जिसमें चार सौ के
लगभग कुलपति तथा देश की शीर्ष शैक्षणिक संस्थाओं के प्रमुख विमर्श के लिए उपस्थित थे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी संभवत_: प्रधानमंत्री पद सम्हालने के बाद पहली बार
शिक्षा के इतने बड़े समूह के साथ संवाद किया था। अपने उद्घाटन भाषण में जिस तरह उन्होंने शिक्षा को सम्बोधित किया तो ऐसा लगा मानो देश के प्रधानमंत्री नहीं कोई बहुत मर्मज्ञ शिक्षा मनीषी अपने साथियों को उनके कार्य के सफल संचालन के गुर सिखा रहे हों। प्रधानमंत्री का 45 मिनट से कुछ अधिक समय तक चला भाषण भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा से लेकर आधुनिक विचारकों की पीढ़ी के उदाहरणों से सज्जित था। जब इस सम्मेलन की अवधारणा की गई, तब से ही यह स्पष्ट था यह एक कार्य  केन्द्रित सम्मेलन होगा तथा यह आमतौर पर होने वाले सम्मेलनों से कई मायनों से अलग होगा। इसलिए उद्घाटन सत्र के बाद सम्मेलन आठ समानांतर सत्रों में विभाजित था तथा प्रतिभागियों को उनके द्वारा पहले से चुने गये विषय के सत्र से जाकर चर्चा में भाग लेना था। जो विषय समानांतर सत्रों के लिए चुने गये थे उनमें

(1) हमारा दृष्टिकोण अध्यापक केन्द्रित शिक्षा की बजाय विद्यार्थी केन्द्रित शिक्षा की ओर कैसे बढ़े,

(2) हम नौकरी मांगने वाले बनाने की बजाय नौकरी देने वाले कैसे निर्मित करें

(3) हमारा शोध एवं अनुसंधान सिर्फ उपाधि अथवा नौकरी के लिए न होकर राष्ट्र और समाज के पुनरुत्थान के लिए उपयोगी कैसे हो

(4) हमारे संसाधनों एवं अधोरचना का संयुक्त और
युक्तिसंगत उपयोग कैसे हो

(5) विद्यार्थियों में अपने परिसर के प्रति अपनत्व की भावना का विकास कैसे हो

(6) शैक्षणिक संस्थाओं का प्रशासन आदेशात्मक होने की बजाय सहकारी और सहयोगात्मक कैसे बने,

(7) शैक्षणिक संस्थाओं का विकास सिर्फ शासकीय न होकर समाज पोषित कैसे हो

(8) विशुद्ध व्यावसायिक दृष्टिकोण का विकास करने वाली शिक्षा के स्थान पर मूल्य आधारित, व्यक्ति निर्माण करने वाली शिक्षा कैसे दी जाये, जैसे विषय शामिल थे। भाग लेने वालों में केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपति, आईआईटी तथा आईआईएम सहित राष्ट्रीय महत्व की अन्य शैक्षणिक संस्थाओं के निदेशक, विभिन्न राज्यों के विश्वविद्यालयों के कुलपति, विभिन्न निजी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति एवं कुलपति तथा अन्य वरिष्ठ शिक्षाशास्त्री, जिनमें कई पूर्व कुलपति भी शामिल हैं, सम्मिलित थे।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह भी उपस्थित थे। रिसर्च फार रिसर्जेन्स फाउण्डेशन के अध्यक्ष तथा इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने स्वागत वक्तव्य दिया तथा इस सम्मेलन की अवधारणा पर प्रकाश डाला। इस सत्र का संचालन इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू) के कुलपति नागेश्वर राव ने किया।

समानांतर सत्रों के संचालन का दायित्व भी वरिष्ठ शिक्षा शास्त्रियों को सौंपा गया था जिनमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष प्रो. डी.पी. सिंह, एआईसीटीई के अध्यक्ष डॉ. अनिल सहस्त्रबुद्धे, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक के कुलपति प्रो. टी. वी. कट्टीमनी, आईसीएसएसआर के सदस्य सचिव प्रो. वी. के. मल्होत्रा, नीरी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजेश बिनिवाले, वरिष्ठ शिक्षा शास्त्री डॉ. पी. सी. जैन, यूजीसी के सचिव प्रो. रजनीश जैन तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय के चीफ इनोवेशन आफिसर अभय जेरे सम्मिलित थे। प्रधानमंत्री के पे्ररक उद्बोधन ने सभी प्रतिभागियों के अंदर एक नई ऊर्जा का संचार किया। प्रधानमंत्री ने केन्द्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षा के लिए किये जा रहे प्रावधानों तथा संस्थानों को दी जा रही स्वायत्तता का उल्लेख करते हुए अपना यह संकल्प दोहराया कि आने वाले वर्षों में शिक्षा पर होने वाले व्यय को और अधिक बढ़ाया जायेगा जिससे हम ज्यादा संख्या में विश्वस्तरीय संस्थाओं का विकास कर सकें। नवाचार को वर्तमान शिक्षा का एक अनिवार्य घटक बताते हुये उन्होंने शिक्षा शास्त्रियों से आह्वान किया कि वे बंधी बंधाई परिधि से बाहर निकल कर समाज हित और राष्ट्र हित में नवाचारों को बढ़ावा दें। उन्होंने इस सम्बन्ध में अटल इनोवेशन मिशन के माध्यम से किये जा रहे कार्यों की भी जानकारी दी। प्रधानमंत्री मोदी के उद्बोधन का ही परिणाम था कि समानांतर सत्रों की चर्चा बहुत सार्थक और परिणामकारी रही। समानांतर सत्रों के बाद हुये संयुक्त सत्र में, जिसकी अध्यक्षता सम्मेलन के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने की, जब विभिन्न सत्रों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया तो ऐसे कई विषय उभर कर सामने आये जो आने वाले समय में भारतीय शिक्षा के लिए असरकारी रोडमैप तैयार कर सकते हैं। इस सत्र का संचालन मुकुल कनेतकर ने किया। विभिन्न समानांतर सत्रों में जो बिंदु प्रमुख रूप से उभरे, उनके आधार पर एक विस्तृत प्रतिवेदन बनाकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय को दिया जाना प्रस्तावित है जिससे शिक्षा की ऊर्ध्वगामी दिशा तय हो सके। विभिन्न सत्रों में जो विचार उभर कर आये, उनमें यंत्रवत् शिक्षा पद्धति से मानवीय शिक्षा पद्धति की ओर जाना, श्रेष्ठ अध्यापकों का विकास किया जाना, शिक्षा में विद्यार्थियों की साझेदारी, विद्यार्थियों को स्टार्टअप विकसित करने के लिए नीति का निर्माण, टेक्नालॉजी ट्रांसफर सेल का गठन, बहुआयामी शोध की संभावनाएं, शोध की गुणवत्ता तथा उपादेयता मापने के लिए आवश्यक तंत्र का विकास, शिक्षा की अधोरचना के श्रेष्ठतम तथा साझा उपयोग के लिए नीति का निर्माण, परिसरों के वातावरण को सद्भावनापूर्ण बनाने की दृष्टि से योजना बनाना, मूल्य आधारित प्रशासन, परिसर में अपनेपन और कर्तव्यपालन की संस्कृति का विकास, शैक्षणिक संस्थाओं पर नियमन और नियंत्रण को पारदर्शी और सकारात्मक बनाना, समाज पोषित निजी शैक्षणिक संस्थाओं की भागीदारी को मजबूत बनाना, मूल्य आधारित शिक्षा पर बल देना, चरित्र निर्माण के उद्देश्य को केन्द्र में रखकर शिक्षा तंत्र विकसित करना जैसे विषय शामिल हैं। लेकिन दो बातों पर तो तत्काल ही आम राय बनी और वो ये कि (1) ऐसे सम्मेलन होते रहने चाहिए और बनायी कार्य योजना पर शीघ्र अमल होना चाहिये (2) मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदल कर पहले की तरह शिक्षा मंत्रालय किया जाना चाहिए जिसे भारतीय शिक्षा को पुन:गरिमामयी स्थान पर पहुंचाने में सहायता मिले। समापन सत्र में मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर तथा राज्यमंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह ने शिक्षा शास्त्रियों को सम्बोधित किया तथा अनुशंसाओं को मूर्त रूप देने का संकल्प दोहराया। █

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