समाज ने दुत्कारा, बापू ने अपनाया

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संत मोरारी बापू ने अयोध्या में गणिकाओं को एक सप्ताह तक रामकथा का रसपान कराया। इसी कार्यक्रम में उन्होंने गणिका-उद्धार के लिए 11 लाख रुपये देकर मदद का आह्वान किया था। उनके आह्वान के बाद देश-विदेश से 4.5 करोड़ रुपये सहायता दिए जाने की घोषणा हुई। अकेले 1 करोड़ रुपये इंग्लैण्ड के उद्योगपति रमेश भाई सचदेव, 51 लाख रुपये कथा के यजमान शिव बाबू और 51 लाख रुपये कोलकाता के मनोज मोदी फांउडेशन ने देने की घोषणा की है।

 

णिका। प्रचलित शब्द है सेक्स वर्कर। समाज उन्हें हिकारत की नजरों से देखता है। वे उपेक्षित हैं। रामकथा मर्मज्ञ मोरारी बापू ने ऐसी ही गणिकाओं को मुख्य धारा में लाने का बीड़ा उठाया है। रामनगरी अयोध्या में बापू ने उनको रामकथा का रसपान कराया। कथा की शुरुआत 22 दिसम्बर से हुई। एक सप्ताह तक चलने वाली इस कथा में गणिकाओं को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। लगभग 200 की संख्या में ये गणिकायें मुम्बई समेत देश के अन्य शहरों से इसमें भाग लेने आर्इं।
कथा के उद्घाटन सत्र में राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास भी शामिल हुए। मोरारी बापू ने कहा कि अयोध्या में कथा के आयोजन का मकसद बदनाम गलियों में रहने वाली गणिकाओं ‘सेक्स वर्कर्स’ के सामाजिक तिरस्कार को दर्शाना व उनका उद्धार करना है। बापू ने कथा की शुरुआत भी मानस की चौपाइयों से की। उन्होंने कहा कि ये लोग समाज से तिरस्कृत हैं। इसके लिए समाज भी जिम्मेदार है। यह कथा उनके लिए भी है। बापू ने ‘हमारे हरी अवगुण चित ना धरो’ का उदाहरण दिया और इसे गणिकाओं के सामाजिक उद्धार से जोड़ा। कहा- किसी भी तरह भगवान इन पर कृपा करें। इन लोगों का यहां पर प्रायश्चित हो जाए। अयोध्या तारने वाली भूमि है। भगवान राम पतित पावन के साथ चरित्र पावन भी हैं। राम आध्यात्मिक महापुरुष हैं, ऐतिहासिक नहीं। उनको संख्या में बांधा नहीं जा सकता। राम कथा गंगा की तरह है, जिसका श्रवण करने के लिए सबको आमंत्रित किया जाता है।

मोरारी बापू कहते हैं, ‘इनके घरों में भी मंदिर हैं। वे खुद पूजा करती हैं। किसी से पूजा करवाती नहीं हैं। प्रभु राम ने सबको स्वीकारा है। वे दलित, वंचित, तिरस्कृत, पावन सबके हैं।’ मोरारी बापू ने गणिकाओं के साथ राम एवं रामनगरी की भावधारा में डुबकी लगाई। दर्शन-अध्यात्म के बेशकीमती मोतियों से गणिकाओं का शृंगार किया। बापू ने रामचरितमानस की ही तरह साहिर लुधियानवी की शायरी मर्मस्पर्शी राग में पेश किया। जरा मुल्क के रहबरों को बुलाओ, ये कूचें ये गलियां ये मंजर दिखाओ/ जिन्हें नाज है हिन्द पर उनको यहां लेकर आओ। …बापू ने कूचें और गलियों को रोशन करने वाले हिन्द के नाज की नजीर पेश की। गणिकाओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि इल्मियों ने वह नहीं किया, जो इन लोगों ने किया है। श्रोताओं को उन्होंने भरत-निषाद मिलन के साथ अहिल्या-उद्धार के प्रसंग की याद दिलाई। कहा कि असल में राम, भगवान राम तब बने जब अहिल्या के पास गए। इस दौरान बापू उन पर प्रहार करने से भी नहीं चूके, जो पतित-वंचित उद्धार में मीन-मेख निकालते हैं। उन्होंने कहा कि मैं नहीं, तुम्हें तुम्हारी पिटी-पिटाई सोच धक्का दे रही है।
बापू ने भगवान दत्तात्रेय का उदाहरण दिया जिनके 24 गुरुओं में एक गणिका भी थी। उन्होंने गणिका को समाज का सुकून बताया। याद दिलाया कि बंगाल में दुर्गा प्रतिमा निर्माण के लिए पहली मिट्टी गणिका के घर से जाती है। इसके साथ ही सवाल उठाया कि जिसके घर की मिट्टी से दुर्गा बनती हैं, उसे अस्वीकार कैसे किया जा सकता है? बापू कहते हैं, जेहि अपराध असाधु जान मोहि तजेउ अज्ञ की नाई…।

कथा के बीच में बापू भगवान से भी मुखातिब होते हैं। पूछते हैं, कारण तो बताओ ठाकुर क्यों मुंह फेर रखा है? बापू एक बौद्धकालीन प्रसंग का दृष्टांत देकर गणिका की स्वीकार्यता परिभाषित करते हैं। कहते हैं, डर जाओगे तो, बिगड़ने के डर से कहीं नहीं जा पाओगे-तुम भजनानंदी हो तो कोई ताकत तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। उन्होनें मशहूर फिल्मी गीत की यह पंक्ति भी गायी। ‘दर्पण तुम्हें जब डराने लगे/ जवानी भी दामन छुड़ाने लगे/ तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा दर खुला है-खुला ही रहेगा।…’

बंगाल में वासंती नाम की एक गणिका थी जो राम चंद्र कृपालु भजमन.. सुनकर तुलसी की दीवानी हो गयी। उसने पेशा करना छोड़ दिया। उसके अंतिम समय पर तुलसी उसके पास गये और यह पद गाया। मुझे लगा कि समाज में ऐसी उपेक्षित गणिकाओं को मुख्यधारा में लाने का अयोध्या से बढ़िया स्थान नहीं हो सकता है। कथा के लिए अयोध्या को चुना।

संत मोरारी बाबू

मानस में वर्णित गणिकाओं के उद्धार के सूत्र को आत्मसात किया। प्रतिदिन बापू की कथा के समापन पर मानस की भाव वंदना एवं आरती के माध्यम से कथा के सत्र में गणिकाओं की सहभागिता हुई। बापू लम्बे समय से मानस की किसी एक चौपाई को विषय बनाते हैं। इस बार अयोध्या में बापू के मानस के समापन सर्ग में ‘पाई न केहिं गति पतित पावन। रामभजि सुन सठ मना। गनिका अजामिल ब्याध गीध, गजादि खल तारे घना। इस कथा का सुखद पक्ष यह रहा कि स्थानीय संतों के विरोध के बावजूद मोरारी बापू ने विशेष तौर पर इस आयोजन के लिए इस स्थान का चयन किया।
कथा में भाग लेने वाली गणिकाओं ने बाबू के अमृत वचन सुन अपने को धन्य बताया। सोनाली (बदला हुआ नाम) नामक गणिका का कहना है कि इसे मैं अपने जीवन का सबसे अमूल्य उपहार मानती हूं। यह हमारे लिए बहुत सम्मान की बात है। जहां हमसे कोई सार्वजनिक रूप से मिलना नहीं चाहता है, वहीं बापू ने हमें अपनाया, बुलाकर सम्मान दिया। सोनम (बदला हुआ नाम) का कहना है कि हम भी भगवान राम के उपासक हैं। हम भी प्रभु श्रीराम के जन्म स्थान पर आना चाहते थे। हमारा वह सपना साकार हुआ। हम चाहते हैं कि प्रभु राम हमें भी स्वीकार करें।

वैसे गणिकाआें के रूप में समाज के वंचित तबके के प्रति संवेदना जताने वाले बापू पहले आध्यात्मिक आचार्य नहीं हैं। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ऐसे अनेक आचार्य हुए हैं, जिनकी संवेदना की व्यापक परिधि में गणिकाएं शामिल रही हैं। गौतम बुद्ध और वैशाली की नगरवधू आम्रपाली की कथा ढाई हजार वर्ष बाद आज भी प्रवाहमान है। बौद्ध कथाओं के अनुसार बुद्ध के उपदेश सुन आम्रपाली ने नगरवधू के पद का परित्याग कर भिक्षुणी का जीवन अंगीकार किया। एक अन्य कथा के अनुसार बुद्ध के अत्यंत रूपवान और प्रतिभाशाली शिष्य उपगुप्त पर आसक्त वासवदत्ता एक रात चुपके से उनके विहार में पहुंच गई। घोर अंधकार में अकेली वासवदत्ता को सामने पाकर उपगुप्त हतप्रभ रह गए।

उन्होंने संयम का परिचय दिया। उपगुप्त का सान्निध्य पाने को बेताब वासवदत्ता ने उन्हें अपने दिव्य महल में आने का आमंत्रण दिया और उपगुप्त ने उन्हें उचित समय पर आने का आश्वासन दे वापस लौटा दिया। काफी समय बाद उपगुप्त निर्जन मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। इसी बीच उन्होंने मार्ग के किनारे प्रौढ़ा रमणी को कराहते हुए सुना। वे सहायता के लिए आगे बढ़े तो रमणी ने उनका परिचय पूछा। उपगुप्त ने परिचय देते हुए बताया कि यही मेरे आने का उचित समय था। इसके बाद तो वासवदत्ता ने जैसे देहज्ञान से ऊपर उठकर आत्मज्ञान को प्राप्त कर लिया। गोस्वामी तुलसीदासजी के भी जीवन में वासंती नाम की वेश्या का उल्लेख मिलता है। गोस्वामीजी के मुख से रामकथा सुनने के बाद वासंती चिरनिद्रा में लीन हुई।

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