पूर्वोत्तर को हमारे करीब लाती ‘यात्रा’

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अंतरराज्यीय छात्र जीवन दर्शन यात्रा भारत को जानने समझने की एक कोशिश है। जो लगातार 53 वर्षों से जारी है। यह ‘यात्रा’ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के तहत काम कर रही है। इसके जरिये देश में दिख रही विविधता के अंदर छिपी नैसर्गिक एकता को अनुभूत करने का मौका मिला। ‘यात्रा’ अब हमें पूर्वोत्तर से जोड़ने वाली एक विशेष कड़ी का रूप ले चुकी हैे जो एक बेहद साधारण विचार पर आधारित है- यानि ‘यथार्थ को अपनी आंखों से देखो’।
अंतरराज्यीय छात्र जीवन दर्शन यात्रा का विचार 1965 में आया। जब पूर्वोत्तर के विषय पर बहुत सारी भ्रांतियां फैली हुईं थी। भौगोलिक बाधाएं तो थीं हीं पर दिल्ली में बैठे हुए कुछ तथाकथित ‘द्रष्टाओं’ की अदूरदर्शिता से उपजी उपेक्षा ने पूर्वोत्तर से हमारा संपर्क खत्म सा कर दिया था। उस दौर में एबीवीपी ने इस विशेष ‘यात्रा’ का प्रयोग शुरू किया। सर्वप्रथम, पूर्वोत्तर के राज्यों से कुछ विद्यार्थियों के लिए मुंबई में प्रवास करने और अध्ययन करने की व्यवस्था की गयी। इसके परिणाम उत्साहजनक रहे। 1966 में मात्र 17 विद्यार्थियों के साथ प्रारंभ की गयी यह ‘यात्रा’ आज एक विशाल रूप ले चुकी है। इस यात्रा के दौरान लगभग एक महीने की अवधि के लिए पूर्वोत्तर के सभी राज्यों से छात्र-छात्राएं देश के अलग शहरो में कुछ समय के लिए प्रवास करते रहे हैें वे किसी होटल में नहीं बल्कि सामान्य परिवारों के साथ उनके घरों में रहते हैं। इससे यात्रा के प्रतिनिधि और उनका आतिथ्य कर रहे परिवार दोनों को घुलने-मिलने का अवसर मिलता है। इससे एक दूसरे के खान-पान, पहनावे, भाषा व विचारों को साझा करने का अवसर मिलता है। इससे प्रतिनिधि और परिवार दोनों ही इस बात का आभास कर पाते हैं कि हमारे बीच के सभी भेद सतही हैें इन भेदों के पार हमारा राष्ट्र-प्रेम व सांस्कृतिक एकता समान है। राष्ट्रीय एकात्मता का सूत्र हमें आपस में प्रगाढ़ता से जोड़ता है, जिसका सन्देश है- ‘हम एक हैं’ आतिथेय परिवार यात्री प्रतिनिधियों का बड़े उत्साह से स्वागत करते हैं। जब दो-तीन दिन बाद विदाई का समय आता है,तब तक भावुकता का ऐसा संबंध बन चुका होता है कि आंसू निकल जाते हैं। यह भावुकता शून्य में नहीं उपज सकती। यह राष्ट्र-भाव है जो थोड़े से संपर्क में स्वयं को प्रकट कर देता है और इसी राष्ट्र-भाव के दर्शन में ही इस ‘यात्रा’ की सफलता है। अंतरराज्यीय छात्र जीवन दर्शन यात्रा के विचारों को तभी समझा जा सकता है जब हम विद्यार्थी परिषद के विचार को समझेंगे।
एबीवीपी का गठन ऐसे चुनौतीपूर्ण दौर में हुआ था जब विद्यार्थी संगठनों को सरकारों द्वारा समाप्त किया जा रहा था। सरकार में बैठे प्रमुख लोग कहते थे कि- ‘स्टूडेंट्स पॉवर इस नुइसेंस पॉवर’ (छात्र शक्ति-अराजक शक्ति है)। उस दौर में एबीवीपी ने नारा दिया कि – स्टूडेंट्स पॉवर इस नेशंस पॉवर (छात्र शक्ति-राष्ट्र शक्ति है)। छात्र को आज का नागरिक मानने वाले एबीवीपी ने अपने कार्यकतार्ओं में हमेशा राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का भाव भरा हैे इस विचार पर चलते हुए पूर्वोत्तर के प्रति चिंतित एबीवीपी के प्रमुख लोगों ने 1965 में स्वयं पूर्वोत्तर का प्रवास किया। उन्होंने पूर्वोत्तर की परम्पराओं, भाषाओं, कला एवं सौदर्य-बोध को आत्मसात किया तथा उस भाव में किये गये चिंतन से इस यात्रा की संकल्पना जन्मी।
इस वर्ष की ‘यात्रा’ 4 जनवरी से शुरू हुई है। 30-30 संख्या के तीन भागों में पूर्वोत्तर के सभी राज्यों से आये छात्र-छात्राएं देश भर के शहरों में प्रवास करेंगे। इस दौरान वे बुद्धिजीवियों, राजनेताओं एवं खिलाड़ियों से मिलेंगे। वे प्रमुख ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्थल एवं भारतीय संसद जैसी जगहों को भी देखेंगे। इससे उनके व्यक्तित्व का भी समग्र विकास होगा। आज हजारों की संख्या में अंतरराज्यीय छात्र जीवन दर्शन यात्रा के प्रतिनिधि रह चुके पूर्व छात्र अपने अपने क्षेत्र में राष्ट्रीय एकता को और मजबूत करने का कार्य कर रहे हैं। अंतरराज्यीय छात्र जीवन दर्शन यात्रा ने जागृत राष्ट्र-भाव वाले ऊजार्वान युवक-युवतियों को गढ़ने का जो कार्य किया है वह अत्यंत प्रेरक है।
(लेखक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री हैं।)

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