‘व्यभिचार को वैधता’ से मुश्किलें

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भारतीय समाज में बेटी व पत्नी दोनों ही परिवार की इज्जत मानी जाती हैं। पर-पुरुष से संबंध रखने वाली पत्नी कुलटा, कलंकिनी और कुलनाशिनी मानी जाती है। उसके अवैध संबंधों का पता लगने पर समर्थ पति तलवार या बंदूक उठा उस पुरुष को मारने दौड़ पड़ता है। पत्नी को भी घर से निकाल बाहर खड़ा कर दिया जाता है और वह कुछ कर नहीं पाती। यह सब अभी भी चलता रहेगा। हो सकता है कि उसमें बढ़ोतरी ही हो।

व्यभिचार संबंधी फौजदारी कानून भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 497 को खत्म करके सुप्रीम कोर्ट ने समाज में व्यभिचार को कानूनी घोषित कर दिया है। वैसे तो इससे पति व पत्नी दोनों को ही ‘व्यभिचार’ के लिए खुली छूट मिल गई है पर इसका सीधा लाभ पति को मिला है। कारण, अभी तक इस कानून के तहत सजा केवल पुरुष को ही मिलती थी, स्त्री को नहीं। यह कानून 1860 में बना था। अंग्रेजों ने बनाया था तो पुरुष प्रधान भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति के मद्देनजर वे मानकर चलते थे कि अवैध यौन संबंधों में वह पहल नहीं कर सकती, न पुरुष को इसके लिए उत्प्रेरित ही कर सकती है इसलिए उसे इस अपराध का दोषी भी नहीं माना जा सकता। ऐसे में कानून में व्यभिचार के अपराध में केवल पुरुष के लिए ही सजा मुकर्रर की गई थी। इस कानून के मुताबिक अगर कोई विवाहित पुरुष किसी दूसरी विवाहित महिला से, उसके पति की सहमति के बिना, सहवास करता है तो वह व्यभिचार का दोषी माना जाएगा।

पति उस पुरुष के खिलाफ मुकदमा दायर कर सकता है जिसमें उसे पांच साल की सजा या जुर्माना या फिर दोनों ही हो सकते हैं। पर जिस स्त्री से उसने ये संबंध स्थापित किए, उसे किसी प्रकार का दोषी नहीं माना जाएगा। उसका पति पर-पुरुष से संबंध बनाने का दोषी मानते हुए उससे तलाक तो मांग सकता है पर व्यभिचार के आरोप में उसे कोर्ट में खड़ा नहीं कर सकता। इटली में रह रहे एक भारतीय जोसेफ शाइन ने इसी को आधार बना इस धारा की संवैधानिकता को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि इसमें पुरुष को तो व्यभिचार का दोषी माना गया है पर स्त्री को नहीं। जबकि विवाहेतर यौन संबंध वह भी स्थापित करती है। यह बात संविधान की धारा 14, 15 का उल्लंघन है जिसमें स्त्री पुरुष को समान माना गया है।

पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने 27 सितंबर को एक राय से दिए गए फैसले में धारा 497 को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश और संवैधानिक पीठ के प्रमुख दीपक मिश्रा का कहना था कि 497 के तहत डेढ़ सौ साल पहले बने इस कानून में स्त्री को संपत्ति की तरह माना गया है जो पूरी तरह पति की इच्छा के अधीन है। जब यह कानून बना था, उस समय का समाज पुरुष प्रधान व सामंती था। पुरुष पत्नी को अपनी संपत्ति मानता था इसलिए उसके विवाहेतर संबंधों को वह पचा नहीं पाता था। न्यायमूर्ति आर एफ नारीमन के अनुसार-‘इसलिए व्यभिचार के आरोप में मिलने वाली सजा व्यभिचार के आरोप में नहीं है वह तो इसलिए है कि पति को लगता है कि उसकी पत्नी रूपी संपत्ति पर डाका डाला गया है। सभी जजों की एक राय थी कि अब वक्त आ गया है कि संविधान के मुताबिक महिला के मान-सम्मान व गरिमा को कायम किया जाए। पति उसे अपना गुलाम मानकर नहीं चले। वह उसका मालिक नहीं है।

क्योंकि धारा 497 संविधान की धारा 14 व 15 का उल्ंलघन करती है और महिला की गरिमा के खिलाफ है इसलिए इसे रद्द किया जाता है। इस तरह व्यभिचार को अपराध के दायरे से बाहर कर देश की सर्वोच्च अदालत ने महिलाओं के प्रति उसकी नजर में डेढ़ सौ साल से चले आ रहे अन्याय को खत्म कर दिया है। ठीक ही है अब पत्नी भी स्वेच्छा से अपनी पसंद के पुरुष से विवाहेतर संबंध कायम कर सकेगी और उसका पति उसके प्रेमी को कोर्ट में नहीं घसीट सकेगा जो कि अभी तक वह कर सकता था। मान लिया। पर उस पत्नी का क्या जिसका पति किसी दूसरी विवाहित महिला के साथ हमबिस्तर होता है पर उसे अपने पति को कोर्ट में खड़ा करने का अधिकार 497 नहीं देती। होना तो यह चाहिए था कि व्यभिचार को अपराध के दायरे से निकालने की बजाए सुप्रीम कोर्ट पत्नी को भी अपने व्यभिचारी पति के खिलाफ कोर्ट में जाने का अधिकार देती। तब सही मायने में स्त्री की गरिमा की रक्षा होती। पुरुष की सत्ता पर चोट भी लगती।

समाज में आखिर विवाह संस्था का आधार परस्पर विश्वास ही तो है। पर उसकी बजाए कोर्ट ने समाज में ‘व्यभिचार’ को बढ़ावा देना अधिक सही समझा। धारा 497 को रद्द किए जाने को न्यायोचित ठहराते हुए न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने कहा कि अगर व्यभिचार को एक अपराध माना जाए तो वैवाहिक जीवन की निजता में घुसपैठ बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी। इसलिए बेहतर है कि इसे तलाक का आधार मानकर छोड़ दिया जाए। सवाल है कि तलाक का यह अधिकार तो पहले भी चारों के पास था। तो फिर स्त्री को मिला क्या? धारा 497 उसे व्यभिचार करने से पहले भी नहीं रोक रही थी। उसका पति इसके लिए उसे पहले भी कोर्ट में नहीं घसीट सकता था। अपने प्रेमी के लिए पति से तलाक ले लेने का अधिकार पहले भी उसके पास था तो फिर उसे नया क्या मिला? कानूनी रूप से कुछ नहीं। धारा 497 को रद्द कर दिए जाने से अगर कोई सजामुक्त हुआ है तो वह पुरुष। अभी तक अगर कोई कानूनी सजा का डर होता था तो उसे ही स्त्री को नहीं। तो फिर क्यों फैसले को समाज में स्त्री के प्रति अन्याय को कम करने और उसके सशक्तिकरण की ओर एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इसलिए कि यौन संबंधों में अब तक पति का उस पर जो एकाधिकार था वह समाप्त हो गया है।

कोर्ट ने कह दिया है कि पति व पत्नी दोनों ही विवाहेतर संबंध रख सकते हैं। दोनों में से किसी को आपत्ति हो तो वह तलाक ले सकता है। नि:संदेह जहां हर कदम पर समाज में स्त्री से शुचिता, पवित्रता व नैतिकता की मांग की जाती हो और खुद पुरुष हर प्रकार का यौनाचार करने के लिए स्वतंत्र हो, वहां यौन संबंधों में छूट स्त्री को उसकी जकड़ से काफी हद तक बाहर ले आती है। भारतीय समाज में बेटी व पत्नी दोनों ही परिवार की इज्जत मानी जाती हैं। पर-पुरुष से संबंध रखने वाली पत्नी कुलटा, कलंकिनी और कुल नाशिनी मानी जाती है। उसके अवैध संबंधों का पता लगने पर समर्थ पति तलवार या बंदूक उठा उस पुरुष को मारने दौड़ पड़ता है। पत्नी को भी घर से निकाल बाहर खड़ा कर दिया जाता है और वह कुछ कर नहीं पाती। यह सब अभी भी चलता रहेगा। हो सकता उसमें बढ़ोतरी ही हो।

इसमें कोई शक नहीं कि विवाहेतर यौन संबंधो को अपराध के दायरे से बाहर ला अदालत ने स्त्री-पुरुष संबंधों में पुरुष वर्चस्व पर कड़ा आघात किया है। पर सामाजिक स्तर पर इससे उसकी स्थिति और ज्यादा खराब होगी। महिला अब बड़ी संख्या में घर से बाहर आ रही है। कमा रही है। उसकी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। पुरुष वर्ग उसकी इन महत्वाकांक्षाओं को अपनी यौन संतुष्टि के लिए पहले से ही भुना रहा है। दμतर, राजनीति, बाजार और परिवार सभी जगह। अभी तक वह नैतिकता का तर्क देकर अपने को थोड़ा बहुत बचा लेती थी पर अब उसके पास अपना यह हथियार नहीं रहा। ऐसे में उसकी मुश्किलें कम नहीं होंगी। वे बढ़ेंगी ही। इसीलिए दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालिवाल ने इस फैसले का पूर्णतया महिला विरोधी बताते हुए इसका कड़ा विरोध किया है। एक तर्क यह भी आ रहा है कि इस फैसले के बाद समाज में बिखराव बढ़ेगा। निश्चित ही। जब परिवार की इकाई के दो आधार स्तंभ ही व्यभिचार में लिप्त हो जांए तो बच्चों को क्या संस्कार मिलेंगे? उनकी परवरिश किस तरह की होगी और बड़े होकर वे कैसे नागरिक बनेंगे? तलाक बढ़ेंगे तो बच्चों में असुरक्षा व डिप्रेशन भी बढ़ेगा। ‘पति-पत्नी और वो’ के रिश्तों से समाज में यौन हिंसा भी ज्यादा देखने को मिलेगी।

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