भगवा आतंक कांग्रेसी षड्यंत्र

गृह मंत्रालय के आतंरिक सुरक्षा विभाग से बतौर अवर सचिव सेवानिवृत्त आरवीएस मनी की किताब 
‘द मिथ ऑफ़ हिन्दू टेरर’ भगवा आतंक पर कांग्रेसी षड्यंत्र की पोल खोलती है। मनी लिखते हैं कि 
अधिकारियों पर भगवा आतंकवाद को गढ़ने के लिए दबाव बनाया गया। हर आतंकी घटना को हिन्दू 
संगठन से जोड़ने का सिलसिला चल पड़ा। जांच एजेंसियों को इनकी की जांच के लिए खड़ा किया गया। 
इन एजेंसियों ने राजनीतिक आकाओं के हिसाब से तथ्यों को तोड़ा- मरोड़ा। मौका-ए- वारदात पर जो सबूत
मिले, उन्हें मिटाया गया।

गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने मुझे तलब किया। जरूर मामला कुछ खास रहा होगा। नहीं तो गृह मंत्रालय के आतंरिक सुरक्षा विभाग में तैनात अंडर सेक्रेटरी (अवर सचिव) को तत्काल बुलाने की बात समझ में नहीं आती। हम से ऊपर बहुत अधिकारी थे। उन्हें बुलाकर गृहमंत्री बात कर सकते थे। पर उन सब को छोड़कर मुझे बुलाया गया। मैं मान कर चल रहा था कि आज का दिन बेहद फुर्सत वाला है। इसलिए मैं नार्थ ब्लाक में कॉफी का मजा लेने निकला था। यह बात 1 जून 2006 की है। मैंने अभी कॉफी पीना शुरू नहीं किया था कि एक संदेश वाहक मुझे खोजते हुए आ धमका। उसने मुझे बताया कि गृहमंत्री ने आपको बुलाया है। मेरे लिए यह चौंकाने वाली बात थी क्योंकि यह असंभव सी लग रही थी। ऐसा कभी-कभी होता है जब अंडर सेक्रेटरी को मंत्री बुलाए जाए।

इसलिए पहले मैंने संदेशवाहक से सुनिश्चित किया। मुझे लगा, शायद उसे कोई गलतफहमी हो गई हो। पर मैं गलत था। गृहमंत्री ने मुझे ही हाजिर होने के लिए कहा था। मैं वहां पहुंचा। मैंने देखा कि गृहमंत्री के अलावा दो लोग और भी मौजूद थे। एक थे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके दिग्विजय सिंह और दूसरे सज्जन को मैं बाद में पहचान पाया। वे थे हेमंत करकरे। ये लोग मुझसे पिछले दिनों हुए बम धमाकों और उसमें शामिल लोगों के बारे में जानना चाहते थे। यही मुझे बताया भी गया था। तो मैं वाराणसी, दिल्ली और अन्य जगह पर हुए धमाकों के बारे में बताने लगा। इस बात की भी जानकारी दी कि इन धमाकों में पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों का हाथ है। लेकिन मेरे इस जवाब से दिग्विजय सिंह संतुष्ट नहीं हुए। ऐसा मुझे लगा। मैं गलत भी नहीं था। वे बार-बार यही जानना चाह रहे थे कि क्या सभी बम धमाके के आरोपी एक ही समुदाय से जुड़े हैं। मैंने कहा, जो जानकारी मेरे पास थी आपको दे दी। लेकिन उनकी बातों से लग रहा था कि वे किसी और चीज की तलाश में थे। मुझसे उन्हें वह नहीं मिला था।

लिहाजा दिग्विजय सिंह ने मुझसे सीधा सवाल पूछा। वे बोले नांदेड़ वाले धमाके में किस का हाथ है? सवाल ने मुझे चौंका दिया। कारण, नांदेड़ में कोई धमाका हुआ और उसकी सूचना गृह मंत्रालय के पास नहीं थी। मैंने उनसे कहा, वहां कोई धमाका हुआ नहीं है। दिग्विजय सिंह कहने लगे, नहीं-नहीं वहां विस्फोट हुआ है। उसमें बजरंग दल का हाथ है।… गृह मंत्रालय के आतंरिक सुरक्षा विभाग से बतौर अंडर सेक्रेटरी सेवानिवृत्त आरवीएस मनी ने अपनी किताब ‘द मिथ आॅफ हिन्दू टेरर’ में यही लिखा है। उनकी किताब कांग्रेसी षड्यंत्र की पोल खोलती है। वे लिखते हैं कि अधिकारियों पर भगवा आतंकवाद को गढ़ने के लिए दबाव बनाया गया। हर आतंकी घटना को हिन्दू संगठन से जोड़ने का सिलसिला चल पड़ा। जांच एजेंसियों को इनकी की जांच के लिए खड़ा किया गया।

इन एजेंसियों ने राजनीतिक आकाओं के हिसाब से तथ्यों को तोड़ा- मरोड़ा। मौका-ए-वारदात पर जो सबूत मिले, उन्हें मिटाया गया। लश्कर और सिमी जैसे संगठनों से जुड़े आतंकवादियों के नाम को हटा दिया गया। नए सबूत सोनिया गांधी के ‘दरबारी’ पी.चिदंबरम और दिग्विजय सिंह के इशारे पर गढ़े गए। फिर हिन्दू संगठन से जुड़े लोगों का नाम वारदात में जोड़ा गया। वह वारदात कौन थी? मालेगांव। पर धीरे-धीरे इसमें समझौता एक्सप्रेस विस्फोट, मक्का मस्जिद और अजमेर शरीफ दरगाह विस्फोट भी जुड़ गये। कांग्रेस सरकार का इरादा तो इसमें 26/11 को भी जोड़ने का था। पर इस मामले में वह मात खा गई। अजमल कसाब को सुरक्षा बलों ने दबोच लिया। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो 26/11 का ठीकरा भी हिन्दू संगठनों पर फोड़ा जाता। लेकिन उनके मंसूबे पर अजमल कसाब की गिरμतारी ने पानी फेर दिया। बावजूद इसके कांग्रेस यह माहौल बना रही थी कि हिन्दू आतंकवादी हंै और उसके तार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं। संघ उन्हें सहायता मुहैया कराता है। कांग्रेस यही साबित करना चाहती थी।

इसीलिए तो दिग्विजय सिंह अंडर सेक्रेटरी की बात सुनने के लिए तैयार नहीं थे। वे बताते रहे कि गृह मंत्रालय के आतंरिक सुरक्षा विभाग के पास ऐसी कोई सूचना नहीं है। चूंकि विभाग के पास आने वाली सभी चेतावनी और सूचना को वे खुद देखते हैं, इसलिए दिग्विजय को आश्वस्त किया कि नांदेड़ में विस्फोट नहीं हुआ है। लेकिन दिग्विजय सिंह यह मानने के लिए तैयार नहीं थे। उनके दिमाग में कुछ और चल रहा था। उनका इरादा ‘भगवा आतंकवाद’ को गढ़ने का था। इसलिए उन्होंने अंडर सेक्रेटरी की सूचना को खारिज कर दिया। सीबीआई को नांदेड़ के कथित धमाके की जांच करने का आदेश दिया गया। एजेंसी ने समीर कुलकर्णी को हिरासत में लिया। जांच में पता चला कि समीर बजरंग दल के दμतर आया-जाया करता था। पास में ही उसकी एक दुकान थी। वह ज्यादा चलती नहीं थी। इस वजह से उसने जो पूंजी लगाई, वह डूबने के कगार पर थी। इसलिए उसने दुकान में आग लगवा दी। उसने सोचा था कि दुकान जल जाने पर उसे बीमा कंपनी से पैसा मिल जाएगा और जो घाटा हुआ है, उसकी भरपाई हो जाएगी।

आरवीएस मनी लिखते हैं कि आतंकी वारदातों से लश्कर और सिमी जैसे संगठनों से जुड़े आंतकवादियों के नामों को हटा दिया गया। नए सबूत सोनिया गांधी के ‘दरबारी’ पी.चिदंबरम और दिग्विजय सिंह के इशारे पर गढ़े गए। फिर हिन्दू संगठनों से जुड़े लोगों का नाम वारदात में जोड़ा गया। वह वारदात कौन थी? मालेगांव। पर धीरे-धीरे इसमें समझौता एक्सप्रेस विस्फोट, मक्का मस्जिद और अजमेर शरीफ दरगाह विस्फोट भी जुड़ते गये। आरोपित साध्वी प्रज्ञा, असीमानंद और कर्नल पुरोहित सरीखे लोग हो गए। उन्हें नजरबंद कर दिया गया। प्रताडि़त किया जाने लगा। उन पर दबाव बनाया गया कि वे बम धमाकों की जिम्मेदारी कबूल करें। मगर वे लोग सरकार का झूठ मानने के लिए तैयार नहीं थे। जो कांग्रेस सरकार के मुंह पर तमाचा था। यह ‘सरकार बहादुर’ को बर्दाशत नहीं हो रहा था। वह तो भगवा आंतक को सच साबित करने पर आमादा थी।

यही नांदेड़ में हुए तथाकथित धमाके का सच था। कहने का मतलब यह है कि सीबीआई ने भी पाया कि नांदेड़ में कोई बम धमाका नहीं हुआ था। पर उसको रिपोर्ट कांग्रेसी सरकार मानने के लिए तैयार नहीं थी। एजेंसी पर दबाव बनाया गया कि नांदेड़ मामले में वह अपनी रिपोर्ट बदले। सवाल यह है कि बदल कर कैसी रिपोर्ट तैयार की जाए? तो इसका सीधा जवाब है कि जैसा सरकार चाहती है। सरकार की मंशा यह थी कि रिपोर्ट में लिखा जाए कि नांदेड़ में बजरंग दल के कार्यकर्ता बम बना रहे थे। वह अचानक फट गया और आग लग गई। एजेंसी अपनी रिपोर्ट में यह लिखने के लिए तैयार नहीं थी। इससे आलाकमान खासा नाराज भी हुए। कारण, वे नांदेड़ के सहारे भगवा आतंक का हौव्वा नहीं खड़ा कर पाए। सच सबके सामने आ गया कि नांदेड़ में कोई बम धमाका ही नहीं हुआ था। इस तरह कांग्रेस की पहली चाल तो विफल हो गई। लेकिन कांग्रेस सरकार चुप नहीं बैठी। उसने तो तय कर लिया था कि भगवा को आतंक का पर्याय बनाना है और हिन्दूओं को आतंकवादी का तगमा देना है। इसलिए सरकार योजना के तहत काम करने लगी।

कुछ अधिकारियों को तैयार किया गया। जहां कांग्रेस या उनके सहयोगियों की सरकार थी, उनको विश्वास में लिया गया। आरवीएस मनी लिखते हैं कि उसके बाद आतंकी घटनाओं की चेतावनी को जानबूझ कर या तो छुपाया जाने लगा या फिर सूचना पर संबंधित राज्य सरकार ने कार्रवाई करना बंद कर दिया। मसलन, 2006 में नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पर होने वाले आतंकी हमले की सूचना महाराष्ट्र सरकार को दी गई थी। पर उस सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। इसी तरह संकटमोचन मंदिर होने वाले आतंकी हमले की सूचना उत्तर प्रदेश सरकार के पास थी। पर उसने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया। हद तो तब हो गई, जब गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने 26/11 को होने वाले आतंकी हमले को लेकर जो खुफिया सूचना मिली थी, उसे छुपाया। मगर जो सबसे ज्यादा सनसनीखेज जो बात है, वह यह कि तत्कालीन सरकार के आला मंत्री भी इस षड्यंत्र में शामिल थे। किताब में लेखक ने उन लोगों के नाम का जिक्र नहीं किया है। लेकिन इतना जरूर लिखा है कि सरकार के तीन मंत्री और सचिव स्तर का एक अधिकारी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के ‘पे रोल’ पर थे। उन्हीं लोगों की मदद से आतंकवादियों ने 26/11 को अंजाम दिया। कांग्रेस सरकार की योजना यह थी कि 26/11 की घटना को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सिर पर मढ़ दिया जाएगा।

इस की बाकायदे तैयारी हो चुकी थी। ’26/11: आएएसएस की साजिश’ के नाम से किताब आने वाले थी। पर अजमल कसाब की गिरμतारी ने कांग्रेस सरकार की यह योजना दोबारा ध्वस्त हो गई। फिर कांग्रेस ने अगली चाल चली। पी.चिदंबरम को 26/11 के बाद गृहमंत्री बनाया गया। कुर्सी संभालते ही चिदंबरम ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए का गठन किया। यह आतंकी घटनाओं के जांच के लिए बनी थी। पर चिदंबरम उसमें कांग्रेस का ऐजेंडा चलाने लगे। वह ऐजेंडा था भगवा आतंक गढ़ने का। इसलिए उन्होंने एजेंसी में अपने चेहतों को बैठाया। उनको आतंकी घटनाओं की जांच का जिम्मा सौंपा गया। वह मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद विस्फोट समेत सभी घटनाओं की जांच करने लगी। यही से खेल शुरू हुआ। इन सभी आतंकी घटनाओं को पाक समर्थित आतंकी संगठनों ने अंजाम दिया था।

यह बात विभिन्न जांच एजेंसियों की जांच-पड़ताल में सामने आ चुकी थी। पर जब इन मामलों की जांच एनआईए करने लगी तो पूरा मामला ही उलट गया। एजेंसी ने पहले हुई जांच को सिरे खारिज कर दिया। उसने यह मानने से इनकार कर दिया कि तमाम बम धमाकों में सिमी या अल- हदीस का हाथ है। वह नई कहानी गढ़ने लगा। मसलन मालेगांव में जो बम धमाका हुआ था, उसमें अल हदीस नामक आतंकी संगठन का हाथ नहीं था। इसी तरह समझौता एक्सप्रेस धमाके को लश्कर और सिमी ने अंजाम नहीं दिया था। एनआईए ने नांदेड़ की कहानी को भी उलट दिया और वह कांग्रेसी लाइन पर काम करने लगी। उसने माना कि नांदेड़ में बम धमाका हुआ था। यह भगवा आतंक की कहानी का एक हिस्सा था।

दूसरे में इन आतंकी घटनाओं के लिए जिम्मेदार कौन है? यह तय करना था। जाहिर है इसके लिए, ऐसे संगठन और व्यक्ति का चुनाव करना था, जिससे हिन्दू आतंकवाद की कहानी सही साबित हो जाए। इसलिए एनआईए ने धमाके को अंजाम देने वाले संगठन और आरोपी बदल दिए। संगठन के रूप में बजरंग दल, अभिनव भारत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम चलने लगा। आरोपी साध्वी प्रज्ञा,असीमानंद और कर्नल पुरोहित सरीखे लोग हो गए। उन्हें नजरबंद कर दिया गया। प्रताडि़त किया जाने लगा। उन पर दबाव बनाया गया कि वे बम धमाकों की जिम्मेदारी कबूल करें। मगर वे लोग सरकार का झूठ मानने के लिए तैयार नहीं थे। जो कांग्रेस सरकार के मुंह पर तमाचा था।

यह ‘सरकार बहादुर’ को बर्दाशत नहीं हो रहा था। वह तो भगवा आतंक को सच साबित करने पर आमादा थी। पर उसने जिन लोगों को आरोपी बनाया था, वे सरकारी षड्यंत्र का हिस्सा बनने के लिए तैयार नहीं थे। कांग्रेस की यह नाकामी थी कि आरोपी उसके साथ नहीं खड़े थे। अब सरकार के पास एक ही तरीका बचा था, वह यह कि आरोपियों के खिलाफ पुख्ता सबूत गढ़े जाएं। उसकी कवायद भी शुरू हुई। पर वह भी काम नहीं आया। जैसे-जैसे समय बीता, वैसे-वैसे कांग्रेसी षड्यंत्र का पर्दाफाश होने लगा। मक्का मस्जिद बम धमाके के मामले में जिस असीमानंद को कांग्रेस सरकार ने आरोपी बनाया था, उन्हें अदालत ने बरी कर दिया। कारण, उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। मिलता भी कैसे ? भगवा आतंक तो झूठ की बुनियाद पर खड़ा था। सच सामने आते ही बुनियाद ताश के पत्ते की ढेर हो गई और कांग्रेस बेनकाब हो गई।

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