सौदे में कोई खोट नहीं -सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि राफेल सौदे में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसके आधार पर उसकी न्यायिक जांच की जा सके। सौदे में सब कुछ आईने की तरह साफ है। कोई घोटाला नहीं हुआ।

राफेल सौदा 23 सितंबर 2016 को हुआ। तब सब खामोश थे। किसी के मुंह से विरोध का एक स्वर भी नहीं फूटा। उस समय ऐसा सन्नाटा पसरा था मानो राफेल को लेकर सभी सत्ता पक्ष के साथ खड़े हों। लेकिन जैसे ही फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांदो का बयान आता है, सब मुखर हो जाते हैं। राजनीतिक लाभ लेने की दौड़ शुरू हो जाती है। हर किसी को सौदे में खोट दिखाई देने लगती है। घोटाले का शोर होने लगता है। न्यायालय में जनहित याचिकाओं की झड़ी लग जाती है। उसमें बस एक मांग रहती है, राफेल सौदे की न्यायिक जांच होनी चाहिए। जांच का दायरा भी याचिका में तय किया गया था। उसमें निर्णय लेने की प्रक्रिया, राफेल का मूल्य और साझीदार चुनने का आधार सब शामिल था। इन तीनों बातों की जांच करने की आवाज उठाई गई थी। पर हर जांच का कुछ आधार होता है। न्यायिक जांच तो निराधार हो नहीं सकती। उसके लिए तीन बातें होनी चाहिए। पहला-सौदा गैरकानूनी हो। दूसरा-उसमें तय प्रक्रिया का पालन न किया गया हो। तीसरा- तर्कसंगत न हो।

राफेल सौदे की इन तीनों कसौटियों पर समीक्षा की गई। उसमें पाया गया कि राफेल सौदे में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसके आधार पर सौदे  की न्यायिक जांच की जा सके। सौदे में सब कुछ आइने की साफ रहा है। संदेह करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। दस्तावेज तो यही बोलते हैं। उसमें हर पहलू पर विस्तार से बताया गया है। उसका अध्ययन किया गया। वायु सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से पूछा गया। लेकिन कहीं भी कोई भी आपत्तिजनक बात नजर नहीं आई। न ही कहीं ऐसा लगा कि सरकार सौदे में कोई हेरीफेरी की गयी है। वास्तविकता तो यह है कि लंबी बातचीत के बाद भी 126 राफेल को लेकर बात नहीं बन पाई। हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और दसॉल्ट में मतभेद बना रहा। दो बातों पर मसला अटक रहा था। पहला-दसॉल्ट उन विमानों की गारंटी देने के लिए तैयार नहीं था जो हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड बनाता। दूसरा- राफेल बनाने में हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड ढाई गुना अधिक समय ले रहा था। इसे लेकर दोनों का मतभेद बना हुआ था। इस वजह से राफेल सौदे में देरी हो रही थी। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से ठीक नहीं था। इसलिए सरकार को मजबूरन यह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। उसके पास और कोई चारा भी नहीं था। दुश्मन देश की क्षमता बढ़ती जा रही थी। इससे वायुसेना अधीर हो रही थी। सरकार के पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था। लिहाजा उसने 126 राफेल का प्रस्ताव वापस लिया और 36 विमान खरीदने का निर्णय लिया।

  • राफेल के मूल्य से जुड़े सारे दस्तावेजों का कोर्ट ने बारीकी से अध्ययन किया। उसमें कही कोई गड़बड़ी नहीं मिली। सरकार राफेल का वास्तविक मूल्य संसद में बता चुकी है। हथियार सहित राफेल का मूल्य सुरक्षा समझौते की वजह से सार्वजनिक नहीं कर सकती। भारत और फ्रांस के बीच सुरक्षा समझौता 25 जनवरी 2008 को हुआ था। उसका अनुच्छेद 10 दोनों देशों को सामरिक महत्व से जुड़े तथ्यों को गोपनीय बनाए रखने की बात करता है।
  • न्यायिक जांच तभी होती है जब इस बात का प्रमाण मौजूद हो कि सरकार ने किसी पक्ष विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए निर्णय लिया हो।
  • 36 राफेल खरीदने का निर्णय रक्षा खरीद नीति 2013 के तहत हुआ है। उसके मुताबिक मित्र राष्ट्र से सामरिक हित के लिए कोई समझौता होता है तो उसे तय प्रक्रिया पालन करना अनिवार्य नहीं होता है। उसके लिए बस सक्षम वित्तीय अथारिटी की अनुमति काफी होती है।
  • आॅफसेट (साझीदार) का चुनाव रक्षा खरीद नीति 2013 के अनुसार हुआ है। यह कानून निर्माता को अपना साझीदार चुनने की आजादी देता है। उसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं होती।
  • राफेल सौदा 23 सितंबर 2016 को हुआ। लेकिन तब सब चुप थे। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद का बयान आने के बाद लाभ लेने के लिए मैदान में कूद पड़े। जनहित याचिकाओं का दौर शुरू हो गया। राफेल से जुड़े हर मसले पर न्यायिक जांच की मांग होने लगी।
  • रिकार्ड पर ऐसा कोई दस्तावेज मौजूद नहीं जिससे साबित होता हो कि सरकार ने रिलायंस का पक्ष लिया हो।
  • हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ दसॉल्ट की बातचीत बहुत लंबी खिंच गई थी। दोनों के बीच मतभेद दूर नहीं हो पा रहा था। मामला राफेल बनाने के समय को लेकर अटका हुआ था। हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड प्रति राफेल बनाने में ज्यादा समय ले रहा था। इसलिए दोनों के बीच बात बन नहीं पा रही थी। उधर वायुसेना अधीर हो रही थी। लिहाजा सरकार को 126 के बजाय 36 राफेल लेने का निर्णय लेना पड़ा।

यह फैसला नियम के तहत हुआ है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने ही वह कानून बनाया था। उसके मुताबिक मित्र राष्ट्र से सामरिक हित के लिए जब कोई खरीदारी करनी हो तो उसमें तय प्रक्रिया का पालन करना जरूरी नहीं होता है। मौजूदा सरकार ने उसी नियम यानी रक्षा खरीद नीति 2013 की धारा 71 के तहत सौदा किया। यही धारा सरकार को तमाम बंधनों से मुक्त करती है और यह अधिकार देती है कि वह सीधे सौदा कर सके। सरकार ने वही किया। उसने नियम का अक्षरश: पालन किया। साझीदार यानी आफसेट के मसले पर भी रक्षा खरीद नीति 2013 का ध्यान रखा गया।

इसके मुताबिक निर्माता ही अपना साझीदार चुनता है। वह इसके लिए स्वतंत्र होता है। कहने का मतलब यह है कि राफेल बनाने वाली कंपनी दसॉल्ट भारत में अपना साझीदार किसे बनाएगी? यह निर्णय उसे करना है। इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं होती। इससे यह साफ है कि रिलायंस का चयन खुद निर्माता यानी दसॉल्ट ने किया है। इन दोनों के बीच बातचीत 2012 से ही चल रही है। लिहाजा दोनों ने अपने व्यावसायिक हितों के हिसाब से निर्णय लिया। रिकार्ड पर भी ऐसे कोई दस्तावेज मौजूद नहीं हैं जिससे यह साबित होता हो कि सरकार ने रिलायंस की परैवी की हो। जहां तक बात राफेल के मूल्य को लेकर है तो उसे लेकर भी सरकार रवैया स्पष्ट है।

वह सुरक्षा समझौते से बंधी है। यह समझौता भारत और फ्रांस की सरकार के बीच 25 जनवरी 2008 में हुआ था। उसमें कहा गया है कि दोनों सामरिक महत्व की सूचना को गोपनीय रखेंगे। सरकार 2008 में हुए उसी समझौते के मुताबिक काम कर रही है। संसद में राफेल का वास्तविक मूल्य बता चुकी है। हथियार समेत राफेल का मूल्य कितना होगा, गोपनीयता के कारण नहीं बता सकती। इसके बाद भी मूल्य के संबंध में कोर्ट के सामने सरकार ने जो दस्तावेज सीलबंद लिफाफे में रखे हैं, उससे कोर्ट संतुष्ट है। वह किसी धारणा और मीडिया रिपोर्ट के आधार पर न्यायिक जांच नहीं कर सकती। इसलिए कोर्ट राफेल से जुड़ी सभी जनहित याचिकाओं को खारिज करती है।

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