खराब निर्माण के लिए कौन जिम्मेदार?

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घाटे में चल रही दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन को एक और झटका लगा है। पंच निर्णय न्यायाधिकरण के आदेश के तहत दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) को रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की सहायक कंपनी दिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो एक्सप्रेस प्राइवेट लिमिटेड (डीएएमईपीएल) को ब्याज सहित लगभग 5000 करोड़ रुपए का मुआवजा देना होगा।

अनिल अंबानी के मालिकाना हक वाली कंपनी रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के मुताबिक, पंच निर्णय न्यायाधिकरण ने डीएमआरसी के सिविल स्ट्रक्चर में खराबी मामले को लेकर उसके पक्ष में फैसला सुनाया है। आदेश में डीएमआरसी को आर इंफ्रा की इकाई डीएएमईपीएल को 2,950 करोड़ रुपए का मुआवजा देने को कहा गया है। कंपनी को यह मुआवजा प्रोजेक्ट का रियायत समझौता रद्द किए जाने के बदले मिलेगा।

स्मरण रहे कि मुआवजा देने का निर्देश तीन सदस्यीय पंच निर्णय न्यायाधिकरण ने आम सहमति से दी है। इस घटना के जानकार सूत्रों के अनुसार, “डीएएमईपीएल को अगस्त 2013 से इस रकम पर ब्याज भी मिलेगा। इस तरह कंपनी को मिलने वाली मुआवजे की रकम बढ़कर 4,450 करोड़ रुपए तक पहुंच सकती है। रिलायंस इंफ्रा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ललित जालान ने पंच के फैसले पर अपनी खुशी जतायी है।”

अगर डीएमआरसी न्यायाधिकरण के इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती भी देती है, तो भी उसे 75 फीसदी रकम देनी पड़ेगी। गौरतलब है कि सरकार ने 2016 में एक दिशा-निर्देश जारी किया था। उसके अनुसार, पब्लिक सेक्टर की कंपनियों को आर्बिट्रेश अवॉर्ड की 75 फीसदी धनराशि देनी ही होगी। भले ही वे इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती क्यों न दें। इसलिए अगर डीएमआरसी इस फैसले को चुनौती देती है तो भी उसे 2,210 करोड़ रुपए रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की सहायक कंपनी को देनी ही होगी।

दिल्ली एयरपोर्ट एक्सप्रेस मेट्रो लाइन की खराब बनावट से जो नुकसान हुआ है, उसके लिए रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर को करीब 5000 करोड़ रुपए का मुआवजा दिया जाएगा। विडंबना तो यह है कि खराब निर्माण के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। आखिर क्यों? क्या डीएमआरसी बोर्ड और सरकार को इस मामले पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए?

आखिर क्या है मामला?

दिल्ली मेट्रो ने पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) अनुबंध के तहत रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ 23 जनवरी, 2008 दिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो बनाने का काम शुरू किया था। इस अनुबंध के अनुसार, सिविल वर्क्स लगभग 2715 करोड़ रुपए का काम डीएमआरसी को करना था और शेष काम लगभग 2800 करोड़ रुपए का काम रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर को करना था।

इस अनुबंध के तहत 30 साल तक मेट्रो परिचालन का काम रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के जिम्मे था और कमाई डीएमआरसी से बांटना था।

23 जनवरी, 2011 को दिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो ट्रैक पर 120 किलोमीटर प्रति घंटा की तय रफ्तार से परिचालन आरंभ हुआ। डेढ़ साल के अंदर ही इस लाइन के सिविल स्ट्रक्चर में कई खामियां सामने आई। 540 गर्डर में दरार और बियरिंग डिसलोकेशन आदि की वजह से 7 जुलाई, 2012 को इसका परिचालन बंद करना पड़ा।

इस बाबत रिलायंस ने डीएमआरसी को नोटिस भी दिया, लेकिन डीएमआरसी प्रोजेक्ट के सिविलस्ट्रक्चर की खामियों को दूर करने में नाकाम रही और विवाद की वजह से डीएमआरसी ने रिलायंसका रियायती करार रद्द कर दिया।

इसके बाद रिलायंस ने मुआवजे की मांग की। इससे विवाद पंच निर्णय न्यायाधिकरण के पास चलागया। वहीं दूसरी तरफ एक जुलाई, 2013 को दिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो लाइन को डीएमआरसी ने अपनेअधिकार में ले लिया और डीएमआरसी द्वारा नामित पंचों की एक सूची के आधार पर पंच निर्णयन्यायाधिकरण का गठन किया गया।

यहां बताते चलें कि पंच निर्णय न्यायाधिकरण में इस मामले की सुनवाई लगभग साढ़े तीन साल तक चली। इन दौरान दोनों पक्षों की 68 सुनवाई के बाद फैसला आया है।

गौरतलब है कि पंच निर्णय न्यायाधिकरण ने दिल्ली मेट्रो एक्सप्रेस प्राइवेट लिमिटेड द्वारा परियोजना छोड़े जाने को वैध ठहराया। वहीं डीएमआरसी द्वारा करार के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं करने और इसके कारण डीएएमईपीएल को हुए नुकसान की भरपाई के लिए यह मुआवजा दिया है।

बताते चलें कि दिल्ली एअरपोर्ट एक्सप्रेस मेट्रो लाइन के खराब सिविल स्ट्रक्चर के लिए जिम्मदार और कोई नहीं, बल्कि दिल्ली मेट्रो के प्रबंध निदेशक मंगू सिंह हैं। मंगू सिंह उन दिनों एयरपोर्ट लाइन के प्रोजेक्ट डायरेक्टर थे। उनके सहायक के तौर पर प्रमित गर्ग और रवि कपूर नियुक्त थे। खराब सिविल स्ट्रक्चर के लिए इन तीनों अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए थी, जो नहीं हुई।

सूत्रों के अनुसार, ‘इस मामले में मंगू सिंह को प्रथम दृष्टया दोषी पाया गया था, लेकिन डीएमआरसी बोर्ड ने इनके कार्यावधि विस्तार से आठ महीने पहले ही इन्हें वरी कर दिया गया। जबकि वे प्रोजेक्ट के हर चरण में इससे जुड़े थे। इसके बावजूद उन्हें चार साल का कार्यावधि विस्तार दे दिया गया। इनके दोनों सहयोगियों को भी पदोन्नति हुई। वे दोनों मुख्य अभियंता स्तर के अधिकारी बना दिए गए हैं। रिलायंस वाले इस विवाद में रवि कपूर ही डीएमआरसी का पक्ष पंच निर्णय न्यायाधिकरण के सामने रख रहे थे।’

रिलायंस को दिया जाने वाला मुआवजा लगभग 5000 करोड़ रुपए के इस अतिरिक्त खर्च के लिए कौन जिम्मेदार है? पंच निर्णय न्यायाधिकरण ने इसके लिए सिर्फ डीएमआरसी को जिम्मेदार ठहराया है।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि डीएमआरसी बोर्ड ने मंगू सिंह को क्लीनचिट देने में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखा रही थी? जबकि एयरपोर्ट एक्सप्रेस मेट्रो की सुनवाई पंच निर्णय अदालत में चल रही थी? अब जब पांच साल बाद 2715 करोड़ रुपए के काम के लिए डीएमआरसी को 5000 करोड़ रुपए का मुआवजा देना पड़ेगा तो डीएमआरसी बोर्ड और दिल्ली सरकार व केंद्र सरकार को अपने निर्णय पर पुन: विचार करने की जरूरत है।

दूसरा प्रश्न यह उठता है कि रिलायंस को दिया जाने वाला मुआवजा लगभग 5000 करोड़ रुपए के इस अतिरिक्त खर्च के लिए कौन जिम्मेदार है? पंच निर्णय न्यायाधिकरण ने इसके लिए सिर्फ डीएमआरसी को जिम्मेदार ठहराया है। 700 करोड़ रुपए के घाटे में चल रही दिल्ली मेट्रो पर 5000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार पड़ेगा और इसका भुगतान आम आमदी को अपनी जेब से करना पड़ेगा।

विडंबना यह है कि दिल्ली एयरपोर्ट लाइन जैसी खराब मेट्रो लाइन के लिए तिगुना खर्च होगा और उसके बदले में आज जनता को मिलेगा 80 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार। जबकि उसे 120 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार मिलनी चाहिए। यह पूरा मामला आम आदमी के हित से जुड़ा है। मोदी सरकार और दिल्ली सरकार को इस बारे में विचार करना चाहिए और दोषी व्यक्तियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

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