बच्चे क्यों कर रहे हैं आत्महत्या?

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वैसे देश में हर एक घंटे एक छात्र आत्महत्या कर रहा है फिर भी नवोदय विद्यालयों से आत्महत्या की खबरों का आना हम सबके लिए खास चिंता का विषय होना चाहिए। इसलिए कि स्थापना के साथ ही इनमें ऐसी व्यवस्था भी स्थापित की गई थी कि यहां आने वाले बच्चों को पढ़ाई का अच्छा माहौल मिले। वे बिना किसी चिंता के अपने जीवन-लक्ष्य को हासिल कर सकें।

ब नवोदय विद्यालयों से भी छात्रों की आत्महत्या की खबरें। पिछले पांच साल में इन स्कूलों में 49 बच्चों ने आत्महत्या की। इनमें से अनुसूचित जाति व जनजाति के 25 बच्चों ने खुदकुशी की थी। बाकी 24 बच्चों में अन्य पिछड़ी जाति व सवर्ण दोनों थे।
छात्रों की आत्महत्याआें का यह आंकड़ा सूचना के अधिकार के तहत सरकार की ओर से अंग्रेजी के एक दैनिक अखबार को दिया गया। आत्महत्या करने वाले 49 छात्रों में सबसे ज्यादा 15 छात्र 12 वीं कक्षा के थे। 11 छात्र ग्यारहवीं, आठ दसवीं और नौ नवीं कक्षा, पांच आठवीं और एक, छठी कक्षा से था। यानी 43 बच्चे नवीं से बारहवीं कक्षा की उच्च पढ़ाई करने वालों में से थे।

से तो भारत में हमारी शिक्षा, सरकार व समाज का हाल यह हो गया है कि हर एक घंटे एक छात्र आत्म हत्या कर रहा है फिर भी नवोदय विद्यालयों से आत्महत्या की खबरों का आना हम सबके लिए खास चिंता का विषय होना चाहिए। इसलिए कि इन विद्यालयों की स्थापना के साथ ही इनमें ऐसी व्यवस्था भी स्थापित की गई थी कि यहां आने वाले बच्चों को पढ़ाई का अच्छा माहौल मिले और वे बिना किसी चिंता-फिक्र के अपने जीवन-लक्ष्य को हासिल कर सकें। प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने जब 1985-86 में शिक्षा मंत्रालय समेत कुछ अन्य मंत्रालयों को मिलाकर मानव संसाधन मंत्रालय का गठन किया था, तभी उन्होंने देशभर में बतौर प्रयोग आवासीय नवोदय विद्यालयों की भी स्थापना करवाई। इसके पीछे मूल लक्ष्य गांवों के प्रतिभाशाली छात्रों को शिक्षा के बेहतर अवसर दिला उन्हें आगे बढ़ाना था। बच्चे विद्यालय परिसर में ही रहते हुए पूरा मन लगाकर पढ़ाई कर सकें, इसलिए विद्यालय परिसर में ही उनके रहने व खाने की नि:शुल्क व्यवस्था की गई। आज भी इनमें 75 फीसद सीटें ग्रामीण छात्रों के लिए ही होती हैं। इनकी स्थापना गांवों में ही की जाती है। इनमें पढ़ाई भी छठीं कक्षा से शुरू होती है। ये विद्यालय एक प्रयोग के तहत स्थापित किए गए थे तो इन्हें राज्यों के शिक्षा मंत्रालयों के तहत न रखकर केंद्र में मानव संसाधन मंत्रालय में अलग से एक नवोदय विद्यालय समिति का गठन किया गया और वही आज भी उनका प्रबंधन देखती है।

बच्चों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्या का एक बड़ा कारण सांस्कृतिक झटका (कल्चरल शॉक) है। उनके मुताबिक ज्यादातर बच्चे गांवों से आते हैं। नवोदय विद्यालय के माहौल में इकसार होने में उन्हें समय लगता है। हम हर स्कूल में दो काउंसलर नियुक्त करने की योजना बना रहे हैं।

बिश्वजीत कुमार सिंह आयुक्त, नवोदय विद्यालय समिति

बताने की जरूरत नहीं कि नवोदय विद्यालयों ने शिक्षा क्षेत्र में अपनी गुणवत्ता के लिए एक अलग पहचान बनाई थी। इनकी सफलता को देखते हुए ही धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ाई गई और आज पूरे देश में 635 नवोदय विद्यालय हैं। 2012 तक इन विद्यालयों के बोर्ड का परिणाम अक्सर सौ फीसद रहता था। बारहवीं कक्षा का परिणाम भी 95 फीसद होता था। यह किसी भी अच्छे से अच्छे निजी स्कूल या फिर सीबीएसई के स्कूल से बेहतर है। पर उसके बाद हालात बिगड़ने लगे। प्रबंधन समिति चाहती तो तभी सतर्क होकर हालात का जायजा लेती और खामियों को दूर कर सकती थी पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। 2012 से पहले 2011 में भी पंजाब के फिरोजपुर जिले के कौनी गांव के नवोदय स्कूल से 31 बच्चे भागकर करतारपुर के गुरद्वारे में चले गए थे। इन स्कूलों के छात्रावासों से छात्रों के असामान्य व्यवहार की खबरें भी पिछले कुछ सालों से आ रही थीं। ये खबरें संकेत थीं कि हालात बिगड़ रहें हैं और उन्हें ठीक न किया गया तो स्थिति काबू से बाहर भी हो सकती है और वही हुआ भी। नवोदय विद्यालय समिति के आयुक्त बिश्वजीत कुमार सिंह के अनुसार बच्चों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्याओं का एक बड़ा कारण सांस्कृतिक धक्का(कल्चरल शॉक) है।

उनके मुताबिक ज्यादातर बच्चे गांवों से आते हैं। नवोदय विद्यालय के माहौल में इकसार होने में उन्हें समय लगता है। यही कारण है कि अधिकतर आत्महत्याएं दाखिले के बाद के पहले तीन महीनों जुलाई, अगस्त व सितंबर में होती हैं और उसके बाद पढ़ाई व परीक्षा के महीनों दिसंबर, जनवरी में होती हैं जब कुछ विद्यार्थी ज्यादा पढ़ाई का बोझ बर्दाश्त नहीं कर पाते। पर सवाल है कि जब अधिकतर बच्चे गांवों से ही आते हैं तो उन्हें आपस में हिलने मिलने में उतनी दिक्कत तो नहीं ही होनी चाहिए। प्रवेश देने से पहले छात्रों की योग्यता की परीक्षा ली जाती है। जैसा कि पहले भी कहा कि यहां गांवों के प्रतिभाशाली बच्चों को ही प्रवेश दिया जाता है तो मनोविज्ञान कहता है कि ऐसे बच्चे किसी भी माहौल में अपने को खपाने के लिए तैयार रहते हैं क्योंकि उनके सामने मुख्य बात अपना लक्ष्य होता है, माहौल नहीं। इक्का दुक्का बच्चे ऐसे हो सकते हैं जो घर से बाहर आ गृह-मोह (होम सिकनेस) का अनुभव करते रहें और निराशा में डूब जाएं पर ऐसे बच्चों का पता अनुभवी वार्डन को उसके व्यवहार से ही लग जाता है। नवोदय विद्यालय ऐलन जैसे कोई वाणिज्यिक शिक्षा संस्थान तो हैं नहीं जहां हॉस्टल हो या इंस्टीट्यूट छात्र को एक ‘करंसी’ के रूप में देखा जाता हो।

वहां तो वार्डन का बच्चों से सीधा संपर्क रहता है। कोटा में, जहां से आए दिन बच्चों की आत्महत्याओं की खबरें मिलती रहती हैं, एक निजी स्कूल ऐसा भी है जिसमें हाड़ौती क्षेत्र के गांवों, खासकर आदिवासी व अनुसूचित जाति के बच्चों की पढ़ाई को ध्यान में रख कर छात्रावास खोले गए। इन्हें 25 साल से भी ज्यादा हो गए। यह स्कूल कोटा शहर में है और 80 फीसद बच्चे यहां शहर के ही हैं। ऐसे में अनुसूचित जाति व जनजाति के गांवों व जंगलों से आने वाले बच्चों के लिए यहां का माहौल निश्चय ही बहुत अलग होता है। बच्चों के आपस में झगड़ने, लड़के-लड़कियों के आपस में प्यार में पड़ जाने और नाकाम होने जैसी घटनाएं यहां भी होती हैं पर आज तक एक भी बच्चे के आत्महत्या करने की खबर यहां से नहीं आई है। कारण वार्डन बच्चों पर नजर रखते हैं और जैसे ही उन्हें बच्चे के व्यवहार में अंतर नजर आता है वे उसके माता-पिता को बुला लेते हैं। इस स्कूल की एक अध्यापिका के मुताबिक स्कूल में अध्यापकों और हॉस्टल में वार्डन को प्रबंधन काफी खींचकर रखता है। वहां न तो ढील चलती है और न ही कोई बहाना। इसलिए सभी अपना काम मुस्तैदी से करते हैं। बात वातावरण व अकादमिक दबाव की ही करें तो यह दबाव तो पटना में पुलिस अधिकारी अभयानंद की, और से गांवों के बच्चों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए चलाए जा रहे संस्थान के लिए भी कही जा सकती है पर वहां से कभी किसी बच्चे के आत्महत्या करने की खबर नहीं आई है। सांस्कृतिक धक्का और पढ़ाई का दबाव एक बहाना है। सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आपने वहां कैसी सामाजिक संस्कृति विकसित की है।

जो विद्यालय स्थापित ही गांव के बच्चों के लिए किए गए हैं उनमें बच्चे तो गांवों से ही आएंगे। ऐसे में यह कहना कि उनके व विद्यालय के माहौल में काफी अंतर रहता है अपने आप में ही हास्यास्पद है। बच्चों के माता-पिता के बीच में झगड़े या फिर कहें कि पारिवारिक समस्याएं तीसरा बड़ा कारण आत्महत्या का बताया जा रहा है। अगर इसे सही मान भी लिया जाए तो फिर कहना पड़ेगा कि यह कारण तो आने वाले समय में और विकराल रूप लेगा। कारण, बढ़ती गरीबी व बेरोजगारी। पर नवोदय विद्यालयों की तो स्थापना ही प्रतिभाशाली बच्चों को अपने घरों के इस माहौल से निकालकर अपनी प्रतिभा को और उजागर करने के लिए की गई थी। ऐसे में इस समस्या पर तो उस समय भी ध्यान दिया गया होगा। समिति को पीछे जाकर देखना होगा कि तब इस समस्या से निपटने की व्यवस्था क्या की गई थी। इसके बाद बच्चों को आत्महत्या की ओर ले जाने वाला तत्व है अध्यापक का व्यवहार।

उनके द्वारा बच्चों से मारपीट, उन्हें कक्षा में जलील करना या फिर जातिसूचक अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल। यह ऐसे ही नहीं हैं कि 49 में से जान देने वाले 25 बच्चे अनुसूचित जाति व जनजाति के हैं। यह आश्चर्यजनक ही है कि एक ओर अध्यापक खराब परिणाम का ठीकरा इस बात पर फोड़ते हैं कि उन्हें तो अब बच्चों को डांटने तक का अधिकार नहीं रहा। दूसरी ओर कानूनी व्यवस्थाओं के बावजूद वे बच्चों के प्रति इतने कठोर व क्रूर हो जाते हैं कि बच्चा जीने से मर जाना बेहतर समझता है। पर ऐसे अध्यापकों की मौजूदगी भी बताती है कि नवोदय विद्यालयों में बच्चो की पढ़ाई का जो एक आदर्श माहौल विकसित किया गया था, वह अब नहीं बचा। तो जैसा कि बिश्वजीत कह रहे हैं कि हर स्कूल में दो काउंसलर नियुक्त किए जाएंगे। वह ठीक है। उसके साथ-साथ जरूरी है कि वहां के अध्यापकों व वार्डनों को संवेदनशील बनाया जाए। नवोदय विद्यालयों की अपनी एक संस्कृति व कार्यशैली हो जिसमें अध्यापक व बच्चे दोनों का ही भीतरी व बाहरी विकास हो सके।

 

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