राजे को ले डूबा ‘राजहठ’

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राजस्थान में कभी किसी चीज का इतना इंतजार नहीं किया गया होगा जितना विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत का। यहां तक कि तुक्के लगाने वाले चुनावी सर्वेक्षण भी भाजपा के एतबार को डिगा नहीं पा रहे थे। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों को पहले ही मालूम था कि क्या होने वाला है? वही हुआ। यानी राजस्थान में 99 सीटों के साथ कांग्रेस की फिर वापसी हो गई और बहुप्रतीक्षित भाजपा का रथ 73 सीटों पर ही थम गया।

जबकि 27 सीटें निर्दलीयों के खाते में चली गई। 200 विधानसभा सीटों वाले राजस्थान में एक प्रत्याशी के आकस्मिक निधन के कारण 199 सीटों पर ही चुनाव लड़ा गया। राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बात का पहले ही अहसास करा दिया था कि,‘अगर भाजपा 39 फीसदी वोट प्रतिशत से नीचे गई तो वह सत्ता से बेदखल हो जाएगी। 11 दिसम्बर को आए चुनावी नतीजों ने इस बात को साबित भी कर दिया। भाजपा ने 6.37 फीसदी वोट गंवाया और 73 सीटों पर सिमट गई। वहीं कांग्रेस सिर्फ आधा फीसद ज्यादा वोट पाकर सत्ता पर काबिज हो गई।

भाजपा पहली बार 2003 में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई अ‍ैर उसका वोट प्रतिशत 39 फीसदी रहा। सन 2013 में दोबारा जीती तो भाजपा का वोट प्रतिशत 45 फीसदी रहा । विश्लेषकों का कहना है कि,‘चुनावी ट्रेंड को देखा जाए तो वसुंधरा राजे की कमान में भाजपा का प्रदर्शन बुरा नहीं रहा। लेकिन कुछ और मेहनत की जाती तो कांग्रेस को मुश्किल में डाल सकती थी। लेकिन चुनावों से पहले कुछ फैसले भले ही दूरंदेशी के लिहाज से किए गए।

लेकिन यह फैसले ही भाजपा को छका गए। राज्यसभा सदस्य किरोड़ीमल मीणा का तुरूप का पत्ता भाजपा के लिए इस चुनाव में फायदेमंद साबित नहीं हुआ। उनकी पत्नी भतीजा और उनके नजदीकी तो चुनावों में हारे ही, उन पांच जिलों में भी भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा जहां मीणा का असर माना जाता था। ढूंढाड़-मारवाड़ में भाजपा की 91 सीटें थी, इनमें भाजपा 60 सीटों पर हार गई। ढूंढाड़ में सचिन पायलट तो मारवाड़ में गहलोत का असर रहा।

मत्स्य क्षेत्र में योगी ने हनुमान जी को दलित बता दिया तो राजपूत विरोध में आ गए। वर्ष 2013 में भाजपा एससी/एसटी के लिए तय 58 सीटों में से 49 सीटें जीती थी। इनमें इस बार कांग्रेस 31 सीटें जीत गई । ग्रामीण इलाकों में भाजपा के पास 153 में से 123 सीटें थी, लेकिन किसान आंदोलन से नाराज ग्रामीणों का कोप बरसा तो इस बार कांग्रेस 63 सीटों पर आगे हो गईं। वसुंधरा राजे और आरएसएस के बीच खटास को कम करने के लिए भले ही पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने काफी कुछ किया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। यह संघ का ही जहूरा था कि उसके कार्यकर्ताओं की मेहनत से चुनाव में उतरे संघ ने ऐसी कांटे की सीटों पर काम करना शुरू किया, जिनकी हार का आंकलन पांच से दस हजार रहा था। जयपुर शहर की ऐसी करीब पांच सीटों पर संघ ने काम किया।

आखिरकार तीन सीटों पर भाजपा जीत गई जो उसके लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बनी हुई थी। संघ ने नागौर शहर की सीट मांगी थी जो उसे भारी विवाद और आलाकमान के दखल के बाद ही मिली। नतीजतन संघ ने पूरी ताकत लगाकर अपने प्रत्याशी को जिता लिया। इन चुनावों मे ंभले ही कांग्रेस के वोट से कोई खास अंतर नहीं आया। लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की इन शब्दों में की गई होसला अफजाही कि ‘सत्ता विरोधी लहर’ को घोट कर पी जाना चाहिए, किसी काम नहीं आई। नतीजतन वही हुआ, यानी वसुंधरा सरकार के प्रति नाराजगी का खामियाजा भाजपा को सत्ता से बाहर जाकर चुकाना पड़ा। विश्लेषक इसे बेहद दिलचस्प बात बताते हैं कि सत्ता विरोधी वोट कांग्रेस को नहीं मिला बल्कि वह अन्य दलों में बंट गया ।

यही वजह रही कि मतदाताओं ने बसपा को चार फीसदी वोट दे दिए । महज एक महीने पहले गठित हुई राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ढाई फीसदी वोट ले गई। जिन मतदाताओं को कांग्रेस पसंद नहीं थी, वे बसपा,राजपा,माकपा जैसे दलों या निर्दलीय उम्मीदवारों के पक्ष में चले गए। ऐसे में भाजपा का वोट शेयर 2013 के मुकाबले 6.70 फीसदी गिर गया, जबकि कांग्रेस का वोट शेयर 2013 के मुकाबले 6.23 प्रतिशत ही बढ़ सका। 

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