रोहिंग्याओं पर रार

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भारत में करीब  40,000 रोहिंग्या गैर कानूनी रूप से रह रहे हैं। इनमें जम्मू कश्मीर में  7,096, हैदराबाद में  3,059, हरियाणा के मेवात में  1,114, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में  1200, दिल्ली में  1,061 और जयपुर में 400 रोहिंग्या बसे हुए हैं।

भारत दुनिया की प्रतिक्रियाओं की चिंता किये बगैर गैरकानूनी तरीके से रह रहे रोहिंग्याओं को बाहर भेजने पर दृढ़ता से अड़ा है। असम के हिरासत शिविर में 32 रोहिंग्या शरणार्थी हैं। इनमें से नाबालिग समेत करीब 15 रोंहिग्या शरणार्थी तेजपुर में हैं। असम से अभी सात रोहिंग्याओं को मणिपुर स्थित मोरेह सीमा चौकी पर म्यांमार के अधिकारियों को सौंप दिया गया है। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि भारत ने म्यांमार से लगातार इस पर बात की एवं उन्होंने माना कि हां, ये म्यांमार के रखाइन प्रांत में रह रहे थे। म्यांमार की सहमति से उनको वापस किया गया है। आगे ऐसे ही पहचान स्थापित कर सहमति से जितना संभव होगा, रोहिंग्याओं को म्यांमार वापस भेजा जाएगा।
ये वर्ष 2012 में पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने के बाद से ही असम के सिलचर स्थित हिरासत केंद्र में रह रहे थे। रोहिंग्याओं की समस्या केवल भारत और म्यांमार का विषय नहीं है। पिछले कई वर्षों से यह दुनिया का एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। इसके दो पक्ष हैं- एक मानवता का तो दूसरी सुरक्षा का। भारत से बांग्लादेश की 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है। इसमें से 1,900 किलोमीटर सीमा बंगाल से लगती है। यहां दो ऐसे बड़े क्रॉसिंग पॉइंट हैं, जहां से घुसपैठ होती है और स्थानीय एजेंट इस काम को अंजाम दिलाते हैं। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी में पंजीकृत 16,000 से अधिक रोहिंग्या लोग भारत में रहते हैं। हालांकि पिछले साल इंटेलिजेंस एजेंसियों द्वारा लगाए गए अनुमान के मुताबिक भारत के अलग-अलग हिस्सों में करीब 40,000 रोहिंग्या गैर कानूननी रूप से रह रहे हैं। इनमें जम्मू कश्मीर में 7,096, हैदराबाद में 3,059, हरियाणा के मेवात में 1,114, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 1200, दिल्ली में 1,061 और जयपुर में 400 रोहिंग्या बसे हुए हैं। इनके अनुसार पश्चिम बंगाल और असम में मौजूद दलालों का एक नेटवर्क रोहिंग्याओं के लिए देश में दाखिल होते ही नकली दस्तावेज बनाने का काम कर रहा है।
भारत द्वारा सात रोहिंग्याओं की वापसी के कदम पर संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय ने चिंता जताई और कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून इस तरह के डिपोर्टेशन से रोकते हैं। इनकी वापसी के फैसले के समय संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव एंतोनियो गुतारेस भारत में ही थे। उनका रुख पहले से स्पष्ट है- रखाइन राज्य के रोहिंग्या मुसलमानों को या तो नागरिकता दी जाए या कानूनी स्तर प्रदान किया जाए।
म्यांमार भारत के प्रमुख रणनीतिक पड़ोसी देशों में शामिल है और यह उग्रवाद प्रभावित नगालैंड और मणिपुर सहित कई पूर्वाेत्तर राज्यों के साथ 1,640 किमी लंबी सीमा साझा करता है। आज हमारे लिए पूर्वोत्तर उग्रवादियों के विरुद्ध कार्रवाई ज्यादा आसान है। म्यांमार का पूरा सहयोग मिलता है। भारत ने बिना म्यांमार की सहमति से तो रोहिंग्याओं को वापस कर नहीं रहा है।
बेशक, इस समस्या का मानवीय पहलू है। कुछ मुस्लिम देशों ने जिस तरह का रवैया अपनाया है उससे चिंता और बढ़ती है। अनेक मुस्लिम देश केवल इस्लाम के नाम पर रोहिंग्याओं के पक्ष में खड़े हैं। म्यांमार पर चारों ओर से दबाव बनाया जा रहा है। इन देशों के नेताओं ने या तो आन सांग सू की से बातचीत की या वहां की यात्रा किया। बातचीत एक प्रकार से धमकी भरी थी। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन इसका अगुवा बने हुए हैं। पिछले वर्ष संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के समानांतर इस्लामिक देशों ने अलग से रोहिंग्याओं पर बैठक की। एर्दोगन ही इसके अगुवा थे। उसमें म्यांमार सरकार की तीखी आलोचना की गई और एक समूह का गठन भी किया गया। एर्दोगन की पत्नी ने बांग्लादेश में रोहिंग्या शिविरों का दौरा किया। एर्दोगन ने काफी राहत सामग्रिया भेजी हैं। एक बार तो उन्होंंने सैन्य कार्रवाई तक की धमकी दे दी। सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता तुषार मेहता ने कहा कि म्यांमार इन रोहिंग्याओं को वापस लेने के लिए भी तैयार है। ऐसे में कोई वजह नहीं है कि इन रोहिंग्याओं को उनके देश जाने से रोका जाए।

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