सनक में गई हनक

लोक वर्मा सीबीआई से रुख्सत हुए। उन पर गंभीर आरोप है। उसके चलते ही बाहर का रास्ता दिखाया गया। निर्णय प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने लिया। निर्णय बहुमत से हुआ। समिति में मुख्य न्यायधीश के प्रतिनिधि न्यायमूर्ति एके.सीकरी और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे हैं। बैठक प्रधानमंत्री के आवास सात लोक कल्याण मार्ग पर हुई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की वजह से करनी पड़ी। कोर्ट में आलोक वर्मा ने छुट्टी पर भेजे जाने वाले सरकार के निर्णय को चुनौती दी थी। पिछले दिनों कोर्ट ने वर्मा की छुट्टी रद्द कर दी थी और उन्हें अपना पद संभालने का आदेश दिया था। लेकिन आरोप को देखते हुए, उन्हें नीतिगत फैसले लेने मना कर दिय था। उनके भविष्य का निर्णय उच्च स्तरीय समिति पर छोड़ दिया। उसे भी एक सप्ताह का मौका दिया।
लिहाजा कोर्ट का फैसला आने के दूसरे दिन प्रधानमंत्री ने बैठक बुला ली। वहां सीवीसी की रिपोर्ट समिति के सामने थी। कई संवेदनशील मामलों में आलोक वर्मा का रवैया सवाल खड़ा कर रहा था। लालू के मामले में वे एक अधिकारी को बचाने में लगे थे। यही नहीं, उनके यहां जो रेड सीबीआई को करनी थी, उस पर भी आलोक वर्मा ने टांग अड़ा दी। राकेश अस्थाना के अड़ने के बाद वह रेड पड़ी थी। उन पर यह भी आरोप है कि कोयला घोटाले से जुड़े लोगों के बारे में कई खुफिया जानकारी मिली थी।

पर उनके खिलाफ लुक आउट नोटिस नहीं जारी किया गया। उन्हें निदेशक ने भागने दिया। आरोप तो आलोक वर्मा पर यह भी है कि उन्होंने नीरव मोदी को भी भागने में मदद की। वर्मा की ईमानदारी पर सवाल उठाते हुए तीन अन्य आरोप सीबीआई की लखनऊ शाखा में तैनात अडिशनल एसपी सुधांशु खरे ने लगाए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्मा ने उत्तर प्रदेश एटीएस के अडिशनल एसपी राजेश साहनी की आत्महत्या की जांच से इनकार कर दिया, जो आॅफिस में गोली लगने से मृत पाए गए थे। खरे ने कहा था कि वर्मा ने यह सब यूपी के कुछ पुलिस अधिकारियों को बचाने के लिए किया। इस मामले में योगी सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश की थी, लेकिन एजेंसी ने कभी इस मामले को जांचने में रुचि नहीं दिखाई। खरे ने वर्मा पर राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले के आरोपी को भी बचाने का आरोप लगाया था। यही नहीं, एसबीआई बैंक फ्रॉड मामले में रंजीत सिंह और अभिषेक सिंह आरोपी थे, लेकिन उन दोनों को भी बचाया गया।

मोइन कुरैशी वाले मामले में तो वर्मा सीधे ढाल बनकर खड़े थे। जांच में बाधा पैदा कर रहे थे। सीवीसी के मुताबिक सतीश सना से दो करोड़ रुपये लिए गए थे। इसमें उनका कामकाज संदेह के दायरे में है। कुछ ऐसा शक उन पर जमीन घोटालों को लेकर भी था। दावा किया गया कि इस मामले से जुड़ी जांच को उन्होंने धीमा कर दिया था। वे नहीं चाहते थे कि जांच आगे बढ़े। यह सीबीआई के निदेशक पद पर बैठे व्यक्ति की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल था। यही नहीं, उनकी वजह से देश की सर्वोच्च एजेंसी की साख पर भी बट्टा लग रहा था। जिस एजेंसी को देश की जनता बहुत सम्मान से देखती है, निदेशक की वजह से उस पर संदेह किया जाने लगा था। कहा जाने लगा था कि जहां इतना भ्रष्टाचार है, वहां निष्पक्ष जांच कैसे हो सकती है। वहां हालात इस कदर खराब हो गए थे कि संस्थान के अधिकारी ही अपने सहयोगियों की स्रूपिंग करने लगे थे। इन परिस्थितियों में और निदेशक पर लगे संगीन आरोपों को देखते हुए, संस्थान की साख को बहाल करना जरूरी हो गया था। इसलिए उच्च स्तरीय समिति बैठी।

वहां सीबीआई की साख को बनाए रखने का निर्णय हुआ। जो आलोक वर्मा के पद पर बने रहने से संभव नहीं था। कारण, वह खुद आरोपों से घिरे थे तो उनके रहते संस्थान की साख बनी नहीं रह सकती थी। संस्थान साख को बनाए रखने के लिए आलोक वर्मा को हटाना एक मात्र विकल्प था। यह निर्णय लेने में भी दो दिन लगा। समिति को इस मसले पर गहन विचार विमर्श करना पड़ा। तब कही जाकर वर्मा को पद से हटाया गया। खड़गे ने उसका विरोध किया। उसमें कुछ नया नहीं था। कांग्रेस भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के साथ ही खड़ी रहती है। उसने अपने स्वभाव के हिसाब से काम किया और आलोक वर्मा के हटाए जाने का विरोध किया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और न्यायमूर्ति एके.सीकरी का मत एक था। लिहाजा आलोक वर्मा को अपना कार्यकाल पूरा होने से 21 दिन पहले सीजीओ कॉम्पेक्स से जाना पड़ा।

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