स्मृति में रहेंगे सदैव अटल

देश-दुनिया के लोग अब दिल्ली के ‘सदैव अटल’ स्थल पर पहुंचकर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं। अटल जी की यह समाधि राष्ट्रीय स्मृति और विजय घाट के बीच फैले 1.5 एकड़ भूभाग में स्थित है।

राजधानी दिल्ली के सभी रास्ते उस ओर मुड़ गए थे, जहां ‘सदैव अटल’ समाधि स्थल स्थित है। समाधि स्थल के नजदीक पहुंचते ही रास्तों पर अटलजी के चित्रों के साथ उनकी कविताओं वाले बड़े-बड़े होर्डिंग्स दिखने शुरू हो जाते हैं, जिन पर लगे तीर के निशान समाधि स्थल का रास्ता बता रहे थे। सुबह आठ बजे का समय था। मौसम में ठंडक थी। सुबह-सबेरे से चल रही तेज हवाओं ने मौसम को और भी सर्द बना दिया था। लेकिन, उसका कोई असर लोगों पर दिखाई नहीं दे रहा था। लोग स्मृति स्थल की ओर तेजी से पहुंच रहे थे। वे लोग उस समाधि स्थल और प्रांगण को देखने के लिए लालायित थे, जिसे सीपीडब्ल्यूडी ने महज 42 दिनों के भीतर बनाकर तैयार कर दिया था।



समाधि स्थल की विशेषता 
* समाधि को कमल के फूल के आकार में बनाया गया है।

* इसके चारों ओर तीन मीटर की नौ दीवारें बनाई गई हैं। जिन पर लगाए ग्रेनाइट पर सुनहरे अक्षरों में अटल जी की प्रमुख कविताओं की पंक्तियों को लिखा गया है।

* अटल की समाधि में 135 क्विंटल ग्रेनाइट लगा है। यह प्रयोग पहली बार किया गया है कि समाधि में ईटों का बिल्कुल भी उपयोग नहीं किया गया है।

* काले रंग के ग्रेनाइट से बनी समाधि के चारों ओर दूधिया रंग की इटैलियन टाइलें लगाई गई हैं जो गर्मी के समय न तो गर्म होंगी और ठंड के समय ठंडी भी नहीं होंगी।

* समाधि बनाने के लिए पर्यावरण का खास ध्यान रखा गया है। एक भी पेड़ नहीं काटा गया है। जिस वीआइपी रास्ते में पेड़ आ रहे थे तो पेड़ बचाने के लिए सड़क को मोड़ दिया गया है।

* अटलजी की समाधि के पास पहले से ही पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और उनकी पत्नी ललिता शास्त्री की समाधि है।

* दूसरी तरफ पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, आर वेंकटरमन, शंकर दयाल शर्मा, केआर नारायणन, प्रधानमंत्री आई.के गुजराल, पी वी नरसिंहा राव व चंद्रशेखर की समाधि हैं।

यह अटल गाथा स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिखी

सदैव अटल– भारत माता की महान संतानों में से एक भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का समाधि स्थल है, जो एक कृतज्ञ राष्ट्र की श्रद्धांजलि को मूर्त रूप प्रदान करता है।

25 दिसंबर 1924 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में जन्मे अटल जी की साधारण पृष्ठभूमि से देश के प्रधानमंत्री तक की यात्रा हर किसी के लिए एक प्रेरणा है।

युवावस्था में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और स्वयं को राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। अटल जी प्रवृत्ति से हमेशा स्वतंत्रता सेनानी रहे, लेकिन लोकतंत्र के प्रहरी रहे। वर्ष 1977 में आपातकाल की समाप्ति में उन्होंने एक निर्णायक भूमिका निभाई और भारत को पुन: लोकतंत्र के प्रकाश स्तंभ के रूप में स्थापित किया।

भारत में चारों तरफ एक ही राजनीतिक दल का शासन था, तब देश में एक विकल्प की आवश्यकता महसूस की गई। अटल जी ने पहले जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई भारतीय जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष के रूप में उन्होंने भविष्यवाणी की थी, ‘अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।’

12 बार सांसद रहे अटल जी अपने प्रेरणादाई व्यक्तित्व और प्रभावी वक्तृत्व से सीधे लोगों के दिल में उतर जाते थे। वे दलों से ऊपर थे, दिलों के पास थे। उन्होंने दलगत भावना से परे समावेशी शासन प्रणाली के उच्चतम मानदंड स्थापित किए। लोकतंत्र के हित में उनका मानना था- दल से बड़ा देश। उन्होंने हमेशा देश हित को जन हित को सर्वोपरि रखा।

देश के प्रधानमंत्री के तौर पर अटल जी ने 21वीं सदी के भारत की नींव रखी। जन सामान्य को ध्यान में रखकर तैयार की गई उनकी नीतियों ने आर्थिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया। भविष्य की आधारभूत संरचना के विकास और विस्तार के लिए उनके प्रोत्साहन से ही देश आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम होकर तेज गति से आगे बढ़ सका।

एक व्यक्ति के रूप में अटल जी भारत की जड़ों से जुड़े हुए थे। साथ ही, उनकी सोच विश्व के साथ तालमेल बनाने वाली थी। साहसिक निर्णय लेने की उनकी क्षमता ने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाया। वे स्वभाव से शांतिप्रिय व्यक्ति थे, लेकिन कारगिल युद्ध के समय पूरे विश्व ने उनके नेतृत्व में देश की दृढ़ता और पराक्रम को देखा। वे सामान्य जन की तकलीफों को दूर करने के लिए किसी भी स्तर तक झुक सकते थे, तो वहीं देश के सम्मान के लिए हिमालय की तरह अटल भी थे।

यह अटल बिहारी वाजपेयी जी का सामरिक राजनीतिक और कूटनीतिक कौशल ही था जिसने 21वीं सदी में भारत को विश्व के अग्रणी राष्ट्रों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। इतिहास के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक अटल बिहारी वाजपेयी जी हमेशा अपनी विनम्रता, मानवता और संवेदनशीलता के लिए याद किए जाएंगे। अटल बिहारी वाजपेयी जी में कवि, कुशल वक्ता और राजनीतिज्ञ का अद्वितीय संगम था। अटल जी की समाधि ‘सदैव अटल’ हर भारतीय को सशक्त, समृद्ध, शक्तिशाली एवं संप्रभु भारत बनाने की अटल जी की अखंड प्रतिज्ञा पूरी करने की प्रेरणा देती रहेगी। करोड़ों भारतवासियों के मन-मस्तिष्क में अटल जी सदैव इन शब्दों के साथ अटल रूप से रचे-बसे रहेंगे मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं अटल जी आपको नमन कि आप करोड़ों भारतीयों की जिंदगी का हिस्सा बने !!! अटल जी की समाधि ‘सदैव अटल’ पर हर समय एक ही गूंज सुनाई देगी- भारत माता की जय !!!

स्मारक स्थल के वातावरण में एक सादगी है, जो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की छवि से लोगों का परिचय करा रही है। वे कवि हृदय थे। चिंतक थे। लोकप्रिय राजनेता थे। स्मारक स्थल इन भावों को जगा रहा था। वैसे तो स्मृति स्थल पर नौ प्रवेश द्वार बनाए गए हैं, लेकिन कार्यक्रम के दिन लोगों का आना-जाना दो रास्ते हो रहा था। एक से विशिष्ट लोग आ-जा रहे थे, तो दूसरे से अतिविशिष्ट लोगों का आना-जाना लगा हुआ था। पहला रास्ता अब सामान्य दर्शकों के लिए खुल जायेगा। हल्के कोहरे की चादर से सदैव अटल समाधि आच्छादित थी, जो फूलों से सजी हुई थी। अतिविशिष्टजन की उपस्थिति के कारण कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी।

वहां चारों तरफ गद्दे और सफेद चादर बिछे हुए थे। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री समेत सभी विशिष्ट जन उन्हीं गद्दों पर बैठे हुए थे। प्रसिद्ध गायक पंकज उधास का भजन गायन वातावरण में अध्यात्म के रंग घोल रहा था। वह संत कबीर के आध्यात्मिक रहस्यवाद की तरह था। मानो स्वयं अटलजी बोल रहे हों‘ जल में कुम् भ, कुम् भ में जल है, बाहर भीतर पानी। फूटा कुम् भ जल, जलहीं समाना, यह तथ कथौ गियानी।।’ यहां चार बड़ी स्क्रीनें लगाई गई थीं, जिन पर कार्यक्रम का सीधा प्रसारण हो रहा था। उन स्क्रीनों पर भी लोगों की आंखें गड़ी हुई थीं। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शिलापट्ट पर उकेरे गए वाजपेयी के परिचय का अवलोकन किया, जिसे बारी-बारी से अन्य लोगों ने देखा पढ़ा। यह वही परिचय है, जिसके जरिए समाधि स्थल पर आने वाले वाजपेयी से अपना साक्षात्कार करते रहेंगे। अटल स्मृति न्यास के संस्थापक सदस्यों में शामिल वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय बताते हैं कि वाजपेयीजी का यह परिचय स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिखा है।

समाधि के चारों ओर कमल की आकृतियां बनाई गई हैं, उसके बीचों-बीच दीप की आकृति निर्मित है। इसे देखकर कोई भी समझ सकेगा कि वाजपेयी की पूरी जीवन-यात्रा दीपक से कमल के बीच रही है। इसी यात्रा का फलसफा आकृति में देखने को मिलता है। भजन की प्रस्तुति करते हुए पंकज उधास ने वाजपेयी की कविता ‘कदम मिलाकर चलना होगा’ को भी स्वरबद्ध किया। इसे सुनकर समाधि स्थल पर उपस्थित सभी लोगों के मन में वाजपेयी की स्मृति आकार लेने लगी और वे उसी स्मृति में उतरते चले गए। यहां रखी एक-एक शिला वाजपेयी की स्मृति को ताजा करती हैं। आखिर हो भी क्यों नहीं! उन शिलाओं के जरिए वाजपेयी की यादों को संरक्षित जो किया गया है। समाधि स्थल पर उनकी कविताएं काले ग्रेनाइड पत्थरों पर उकेरी गई हैं।

कविता की उन पंक्तियों के साथ-साथ उनके छायाचित्र भी लगे हैं। यह समाधि स्थल विजय घाट और राष्ट्रीय स्मृति स्थल के बीच खाली पड़े 1.5 एकड़ क्षेत्र में फैला है। सीपीडब्ल्यूडी ने रिकॉर्ड समय में इसे बनाकर तैयार किया है। इसे बनाने में 10 करोड़ 51 लाख रुपये खर्च हुए हैं। निर्माण का पूरा खर्च अटल स्मृति न्यास ने वहन किया है। अटल बिहारी वाजपेयी के 94वें जन्मदिवस पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू,लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राज्यसभा के उपाध्यक्ष हरिवंश, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने समाधि स्थल पर आकर उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि दी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और संगठन महामंत्री रामलाल समेत केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, डॉ. हर्षवर्धन, डॉ. महेश शर्मा, हरदीप पुरी, जगत नारायण नड्डा वहां उपस्थिति थे। इसी दिन सदैव अटल स्मारक स्थल आम लोगों के लिए खोल दिया गया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here