प्रधानमंत्री पद के लिए होगा तीखा संघर्ष

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अगर भाजपा विरोधी पार्टियों की बात की जाए तो सभी प्रधानमंत्री मोदी को हराने की बात को लेकर एकमत हैं। लेकिन इस लक्ष्य को कैसे पाया जाए, इसके लिए वह अभी तक कोई फार्मूला तय नहीं कर सकी हैं। जब भी विपक्षी एकता की बात होती है, तो कई मुद्दों पर मतभेद भी शुरू हो जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि क्षेत्रीय दल अपने प्रभाव वाले राज्यों में कांग्रेस को ज्यादा स्थान देने के पक्ष में नहीं हैं।

इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव से तय होगा कि देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा? चुनाव के बाद ही पता चलेगा कि क्या नरेंद्र मोदी पीएमओ में बरकरार रह पाएंगे या राहुल गांधी इतनी सीट जीत सकेंगे, जिससे अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के सहयोग से वे सरकार बना पाएंगे। या फिर प्रधानमंत्री पद के लिए कोई अप्रत्याशित चेहरा ही दावेदार बनेगा। ये सारी बातें इस बात पर निर्भर करती हैं कि कौन सी पार्टी सहयोगी बनाने में कारगर तरीके से सफल हो पाती है। अगर भाजपा विरोधी पार्टियों की बात की जाए तो सभी प्रधानमंत्री मोदी को हराने की बात को लेकर एकमत हैं। लेकिन इस लक्ष्य को कैसे पाया जाए, इसके लिए वह अभी तक कोई फार्मूला तय नहीं कर सकी हैं। जब भी विपक्षी एकता की बात होती है, तो कई मुद्दों पर मतभेद भी शुरू हो जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि क्षेत्रीय दल अपने प्रभाव वाले राज्यों में कांग्रेस को ज्यादा स्थान देने के पक्ष में नहीं हैं। यही एक बड़ी वजह है कि भाजपा के खिलाफ शक्तिशाली महागठबंधन बनाने की बात सिरे नहीं चढ़ पाती है। अभी तो यही लगता है कि कुछ राज्यों में चुनाव पूर्व आधा-अधूरा गठबंधन ही बन सकेगा। भारतीय राजनीति के लिए 2019 काफी महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। आने वाले दिनों में हम लोग कई राजनीतिक समीकरणों के गवाह बनने वाले हैं। सच्चाई तो ये है कि दिसंबर 2018 ने ही राजनीतिक शक्तियों को 2019 के लिहाज से संगठित करना शुरू कर दिया है। यहां हमें यह समझ लेना चाहिए कि चुनावी राजनीति गणित जैसी सीधी नहीं है, जहां 2 + 2 = 4 होता है। राजनीतिक समीकरण गणित के हिसाब से नहीं, बल्कि कई बार यह परिस्थितियों के हिसाब से परिणाम देते हैं।

भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने निश्चित रूप से खुद को चुनावी राजनीति का माहिर रणनीतिकार सिद्ध कर दिया है। फिलहाल, तमाम पार्टियों के बीच किसी भी नेता को उनके समान सिद्धहस्त रणनीतिकार नहीं कहा जा सकता। वह अच्छी तरह से जानते हैं कि राजनीति के शतरंज पर उन्हें अपना मोहरा कब और कहां चलना है।

बिहार की चाल
बिहार में भाजपा ने जनता दल यू और लोक जनशक्ति पार्टी के साथ हाल में ही सीटों के बंटवारे का फार्मूला तय किया है। माना जा रहा है कि भाजपा के लिए सीटों के बंटवारे का ये समझौता घाटे का सौदा जाति के भी कुछ वर्गों का समर्थन हासिल है। जबकि लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) पूरी तरह से यादवों और मुस्लिमों के वोटों पर निर्भर करती है। ऐसे में अगर भाजपा अपनी 22 सीटों के लिए अड़ी रहती तो नीतीश और पासवान आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन के साथ भी जा सकते थे। ये उसके लिए घाटे का सौदा हो सकता था। हालांकि यह भी सही है कि नीतीश कुमार और पासवान के लिए वापस लालू यादव के पाले में जाना आसान नहीं होता। लालू यादव के जेल जाने के बाद पार्टी संभाल रहे उनके बेटे तेजस्वी यादव नीतीश कुमार को विपक्षी गठबंधन में लाने के सख्त खिलाफ हैं। ऐसी स्थिति में जेडीयू को 2014 की तरह अकेले लड़ने के लिए भी बाध्य होना पड़ सकता था। रामविलास पासवान भी यदि आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन के साथ जाते तो उनको भी संभवत: कुछ कम सीटों पर ही समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता था।

भाजपा को तीसरे मोर्चे से फायदा
2019 लोकसभा चुनाव के पहले ही एक बार फिर तीसरे मोर्चे को खड़ा करने की कोशिश शुरू हो गई है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने 23 दिसंबर को ही भुवनेश्वर में उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मुलाकात की। अगले दिन ही वे कोलकाता जाकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भी मिले। इस मुलाकात का तात्पर्य यही है कि विपक्ष के प्रस्तावित महागठबंधन के बीच तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश भी जारी है। हालांकि अभी नहीं कहा जा सकता है कि चंद्रशेखर राव अपनी इस कोशिश में अखिलेश यादव, मायावती, चंद्रबाबू नायडू, ममता बनर्जी, एमके स्टालिन, एचडी देवगौड़ा आदि को जोड़ने में कितना सफल हो सकेंगे? अभी उनके साथ एक ही व्यक्ति खड़ा हो सकता है और वे हैं नवीन पटनायक। यद्यपि नवीन अपने गृह राज्य ओडीशा में ही खुश हैं और केंद्रीय राजनीति में उनके आने की कोई इच्छा भी नहीं है। ऐसे में संभवत: वे महागठबंधन का हिस्सा नहीं बनेंगे। उनके तीसरा मोर्चे का हिस्सा बनने की संभावना भी कम ही है। 1990 के दशक में देश की दो वामपंथी पार्टियां सीपीएम और सीपीआई तीसरा मोर्चा बनाने की तरफदार हुआ करती थीं। वरिष्ठ वामपंथी नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने तीसरा मोर्चा गठित करने में मुख्य भूमिका निभाई थी। इसी मोर्चे ने कांग्रेस के समर्थन से एचडी देवगौड़ा की अगुवाई में अपनी सरकार बनाई थी।

कांग्रेस की बढ़ी ताकत
हाल में हुए विधानसभा चुनावों में हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत हासिल कर निश्चित रूप से कांग्रेस का मनोबल बढ़ा है। साथ ही भाजपा विरोधी पार्टियों के बीच राहुल गांधी की सौदेबाजी करने की ताकत भी बढ़ी है। इन राज्यों में कांग्रेस को किसी गठबंधन की जरूरत नहीं है। यहां मुख्य चुनावी संघर्ष कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होता है। इसके बावजूद ऐसा माना जा रहा है कि राहुल गांधी बहुजन समाज पार्टी के लिए इन राज्यों में कुछ सीट छोड़ सकते हैं, ताकि लोकसभा चुनाव की दृष्टि से महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में विपक्षी गठबंधन को पक्का किया जा सके। कांग्रेस लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को भी कुछ सीटें दे सकती है ताकि अखिलेश यादव को भाजपा के साथ लड़ाई के लिए संयुक्त रूप से चुनौती देने के लिए तैयार किया जा सके। कांग्रेस के लिए लोकसभा चुनाव की दृष्टि से उत्तर प्रदेश एक बड़ी चुनौती है। जैसी चर्चा चल रही है, उसके मुताबिक राज्य में मायावती और अखिलेश यादव गठबंधन कर 80 सीटों को आपस में बांट सकते हैं। इनमें से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट बहुल क्षेत्र की कुछ सीटें अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोकदल को भी दी जा सकती है। अगर ये दोनों पार्टियां उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अपने साथ लेने के लिए तैयार भी हो जाती हैं तो माना यही जा रहा है कि कांग्रेस को अधिकतम 10 सीटें ही मिल सकेंगी। ऐसे में यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या राहुल गांधी राज्य में इतनी कम संख्या में सीट लेने के लिए तैयार हो जाएंगे, वह भी तब, जब उनकी पार्टी फिर से सत्ता की दावेदार बनने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में अकेले ही चुनाव लड़ने के लिए बाध्य होना पड़े, ऐसी स्थिति में राहुल अपने दम पर 30 से 35 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात पर विचार कर सकते हैं। शेष 45 से 50 सीटों को वे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के लिए छोड़ सकते हैं। आज की तिथि में राहुल गांधी के अलावा कुछ हद तक ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू के अलावा अन्य कोई भी विपक्षी नेता आने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को शिकस्त देने की बात को लेकर बहुत अधिक गंभीर नहीं है। अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं अपने प्रभाव वाले राज्य में आधिपत्य होना, लोकसभा चुनाव की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है।

 

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