रूसी दोस्ती के जरिए कुछ संदेश भी

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पुतिन ने भारत आकर 19वें वार्षिक सम्मेलन में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी तो न केवल कुछ मिथक टूटे बल्कि भारत की तरफ से अमेरिका सहित समस्त दुनिया को एक सशक्त संदेश भी गया।

पिछले दिनों रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की यात्रा के दौरान सम्पन्न हुए ज्वाइंट डायलॉग के साथ ही भारत और रूस के बीच लगभग 20 संधियों पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें ऊर्जा, अंतरिक्ष और न्यूक्लियर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेन्स सिस्टम पर हुयी डील रही। यह डील महत्वपूर्ण इसलिए रही क्योंकि भारत काफी समय पहले से इस दिशा में प्रयास कर रहा था। लेकिन एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेन्स सिस्टम को लेकर अब तक दो बातों को लेकर काफी चर्चा थी और डील अंतिम स्तर तक नहीं पहुंच पा रही थी।

दरअसल एस-400 लम्बी दूरी का सतह से हवा में मार करने वाली रक्षा प्रणाली है जिसे नाटो एसए-21 ग्रॉलर के नाम से रिपोर्ट करता है। यह सिस्टम हवा में सभी प्रकार के टारगेट्स, जिसमें एयरक्राμट, यूएवी (अननेम्ड एरियल वेहिकल) तथा बैलिस्टिक एवं क्रूज मिसाइलें भी शामिल हैं, को 400 किलोमीटर की रेंज और 30 किलोमीटर की ऊंचाई तक निशाना बना सकता है। यह एक इंटीग्रेटेड डिफेंस सिस्टम है जिसमें मल्टीफंक्शन राडार, आॅटोनॉमस डिटेक्शन और टारगेटिंग सिस्टम, एंटी-एयरक्राμट मिसाइल सिस्टम, लांचर्स और कमाण्ड व कंट्रोल सेंटर मौजूद है। इसमें मल्टीलेयर क्षमता का निर्माण करने के लिए तीन प्रकार की मिसाइलों को दागने की क्षमता है। सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह सिस्टम एक साथ 36 टारगेट्स को निशाने पर ले सकता है। जाहिर सी बात है कि एस-400 के भारत की रक्षा पंक्ति में शामिल हो जाने से भारत की रक्षा क्षमता में आमूल परिवर्तन आएगा जो चीन तथा पाकिस्तान की संयुक्त गतिविधियों को देखते हुए बेहद आवश्यक था।

अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत रूस से एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम को खरीदे। हमारे रक्षा मंत्रालय की तरफ से दिसम्बर 2015 में ही इसे खरीदने सम्बंधी प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी गयी थी। लेकिन अमेरिका का काउंटरिंग अमेरिकाज एडवरसरीज थ्रू सैंक्शंस ऐक्ट (काटसा) भारत-रूस के बीच होने वाले इस सौदे के बीच बाधा बना हुआ था। उल्लेखनीय है कि अमेरिकी संसद ने यह कानून रूस, ईरान और उत्तर कोरिया को ध्यान में रखकर बनाया है लेकिन भारत भी इसकी परिधि में आ गया। इस एक्ट के तहत अमेरिका ने उन देशों पर प्रतिबंध लगाने की बात कही है जो रूस के रक्षा और खुफिया संस्थानों के साथ लेनदेन में शामिल हैं। जबकि भारत अपनी सेनाओं हेतु साजो-सामान, कलपुर्जे, रखरखाव और मरम्मत के लिए सबसे ज्यादा रूसी खरीद पर ही निर्भर है।

यानि भारत यदि ‘काटसा एक्ट’ को मानेग तो रूस से रक्षा खरीद बंद हो जाएगी और यदि रक्षा खरीद बंद हुयी तो एक तरह से भारतीय सेना तो थम जाएगी। यही वजह है कि भारत ने पिछले कुछ समय से एक साथ दो डिप्लोमैटिक रूट्स पर काम किया। प्रथम- अमेरिका को समझाने की कोशिश और द्वितीय- रूस के साथ अपने रक्षा सम्बंधों में पुन: ऊर्जा भरने के यत्न के साथ-साथ भारतीय रक्षा पंक्ति पर आगे बढ़ने का दृढ़ परिचय। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने साझा बयान देकर स्पष्ट किया कि- ‘तेजी के साथ बदल रही दुनिया में हमारा संबंध तेजी के साथ प्रगाढ़ हो रहा है। समय के साथ दोनों देशों के बीच संबंध और मजबूत हुआ है।’ लेकिन इस घोषणा के साथ भारत ने कूटनीतिक सूझबूझ का परिचय भी दिया अर्थात नई दिल्ली की तरफ से इस डील की बड़े भारी-भरकम शब्दों के साथ घोषणा नहीं की गयी। एक शीर्ष भारतीय अधिकारी की तरफ से बस इतना कहा गया कि, ‘अब अनुबंध पर हस्ताक्षर हो चुका है, ऐसे में मैं समय सीमा (भुगतान तंत्र) के जल्द होने का अनुमान करता हूं।’

दरअसल भारत को यह उम्मीद थी कि अमेरिकी प्रशासन भारत को एस-400 ट्रायंफ एयर डिफेंस सिस्टम खरीदन पर ऐतराज नहीं करेगा। इसका कारण यह है कि चीन की बढ़ती हुयी सैन्य ताकत केवल भारत के लिए सिरदर्द नहीं बनी हुयी है बल्कि अमेरिका को भी बेचैन कर रही है।

 

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