कलयुग का गुरुकुल

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बच्चों को पढ़ाते स्कूल के प्रंबधक राजेश शर्मा

एक ओर ऊपर से गुजरती मेट्रो की तेज आवाज तो दूसरी तरफ ड्डदल्ली मेरठ एक्सप्रेसवे पर गुजरते वाहनों का शोर। इसके बीच एक ड्डवशेष कक्षा लगी है। इसमें ड्डशक्षक भी हैं और ड्डशक्षार्थी भी। ये नजारा है ड्डदल्ली के यमुना बैंक मेट्रो स्टेशन के नजदीक चल रहे ‘फ्री स्कूल अंडर द ड्डब्रज’ का। न कोई क्लास रूम है, न ही पंखे। न ही बैठने के ड्डलए डेस्क-बेंच। स्कूल ड्डबना ड्डकसी भौड्डतक सुख सुड्डवधा के चल रहा है। स्कूली ढांचे के नाम पर इसके पास हैं मेट्रो के दो ड्डपलर ड्डजनके बीच में ये पूरा स्कूल स्थाड्डपत है। अगर इस स्कूल को कलयुग का गुरुकुल कहा जाए तो गलत न होगा।
ड्डदल्ली सड्डचवालय से कुछ कदम की दूरी पर ड्डस्थत ‘फ्री स्कूल अंडर द ड्डब्रज’ के प्रमुख कर्ता-धर्ता (प्रबंधक) राजेश शर्मा हैं। राजेश मयूर ड्डवहार फेस तीन में एक दुकान चलाते हैं। उनका कहना है ‘कई मीड्डडया वाले यहां आते हैं। अपनी कहानी बनाकर चले जाते हैं। लेड्डकन बदले में हमको क्या ड्डमलता है? वर्ष ६ञ्ञ्त्र से हमने यहीं सड़क से अपना सफर शुरू ड्डकया था आज भी हम वहीं हैं। इस बात का दुÑख तब और ज्यादा बढ़ जाता है जब ड्डदल्ली के ड्डशक्षामंत्री मनीष ड्डससोड्डदया स्कूल-कॉलेजों के ड्डवकास में अपनी पीठ थपथपा रहे होते हैं। चुनाव के पहले कई नेता और अलग-अलग पार्टियों के प्रत्याशी यहां आकर हमारे काम की प्रशंसा करते थे। चुनावी वादे भी हमसे ड्डकये गये। कई ने चुनाव जीतने पर यहां काम करवाने की बात भी कही थी। अब न तो वो नेता आते हैं न ही कोई मंत्री हमारी ड्डस्थड्डत के बारे में पता करता है।’
राजेश शर्मा की इस पहल ने उन बच्चों की आंखों में वो सपने जगा ड्डदये हैं ड्डजसको देखने की ड्डहम्मत इनको खुद के मां-बाप भी नहीं दे पा रहे थे। बच्चों के ड्डलए यहां आना और पढ़ाई करना उनकी ड्डदनचर्या का ड्डहस्सा बन चुका है। इन सालों में इस स्कूल से पढ़ाई करते हुए बच्चे कई जगहों पर आगे बढ़ चुके हैं। ड्डनड्डध (५ञ् वर्ष) यहां पढ़ाई करने आई हुई है। उसके ड्डपता मजदूरी करके घर का गुजर-बसर करते हैं। ड्डनड्डध को शब्द-ज्ञान इसी स्कूल की देन है। वह अब ड्डगनती, पहाड़ा और ड्डहंदी अंग्रेजी के अक्षर पहचाननें लगी है। इस बात की खुशी उसके चेहरे पर साफ देखी जा सकती है। ड्डनड्डध यहां अकेली नहीं है उस जैसे कई बच्चे यहां प्राथड्डमक ड्डशक्षा ले रहे हैं। हालांड्डक यहां पढ़ा रहे दूसरे ड्डशक्षक लक्ष्मीचंद्र बेहद दुखी हैं। लेड्डकन उनके चेहरे पर सुकून का भाव भी है। उनका कहना है, ‘हम आर्थिक रूप से अक्षम जरूर हैं लेड्डकन हम इसड्डलए संतुष्ट हैं क्योंड्डक हम जानते हैं ड्डक हम व्यड्डक्त ड्डनर्माण में लगे हुए हैं।’ लक्ष्मीचंद्र कहते हैं, ‘ड्डबना आर्थिक मदद के चलने वाले इस स्कूल में ड्डकसी ड्डशक्षक को वेतन नहीं ड्डमलता। लेड्डकन सभी अपनी ड्डदनचर्या से समय ड्डनकालकर यहां आते हैं, पढ़ाते हैं। राजेश शर्मा कहते हैं ड्डक ‘‘यहां पढ़ा रहे कुछ ड्डशक्षकों के पास ज्ञान के अलावा कुछ भी नहीं है। ड्डदन तो बदलता है लेड्डकन उनके तन पर चढ़े वस्त्र नहीं बदलते। उनके पास धन का घोर अभाव है।’’ राजेश कहते हैं ड्डक ‘‘हमारा उद्देश्य बच्चों में ड्डशक्षा की भावना को जगाना है। हम इतना चाहते हैं ड्डक ये बच्चे बस साक्षर हो जाएं।’’ राजेश के इस प्रकल्प में अभी सात से आठ अध्यापक पढ़ा रहे हैं। दो मड्डहला अध्याड्डपका भी हैं। सभी अपनी व्यस्त ड्डदनचर्या से समय ड्डनकालकर यहां आते हैं और बच्चों के भड्डवष्य को संवारने की इस मुड्डहम में जुट जाते हैं।
राजेश बताते हैं ड्डक स्कूल को शुरू करने की रोचक कहानी है। मैं ६ञ्ञ्त्र में यमुना बैंक मेट्रो स्टेशन के पास से गुजर रहा था। वहां मेट्रो का काम चल रहा था। कुछ बच्चे ड्डमट्टी में खेल रहे थे। उनकी मैं तात्काड्डलक रूप से कुछ मदद ड्डकया। लेड्डकन मैं उनके ड्डलए कुछ ऐसी सहायता करना चाहता था जो लंबे समय तक चले। मैंने उनको पढ़ाने का ड्डनर्णय ड्डलया। दो बच्चों को पढ़ाना शुरू ड्डकया। आज ये संख्या ६ञ्ञ् तक पहुंच चुकी है। देखकर अब अच्छा लगता है। █

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