वतन और वजूद की तलाश

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जो राजनेता या राजनीतिक दल नागरिकता कानून का विरोध करते हैं, वे जरा दिल्ली के मजलिस पार्क की ओर नजर दौड़ायें। पाकिस्तान से आये हिंदू शरणार्थियों की बदहाली पर उनका ध्यान जरूर जायेगा। ये शरणार्थी बदहाली के बीच भी पाकिस्तान नहीं जाना चाहते हैं। इनके अनुसार पाकिस्तान उनके लिए नरक है। उन्हें केवल भारत की नागरिकता चाहिए।

न्हें अपने वतन की तलाश है। इन्हें अपने वजूद की खोज है। अल्पसंख्यकों के साथ पाकिस्तानी हुकूमत के व्यवहार का ये वो चेहरा हैं जो नामालूम कलमकार की बेनाम खबर बनकर रह गए। ये पाकिस्तान के उन दावों की अंतर्कथा भी है जिसके वजीर-ए-आजम अकलियतों के साथ सुलूक को लेकर हिंदुस्तान को सीख देने की हरचंद कोशिश करते हैं। वतन और वजूद की इनकी तलाश, हिन्दुस्तान आकर पूरी तो हो गई लेकिन इनके लिए ये तय होना अभी बाकी है कि सरहद के इसी पार के मुकम्मल नागरिक हैं।

दिल्ली का एक मेट्रो स्टेशन है मजलिस पार्क। दूर से ही दिख जाती है एक बस्ती, जहां पाकिस्तान के अलग- अलग हिस्सों से आए शरणार्थियों ने पनाह ली है। सभी अलग-अलग दौर में और दीगर हालात में भारत आए। वे एक बार यहां आए तो अपने मुल्क लौटने को हरगिज राजी न हुए। इन शरणार्थियों के अनुसार ‘हमारी नस्ल ने तो अपनी औलादों के लिए अपनी ही जिंदगी में बाकायदा मरकर जन्नत पाई है… यहां से भी नाउम्मीद हुए तो कहां ठौर पाएंगे?’भारत में शरणार्थी की जिंदगी इन्हें मंजूर है, पाकिस्तान की नागरिकता नहीं। रोजमर्रा की दुख-तकलीफ और दुश्वारियां फिर भी कम नहीं हैं। मगर इन्हें सुकून है कि वे यहां महफूज हैं। झुग्गियां ही सही, इनके घरों में भी होली-दीवाली जैसे तीज-त्योहार आते तो हैं। हर सुबह अपनी मान्यताओं के मुताबिक मंदिरों की पूजा- प्रार्थना तो कर लेते हैं। शरणार्थी शिविर की बुजुर्ग महिला मोहिनी हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हुई कहती हैं कि ‘ईश्वर बहुत बड़ा है… सबकी सुनता है, हमारी भी सुनेगा।’
वे अपने कुनबे के साथ 2013 में यहां आई थीं। पूछने पर कि क्या कभी अपने मुल्कÞ की याद नहीं आती? शरणार्थी शिविर की दुश्वारियों के कारण कभी वापस लौट जाने का मन नहीं करता? छूटते कहती हैं,‘…वहां क्या था जिसके छूट जाने का गम हो? किसी तरह यहां आकर तो जिंदगी मिली है, वहां लौटने के बारे में ख्वाब में भी नहीं सोचती।…’ यहां जैसी भी जिंदगी है, कम-से-कम है तो सही!’ मुख्य सड़क के ठीक किनारे बड़े हिस्से में शरणार्थियों की झुग्गियां हैं। बस्ती के भीतर जाने पर जिंदगी हरगिज आसान नहीं दिखती। टूटी-फूटी झुग्गी-झोपडि़यां… रस्सियों पर टंगे फटे, मैले- कुचैले कपड़े… कुछेक दीवारों पर हीरो-हिरोइन के एकाध पोस्टर शायद इस बेनूर जिंदगी में कुछ रंगत भरने के इरादे से लगाए गए हों। गृहस्थी के नाम पर बरामदे पर पसरे कुछ छोटे-बड़े प्लास्टिक के डिब्बे…कालिख लगे टीन के कुछ कनस्तर, स्टील और कांसे के थोड़े-से पुराने बर्तन… कई परिवारों का साझा चूल्हा और इधर-उधर से चुनकर लाई गई लकडि़यों से रसोई के इंतजाम में जुटी महिलाएं। इधर-उधर घूमते छोटे-छोटे बच्चे और धूप में बैठे कुछ बड़े-बुजुर्ग। कुल मिलाकर यही है इनकी जिंदगी में शरणार्थी शिविर का हासिल। इसके बाद भी यहां जिंदगी धड़कती है। 13 साल का युवराज क्रिकेट का शौकीन है। सरकारी स्कूल की सातवीं कक्षा में पढ़ता है। मोबाइल को लेकर बालसुलभ उत्सुकता उसमें दिखती है। कहता है कि पाकिस्तान में उसकी पहचान के बच्चे ये जानकर काफी खुश होते हैं कि वह यहां स्कूल भी जाता है। उसकी पहचान वाले ज्यादातर हिंदू परिवारों के बच्चे ही हैं। पाकिस्तान में रहते हुए कभी वो पढ़ नहीं पाता, इसका वो जिक्र करना नहीं भूलता। हालांकि बस्ती में ही उसने एक छोटी-सी दुकान भी खोल ली है, जहां टंगे हुए सस्ते किस्म के चायपत्ती के पैकेट, बिस्किट, टॉफियां, थोड़े बहुत अनाज के डिब्बे आपको बगैर पूछे बता देंगे कि यहां क्या-क्या सामान उपलब्ध हैं।

भारत में शरणार्थी की जिंदगी इन्हें मंजूर है, पाकिस्तान की नागरिकता नहीं। रोजमर्रा की दुख-तकलीफ और दुश्वारियां फिर भी कम नहीं हैं। मगर इन्हें सुकून है कि वे यहां महफूज हैं। झुग्गियां ही सही, इनके घरों में भी होली- दीवाली जैसे तीज-त्योहार आते तो हैं। हर सुबह अपनी मान्यताओं के मुताबिक मंदिरों में पूजा-प्रार्थना तो कर लेते हैं।

इस बस्ती में रहने वाले ज्यादातर लोगों के नाम पूछने पर किसी ने अपना नाम शंकर बताया तो किसी ने अर्जुन। किसी ने भगवानदास तो किसी ने हरिचंद। इन परिवारों में पहले हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर ही बच्चों के नाम रखे जाने का जैसे रिवाज-सा था। मगर नए जमाने के नाम भी खूब रखे जा रहे हैं। हालांकि इस बस्ती में बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक राम-राम से आपका अभिवादन करेंगे। बस्ती की शुरुआत ही मंदिर से होती है। मंदिर के बाहर बजरंग बली की मूर्ति लगी हुई है। घर भले साफ- सुथरे न भी हों लेकिन मंदिर की नियमित साफ- सफाई दिख जाती है।
मंदिर के बाहर एक तख्त पर शंकर धूप में लेटा हुआ है। युवा शंकर की मां अफसोस के साथ वहीं खड़ी वीरान पड़ी रेहड़ी की तरफ इशारा कर बताती हैं कि ‘कमाने वाला जवान बेटा चार महीने से बिस्तर पर पड़ा है… बुखार का दौरा पड़ा था, तब से पूरी तरह ठीक नहीं हो पाया।’ एक नौजवान चंदर ने बताया कि वो यहां के स्थानीय बाजार में रेहड़ी लगाता है, जहां मोबाइल के कवर और शीट बेचता है। आमदनी रोजाना दो-ढाई सौ रुपये की हो जाती है। स्थायी दुकान खोलने की उसकी बड़ी हसरत है।
बस्ती के प्रधान नेहरूलाल ने बताया कि सबसे पहले यहां आने वाला उनका ही कुनबा था। वे 2013 में कुंभ देखने राजस्थान बॉर्डर से आए थे लेकिन फिर लौटने का कोई भी इरादा कभी नहीं किया। वे कहते हैं कि ‘हमने तो वहां से चलते वक्त ही सोच लिया था कि दोबारा लौटकर यहां नहीं आना। जिंदगी और मौत जो भी मिलेगी, हिंदुस्तान में ही रहेंगे।’
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान कहते हैं कि वे भारत को सिखलाएंगे कि अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए? इस बात पर वे तल्ख हो जाते हैं। गुस्से में भरकर वे इमरान खान को झूठा बताते हैं। थोड़ी देर की खामोशी के बाद गुस्से को जज्ब कर संयत स्वर में कहते हैं, अगर वहां महफूज रहते तो हम जैसे लोग घर-बार छोड़कर यहां क्यों पनाह लेते? कोई ऐसा करता है क्या? वे मानते हैं कि उनके पूर्वजों ने 1947 में बंटवारे के बाद पाकिस्तान में रुककर इतनी बड़ी गलती की थी, जिसका खामियाजा उनके साथ- साथ बाद की पीढि़यां भी भुगत रही हैं। अब तसल्ली है कि उनकी नस्ल ने हिंदुस्तान में पनाह लेकर अपने बड़े- बुजुर्गों की गलती में सुधार ली। वे कहते हैं कि उनका बेटा नहीं पढ़ पाया तो भी उन्हें यकीन है कि उनका पोता जरूर यहां की आबोहवा में पल-बढ़कर कामयाब इंसान बनेगा।
इस शिविर के लोगों को अहसास है कि तालीम से ही तरक्की की राह खुलती है। ऐसा वे ख़ुद बताते हैं कि यहां आकर इसका अहसास हुआ। इसलिए शिविर में एक टाट-पट्टी वाला स्कूल अरसे से चल रहा है, जिसमें चार-पांच साल के बच्चे- बच्चियां सुबह शाम रट्टा लगाते हैं। इन बच्चों के लिए पढ़ाई, खेल की तरह ही मनोरंजक है। बस्ती के एक अन्य बुजुर्ग सोना दास का कहना है कि यहां जैसी भी जिंदगी है, उन्हें मंजूर है। पाकिस्तान लौटने की कभी सोचते भी नहीं। वे कहते हैं कि ‘यहां सरकार सिर्फ हमें अपना नागरिक मान ले, यही बहुत है… बाकी कोई भी सरकार किसी को भी बिठाकर खिला नहीं सकती। हम भी यहां अपनी मेहनत से अपनी जिंदगी चलाएंगे। हम वहां किसानी करते थे यहां भी नागरिकता मिलने पर वे किसी सूबे में किसानी की ख्वाहिश रखते हैं।’ पंजाब-हरियाणा या राजस्थान के आसपास खेतीबारी कर उन्हें जिंदगी संवारने की हसरत है। वे भारतीय सियासतदानों का धन्यवाद भी करते हैं कि उन्हें नागरिक के रूप में भारतीय पहचान दिलाने के मामले में नर्म रुख रखते हैं।

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