10 जनपथ के दरबारी!

0
616

सी बीआई निदेशक आलोक वर्मा दस जनपथ के ‘दरबारी’ बन गए हैं। वे ‘महारानी’ को बचाने की फिराक में हैं। उनके भ्रष्ट सहयोगियों की ढाल बने हुए हैं। ‘ओपन मैगजीन’ का यही दावा है। उसने इस बावत लंबी रिपोर्ट लिखी है। लालू प्रसाद यादव वाले मामले का हवाला देकर ओपन मैगजीन ने बताया है कि किस तरह आलोक वर्मा पद का दुरुपयोग कर रहे हैं। उसमें लिखा है कि एक दिन लालू प्रसाद और उनके परिवार के यहां छापा मारना था। टीम तैयार थी। उसे बस लालू के घर पहुंचना था। तभी आलोक वर्मा ने राकेश अस्थाना से कहा कि लालू के घर छापा मत मारो। संयुक्त निदेशक से कहा कि तलाशी लेने की कोई जरूरत नहीं है। राकेश अस्थाना उन्हें समझाने पहुंचे। अस्थाना सीबीआई निदेशक से बोले कि कोर्ट ने तलाशी लेने का आदेश दिया है। इसलिए अगर सीबीआई पीछे हटेगी तो संस्थान की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाएगी। लिहाजा तलाशी लेने तो जाना होगा। तब कहीं जाकर आलोक वर्मा तैयार हुए।

लेकिन अधिकारी को समझा दिए कि ज्यादा सख्ती न बरतना। इसकी शिकायत राकेश अस्थाना ने कैबिनेट सचिव से की। उन्होंने 24 अगस्त को इस बावत लंबा पत्र लिखा। उन्होंने 30 अगस्त को राकेश अस्थाना की शिकायत सीवीसी के पास भेज दी। 11 सितंबर को सीवीसी ने सीबीआई निदेशक को नोटिस जारी किया। उनसे राकेश अस्थाना की शिकायत पर जवाब मांगा। पर आलोक वर्मा ने जवाब देने के बजाए राकेश अस्थाना को ही सबक सीखने पर उतारू हो गए। 15 अक्टूबर को तय हुआ कि राकेश अस्थाना को रास्ते से हटाना है।

लिहाजा राकेश अस्थाना के खिलाफ एफआईआर करने की भूमिका बनी। इसमें मोहरा कांग्रेस के दुलारे मोइन कुरैशी के सहयोग सतीश बाबू सना को बनाया गया। वह मोइन कुरैशी मामले में आरोपी है। उसे आलोक वर्मा ने राकेश अस्थाना के खिलाफ गवाह बना दिया। उसने बयान दिया कि राकेश अस्थाना को रिश्वत दी है। आलोक वर्मा ने उसी के आधार पर राकेश अस्थाना के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी। अस्थाना के सहयोगी साई मनोहर को आलोक वर्मा ने लपेटा। साई मनोहर सीबीआई के वो अधिकारी हैं जिन्होंने राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट का भूमि घोटाला उजागर किया था। इस ट्रस्ट के कर्ताधर्ता राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी हैं। इसी तरह अगस्ता वेस्टलैंड चापर घोटाले की जांच राकेश अस्थाना कर रहे हैं। तो क्या इसलिए राकेश अस्थाना के पीछे सीबीआई निदेशक पड़े हैं? इस बारे में ओपन मैगजीन ने तो कुछ नहीं कहा है। लेकिन उसने रिपोर्ट में यह जरूर लिखा है कि आलोक वर्मा ने नेशनल हेराल्ड घोटाले की जांच को धीमा कर दिया है। यही नहीं, वे कुछ ऐसे अधिकारियों को सीबीआई में लाना चाहते थे जिन पर कई आरोप हंै। उन अधिकारियों में प्रवर्तन निदेशालय के संयुक्त निदेशक राजेश्वर सिंह की बहन और बहनोई भी शामिल हैं। इन अधिकारियों को लेकर राकेश अस्थाना ने कड़ी आपत्ति जाहिर की थी।

नौकरशाहों के बीच यह घटना तब सुर्खियों में थी। कहा जाता है कि उसके बाद राजेश्वर सिंह ने राकेश अस्थाना के खिलाफ मुहिम छेड़ दी थी। दावा किया गया है कि सीबीआई के संयुक्त निदेशक एके शर्मा और डीएसपी रैंक के अधिकारी एके बस्सी मुहिम का हिस्सा हैं। इनके ‘कप्तान’ आलोक वर्मा हंै। इनकी ही सरपरस्ती में एके शर्मा एयरसेल के मालिक से मिले थे। एयरसेल-मैक्सिस घोटाले में पी चिदंबरम और उनके पुत्र कार्ति चिदंबरम आरोपी हंै। इसी मामले से जुड़ी सीबीआई की गोपनीय रिपोर्ट पी चिदंबरम के घर मिली थी। जहां तक बात एके बस्सी की है तो वे सरकार की ‘एग्रीड लिस्ट’ में हैं। एग्रीड लिस्ट में जाने का मतलब यह हुआ कि अपने अनैतिक आचरण की वजह से सरकारी निगरानी में हैं। ऐसे अधिकारी को आलोक वर्मा ने फोन टैपिंग में लगाया था और खुद कांग्रेसी नेताओं का पाप ढकने में लगे थे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here