रिजर्व बैंक से सुलह के संकेत

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रिजर्व बैंक ने केन्द्र सरकार से सुलह का संकेत दिया है। उसने छोटे और मंझोले कारोबारियों को धन उपलब्ध कराने के लिए रास्ता खोलने की उम्मीद जगाई है। दरअसल सरकार से उसके टकराव के पीछे यही मुख्य बिन्दु था। सरकार चाहती थी कि रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया अपने ‘सरप्लस धन’ का एक हिस्सा निकाले जिससे बाजार में तरलता आए और उन्हें राहत मिले। इस बात पर तनातनी इतनी बढ़ गई थी कि एक बार तो ऐसा लगा कि बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल जिन्हें इस पद पर इसी सरकार ने बिठाया था और कांग्रेस के तीर झेले थे, इस्तीफा दे देंगे।

लेकिन प्रधानमंत्री के साथ बैठक और अपने सहयोगियों के साथ कश्मकश के बाद उन्होंने रवैया बदला और टकराव की नीति छोड़ हाथ मिलाने का फैसला कर लिया। यहां पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती से खड़ी है और सबसे बड़ी बात है कि उसके आधारभूत तत्व भी मजबूत हैं। यह अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर नहीं है कि दो-तीन लाख करोड़ रुपये और अर्थव्यवस्था में आने से यहां परेशानी हो जाएगी। 19 नवंबर वाली रिजर्व बैंक की बोर्ड मीटिंग में इसी मसले की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने का फैसला किया गया था।

रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया देश के तमाम आर्थिक विषयों पर नजर तो रख सकता है लेकिन उसे सरकार की सलाह अपनी स्वायत्तता को बचाए रखते हुए मानना चाहिए। सरकार देश चलाती है और उसकी सोच समय के मुताबिक बदलती रहती है। यह समय छोटे और मंझोले उद्योगों के लिए कठिन है। ऐसे में रिजर्व बैंक की भूमिका क्या हो, इस पर उसे विचार करना ही चाहिए।

जून के अंत मे रिजर्व बैंक के पास 9.59 लाख करोड़ रुपये का रिजर्व था। यह रकम इसकी 36.18 लाख करोड़ रुपये की इसकी बैलेंस शीट की लगभग एक चौथाई है। इसमें से करेंसी और गोल्ड रीवैल्यूएशन रिजर्व 6.19 लाख करोड़ रुपये, आपात फंड 2.32 लाख करोड़ रुपये, ऐसेट डेवेलपमेंट फंड 22,811 करोड़ रुपये और इन्वेस्टमेंट रीवैल्यूएशन अकाउंट 13,285 करोड़ रुपये का था। मालेगाम समिति ने आपात रिजर्व ज्यादा रखने का सुझाव दिया था। यह रिजर्व कई तरह से लगाया जाता है जैसे रुपये के गिरने पर उसे थामने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन यह मुद्दा काफी गरम होता रहा है कि आखिर रिजर्व बैंक को इतनी बड़ी राशि रखने की जरूरत क्या है? अगर वह इसका एक निश्चित प्रतिशत निकाल दे तो इसमें नुकसान क्या है? आखिर यह पैसा भी देश के काम आएगा।

इस बारे में अर्थशास्त्रियों और पूर्व गवर्नरों की राय अलग-अलग है। कुछ मानते हैं कि इसमें कोई हर्ज नहीं है तो कुछ विपरीत राय रखते हैं। सच तो यह है कि यह एक निहायत ही पेचीदा मुद्दा है और इसलिए अब एक उच्च स्तरीय कमेटी बना दी गई है जो इस पर अपनी विशेषज्ञ रिपोर्ट देगी। जानकारों का यह भी मानना है कि सरकार ने जानबूझकर इस मामले को तूल नहीं दिया और सेक्शन 7 लागू करने जैसी धमकी से अपने को अलग कर लिया। इसके पीछे तर्क यह था कि न केवल पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं बल्कि अगले साल लोकसभा के भी चुनाव हैं और अगर दबाव के कारण गवर्नर उर्जित पटेल और उनके दो नजदीकी सहयोगियों ने इस्तीफा दे दिया तो विपक्ष को बड़ा मुद्दा मिल जाएगा। इन बातों को ध्यान में रखकर सरकार ने भी अपना रुख हल्का कर लिया। उसने इस मामले से दूरी बना ली। बैठक में, और उसके पहले भी सरकार की ओर से मनोनीत निदेशकों ने भी अपनी ओर से सुलह के काफी प्रयास किए। गुरूमूर्ति जैसे अनुभवी विशेषज्ञों और टाटा के एन चन्द्रशेखर ने भी उन्हें व्यावहारिक ढंग से सोचने की सलाह दी।

उन्हें भी बताया गया कि सरप्लस धन के बारे में कोई नीति बनाना ही ठीक होगा क्योंकि यह राशि बढ़ती ही जा रही है। इसके अलावा यह भी है कि रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया देश के तमाम आर्थिक विषयों पर नजर तो रख सकता है लेकिन उसे सरकार की सलाह अपनी स्वायत्तता को बचाए रखते हुए मानना चाहिए। सरकार देश चलाती है और उसकी सोच समय के मुताबिक बदलती रहती है। कठोर और गैरलचीली नीतियों से देश का भला नहीं हो सकता। यह समय छोटे और मंझोले उद्योगों के लिए कठिन है। ऐसे में रिजर्व बैंक की भूमिका क्या हो, इस पर उसे विचार करना ही चाहिए। यह सब विचार करके ही रिजर्व बैंक ने सही कदम उठाया है। यह देश के हित में है।

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