सरकार और आरबीआई में मतभेद कैसा?

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आरबीआई और केंद्र सरकार के बीच विवाद का कारण वह भाषण है जो डिप्टी गवर्नर विराल आचार्य ने दिया। उन्होंने अक्टूबर महीने में सरकार से कहा कि वह बैंक के अधिकारों में कटौती करने की कोशिश न करे। उनका कहना था कि सरकार की नीतियां टी20 मैच की तरह हैं जबकि उन्हें टेस्ट मैच की तरह होना चाहिए। इसका पूरा आशय समझे बिना कांग्रेस ने वितंडा खड़ा कर दिया। यह अनुचित है।

पछले कुछ दिनों से रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया और केंद्र सरकार के बीच तनातनी की खबरें लगातार आ रही हैं। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे चुनावी मुद्दा बना लिया। न केवल कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी बल्कि राहुल गांधी भी इस बहस में कूद पड़े। अपनी आधी-अधूरी जानकारी से उन्होंने यह जताने की कोशिश की कि एनडीए सरकार रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया को शक्तिहीन बनाना चाहती है और वहां से 3.6 लाख करोड़ रुपये की मोटी रकम की मांग कर रही है। इतना ही नहीं, बिना जाने-परखे यह भी आरोप लगा दिया गया कि सरकार ने रिजर्व बैंक पर धारा 7 लागू करना चाहती है। यह धारा 7 दरअसल रिजर्व बैंक की शक्तियों को कम करने के लिए सरकार लगा सकती है। ऐसा अब तक कभी नहीं हुआ है लेकिन यह विशेषाधिकार सरकार को मिला हुआ है। सरकार ने रिजर्व बैंक के अडि़यल रुख पर इसका महज जिक्र किया था।

रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया एक स्वायत्त और शक्तिशाली संस्था है जो सरकार की बातें मानने के लिए हमेशा मजबूर नहीं है। वह देश में ब्याज दरें तय करती है, बैंकों के परिचालन से जुड़े काम निर्देश देती है और अर्थव्यवस्था की निगरानी करती है। सरकार ने उसका सम्मान भी किया है तथा कभी हस्तक्षेप नहीं किया। उसका काम तकनीकी रूप से कठिन और जटिल है। इसके लिए वह अपने यहां ऐसे लोगों को रखती है जिनका विषय का ज्ञान बहुत हो। यानी जो सिद्धहस्त हों। यही कारण है कि उसकी बातों पर सरकारें ध्यान देती हैं। दुनिया के लगभग हर देश में इस तरह के केन्द्रीय बैंक हैं और वे सरकार से दूर रहकर एक समान काम करते हैं।

रिजर्व बैंक से धन नहीं मांगा: केंद्र सरकार
विवादों के बीच केंद्रीय आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष गर्ग ने स्पष्ट किया है कि 3.6 लाख करोड़ रुपये ट्रांसफर करने वाली बात आधारहीन है। सरकार ने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं दिया है। केन्द्र के पास धन का अभाव नहीं है और यह बात महज कल्पना की उड़ान है। केवल केंद्रीय बैंक के उचित आर्थिक पूंजीगत ढांचे को तय करने पर विचार का प्रस्ताव है। इस बारे में बेवजह भ्रांतियां फैलायी जा रही हैं। राजकोषीय स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बैंकिंग उद्योग के सामने खड़े हुए ‘बैड लोन’ की समस्या को लेकर आरबीआई की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद 2008 से 2014 के बीच अर्थव्यवस्था को कृत्रिम तौर पर रμतार देने के लिए तत्कालीन सरकार की ओर से बैंकों से अपने दरवाजे खोलने और अंधाधुंध तरीके से कर्ज देने के लिए कहा गया था। तब केंद्रीय बैंक ने बिना सोचे-समझे दिए गए कर्ज की अनदेखी कर दी, जिसकी वजह से कर्ज वृद्धि दर 14 फीसद के सामान्य औसत से बढ़कर 31 फीसद तक पहुंच गई। इस अहम विषय की आरबीआई द्वारा अनदेखी किए जाने की वजह से ही बैंकिंग सेक्टर के सामने एनपीए के अभूतपूर्व संकट की स्थिति बन गई है।

इस समय जो हालात पैदा हुए हैं, उनके पीछे दरअसल एक भाषण है जो रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया के डिप्टी गवर्नर विराल आचार्य ने दिया। उन्होंने अक्टूबर महीने में सरकार से कहा कि वह बैंक के अधिकारों में कटौती करने की कोशिश न करे। दरअसल उनका कहना था कि सरकार की नीतियां टी20 मैच की तरह हंै जबकि उन्हें टेस्ट मैच की तरह होना चाहिए। उसी भाषण में आचार्य ने अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था और वहां के केन्द्रीय बैंक की चर्चा की। अर्जेंटीना में सरकार ने वहां के केन्द्रीय बैंक के अधिकारों में काफी हस्तक्षेप किया जिसका भारी असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा। इस तुलना को नासमझ कांग्रेसी ले उड़े और उसने शोर मचा दिया जबकि हालात कहीं से वैसे नहीं हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था अभी सबसे तेज गति से चल रही है और वह अगले साल दुनिया की पांचवीं अर्थव्यवस्था बन जाएगी। अर्जेंटीना की तरह यहां ऐसा कुछ भी नहीं है। अर्थव्यवस्था का मूल आधार मजबूत है और हमारे पास 400 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। इसके अलावा हमारे पास 21 अरब डॉलर का स्वर्ण भंडार तथा आईएमएफ से डेढ़ अरब डॉलर तक का धन निकालने का अधिकार यानी स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स है। चीन के अलावा किसी अन्य देश के पास यह भंडार नहीं है। इससे हमारी आर्थिक ताकत का पता चलता है।
इस समय जो मुद्दा है, वह यह है कि रिजर्व बैंक ने सरकार की बात नहीं मानी और अफवाहें तो यहां तक हैं कि उसके गवर्नर उर्जित पटेल ने इस मामले पर संकेत दिया है कि वह पद छोड़ भी सकते हैं। कल तक जो लोग खासकर कांग्रेसी नेता उर्जित पटेल की हर बात पर आलोचना करते थे, उन्हें सरकार का एजेंट बताते थे और अंबानी का रिश्तेदार, वह अचानक ही पिघल गए हैं और उनकी प्रशंसा में कसीदे काढ़ने लगे हैं। पटेल अब उन्हें अच्छे लगने लगे हैं और उनकी वाहवाही हो रही है।
यह मामला सरकार की उस मांग से जुड़ा हुआ है जिसमें उसने रिजर्व बैंक से अतिरिक्त धन निकालने का आग्रह किया है ताकि वह अपने कई तरह के काम जिसमें सरकारी बैंकों की आर्थिक स्थिति सुधारने की जिम्मेदारी है ,निपटा सके। अधिकृत तौर पर इस बात की जानकारी नहीं है कि सरकार ने कितने की राशि मांगी है लेकिन कहा जा रहा है कि उसने 3.6 लाख करोड़ रुपये की राशि मांगी है। इस बात की पुष्टि नहीं की गई लेकिन यह तय है कि सरकार को बैंकों को और मजबूत बनाने तथा बाजार में तरलता लाने के लिए धन की जरूरत है और रिजर्व बैंक के पास काफी अतिरिक्त धन है। दरअसल भारतीय रिजर्व बैंक ने जितना अतिरिक्त धन अपने पास रखा हुआ है, उतना किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था में नहीं है। अगर अंग्रेजी अखबार टाइम्स आॅफ इंडिया की बात मानी जाए तो रिजर्व बैंक के पास इस समय 9.59 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त धन है जिससे सरकार 3.6 लाख करोड़ रुपये मांग रही है। रिजर्व बैंक सिर्फ रुपये छापने का काम नहीं करता है बल्कि बैंकों को एक निश्चित ब्याज दर पर उधार भी देता है। इसके अलावा वह पैसे निवेश भी करता है जिससे उसे अच्छा रिटर्न मिलता है। यह पैसा ही रिजर्व फंड कहलाता है और इसे ही लेकर तनातनी है। यहां पर सवाल है कि क्या रिजर्व बैंक की स्वायत्तता इतनी बड़ी है कि वह किसी भी मामले में सरकार को न कर दे? इस समय तो यह मामला राजनीतिक ज्यादा और आर्थिक कम लग रहा है जिससे विपक्षी दलों को मोदी सरकार पर निशाना साधने का मौका मिला है। वे इसे देश को बर्बादी की ओर ले जाने वाला मामला बता रहे हैं। लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है और कहीं ऐसा कोई कदम नहीं है। फिर भी हमें यहां जानना होगा कि सरकार को कितना अधिकार है। यह बात डॉक्टर मनमोहन सिंह से ज्यादा कोई नहीं बता सकता है क्योंकि वह इस देश के एकमात्र व्यक्ति हैं जो रिजर्व बैंक के गवर्नर बने, वित्त मंत्री बने और प्रधान मंत्री भी। उनकी बेटी दमन सिंह की एक किताब ‘स्ट्रिक्टली पर्सनल: मनमोहन एंड गुरशरण’ में उन्होंने साफ तौर पर लिखा है कि रिजर्व बैंक वित्त मंत्री से बड़ा नहीं होता है। उन्होंने यह भी लिखा है कि अगर वित्त मंत्री कुछ कहता है तो रिजर्व बैंक को उसकी बात माननी ही होगी, नहीं तो इस्तीफा देने के लिए उसे तैयार रहना चाहिए। उन्होंने इंदिरा गांधी के कार्यकाल में हुई एक घटना का जिक्र करते हुए लिखा है कि ऐसा कठिन अवसर उनके सामने आया था तो उन्होंने इस्तीफा देने की ठान ली थी। लेकिन बाद में खुद उन्होंने इंदिरा गांधी को अपनी बात से आश्वस्त करवा लिया था जिससे गतिरोध खत्म हो गया। जाहिर है कि रिजर्व बैंक कोई अति विशिष्ट संस्था नहीं है। यह भी एक नियामक है जिसे सरकार की जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए। डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा है कि हमेशा ‘इस हाथ से ले, उस हाथ से दे’ की नीति कारगर होती है।
इसका मतलब साफ है कि दोनों पक्षों को बैठकर एक-दूसरे की बातें सुननी होंगी और समझ कर कार्रवाई करनी होगी। बिना किसी पूर्वाग्रह के एक दूसरे की बात सुनना सभी के हित में है। बेहतर होगा कि दोनों पक्ष बैठकर इस मामले पर संवाद कर लें। इससे मामला भी सुलझ जाएगा और बैंक की स्वायत्तता भी बरकरार रहेगी। उर्जित पटेल ने फिलहाल इस्तीफा देने जैसा कुछ नहीं कहा है। बोर्ड की बैठक 19 नवंबर को बुलाई है। नेहरू के समय में क्या हुआ था?
जब पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रधान मंत्री थे तो उनके समय में टीटी कृष्णमाचारी वित्त मंत्री होते थे जो काफी कठोर स्वभाव के थे। उन्होंने रिजर्व बैंक को तो वित्त मंत्रालय का एक सेक्शन (अनुभाग) बता दिया था और अपनी मांगें न मानने पर गवर्नर सर बेनेगल रामाराव को इतना अपमानित किया कि वह पद छोड़कर चले गए। 1957 में हुई इस घटना से नेहरू की काफी छीछालेदर हुई लेकिन वे अड़े रहे और अपने वित्त मंत्री का समर्थन करते रहे।
क्या कह रहे हैं रघुराम राजन
रिजर्व बैंक के चर्चित गवर्नर रघुराम राजन ने भी इस मामले पर अपनी राय दी है। उन्होंने दोनों पक्षों को मिल बैठकर अपने मुद्दे सुलझाने की सलाह दी। उनका कहना है कि रिजर्व बैंक गाड़ी चला रहे ड्राइवर का सीट बेल्ट है जिसे पहने रहने में ही उसकी भलाई है। यहां पर सरकार ड्राइवर की भूमिका में है जो देश चला रही है। उसे सावधान रहने की जरूरत है। █

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