नोटबंदी के प्रभाव

0
17

आठ नवंबर को नोटबंदी के दो वर्ष पूरे हुए। अर्थव्यवस्था को व्यवस्थित बनाने की दिशा में सरकार द्वारा जो भी कदम उठाए गए, उनमें नोटबंदी एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम है। इन दो सालों में नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था में आये बदलावों के बारे में बता रहे हैं केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली।

नोटबंदी के बाद सरकार ने सबसे पहले देश के बाहर काले धन पर प्रहार किया। लोगों को जुर्माना देकर अपने काले धन को वापस लाने का विकल्प दिया गया। जो नहीं माने, उन पर ब्लैक मनी एक्ट (काला धन अधिनियम)के तहत मुकदमा चलाया जा रहा है। दूसरे देशों में मौजूद सभी बैंक खातों और संपत्तियों का विवरण सरकार तक पहुंचा है जिसके परिणामस्वरूप नियम का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हुई। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों पर रिटर्न दाखिल करने और टैक्स आधार का विस्तार करने के लिए तकनीकी का इस्तेमाल किया गया।
कमजोर वर्ग भी देश की औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हो, यह सुनिश्चित करने की दिशा में वित्तीय समावेशन एक और महत्वपूर्ण कदम था। जन धन खातों के जरिये अधिक से अधिक लोग बैंकिंग प्रणाली से जुड़ चुके हैं। आधार के जरिये सहायता का प्रत्यक्ष और पूरा लाभ सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंच रहा है। जीएसटी के जरिये अप्रत्यक्ष करों के भुगतान की प्रक्रिया को सरल बनाना सुनिश्चित किया गया।

नकद की भूमिका
भारत नकदी के वर्चस्व वाली अर्थव्यवस्था थी। नकद लेन-देन में, लेने वाले और देने वाले का पता नहीं लगाया जा सकता। इसमें बैंकिग प्रणाली की भूमिका पीछे छूट जाती है और साथ ही टैक्स सिस्टम भी बिगड़ता है। नोटबंदी ने नकद धारकों को सारा कैश बैंकों में जमा करने पर मजबूर किया। बैकों में नकद जमा होने और किसने जमा किए, ये पता चलने के परिणामस्वरूप 17.42 लाख संदिग्ध खाता धारकों की पहचान हो सकी। नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंड कार्रवाई का सामना करना पड़ा। बैकों में ज्यादा धन जमा होने से बैंकों की ऋण देने की क्षमता में भी सुधार हुआ। आगे निवेश के लिए इस धन को म्यूचुअल फंड में बदल दिया गया। यह नकद भी औपचारिक प्रणाली का हिस्सा बन गया।

गलत तर्क
नोटबंदी की एक बे-तर्क आलोचना यह है कि लगभग पूरा नकद बैंकों में जमा हो गया है। नोटबंदी का उद्देश्य नकदी की जब्ती नहीं था। नोटबंदी का उद्देश्य था कैश को औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल कराना और कैशधारकों को टैक्स सिस्टम में लाना। भारत को नकद से डिजिटल लेन-देन में स्थानांतरित करने के लिए सिस्टम में बदलाव की जरूरत है। इसका स्पष्ट रूप से उच्च कर राजस्व और उच्च कर आधार पर असर होगा।

डिजिटलीकरण
‘द यूनीफाइड पेमेंट इंटरफेस’ यानि एकीकृत भुगतान इंटरफेस (यूपीआई) 2016 में लॉन्च किया गया था जिसके जरिए दो मोबाइल धारकों के बीच वास्तविक समय में भुगतान संभव है। इसके जरिए हुआ लेन-देन अक्टूबर 2016 के 0.5 अरब रुपयों से बढ़कर सितंबर 2018 में 598 अरब रुपये पहुंच गया। भारत इंटरफेस फॉर मनी यानि भीम (बीएचआईएम) एनपीसीई द्वारा विकसित किया गया एक ऐप है, जिसमें यूपीआई का उपयोग कर त्वरित भुगतान किया जाता है। इस समय करीब 1.25 करोड़ लोग लेन-देन के लिए भीम ऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं। भीम ऐप के जरिए लेन-देन सितंबर 2016 के 0.02 अरब रुपये से बढ़कर सितंबर 2018 में 70.6 अरब रुपये हो गया। जून 2017 में यूपीआई के जरिए हुए कुल लेन-देन में भीम ऐप की हिस्सेदारी लगभग 48% है।
रुपे कार्ड का उपयोग प्वाइंट आॅफ सेल (पीओएस) और ई-कॉमर्स दोनों में किया जाता है। इसके जरिए प्वाइंट आॅफ सेल में नोटबंदी से पहले 8 अरब रुपयों का लेन-देन हुआ था, वहीं सितंबर 2018 में यह बढ़कर 57.3 अरब रुपये हो गया और ई-कॉमर्स में ये आंकड़ा 3 अरब रुपयों से बढ़कर 27 अरब रुपये हो गया। आज यूपीआई और रुपे कार्ड की स्वदेशी भुगतान प्रणाली के आगे वीजा और मास्टर कार्ड भारतीय बाजारों में अपनी हिस्सेदारी खो रहे हैं। डेबिट और क्रेडिट कार्ड के माध्यम से होने वाले भुगतान में यूपीआई और रूपे की हिस्सेदारी अब 65% तक पहुंच चुकी है।

प्रत्यक्ष कर
नोटबंदी का प्रभाव व्यक्तिगत इनकम टैक्स कलेक्शन पर भी देखा गया है। पिछले वर्ष की तुलना में इस वित्तीय वर्ष 2018-19 (31-10-2018 तक) इनकम टैक्स कलेक्शन में 20.2% बढ़ोतरी देखी गई है। कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन भी 19.5% अधिक रहा। नोटबंदी से दो साल पहले जहां प्रत्यक्ष कर कलेक्शन में क्रमश: 6.6% और 9% की वृद्धि हुई, वहीं नोटबंदी के बाद के दो वर्षों, 2016-17 में 14.6% और 2017-18 में 18% की वृद्धि दर्ज हुई। इसी तरह वर्ष 2017-18 में इनकम टैक्स रिटर्न 6.86 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 25% अधिक है। इस साल, 31-10-2018 तक 5.99 करोड़ रुपये का रिटर्न दाखिल किया जा चुका है जो पिछले वर्ष की इस तारीख तक की तुलना में 54.33% अधिक है। इस साल 86.35 लाख नये करदाता भी जुड़े हैं। मई 2014 में जब वर्तमान सरकार चुनी गई, तब इनकम टैक्स रिटर्न भरने वालों की कुल संख्या 3.8 करोड़ थी। इस सरकार के पहले चार वर्षों में यह संख्या बढ़कर 6.86 करोड़ हो गई है। इस सरकार के पहले पांच वर्ष पूरे होने तक हम निर्धारिती आधार को दोगुना करने के करीब होंगे।

अप्रत्यक्ष कर
नोटबंटी और जीएसटी के लागू होने से नकद लेन-देन बड़े पैमाने पर खत्म हुआ है। डिजिटल लेन-देन में बढ़ावा साफ देखा जा सकता है। इससे अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचा है, करदाताओं की संख्या बढ़ी है। जीएसटी लागू होने के बाद करदाताओं का आंकड़ा पहले के 60 लाख 40 हजार से बढ़कर 1 करोड़ 20 लाख हो गया। नेट टैक्स के हिस्से के रूप में दर्ज वस्तुओं और सेवाओं की वास्तविक खपत अब बढ़ी है। इसने अर्थव्यवस्था में अप्रत्यक्ष कर वृद्धि को बढ़ावा दिया है। इससे केंद्र और राज्य दोनों को फायदा हुआ है। जीएसटी के बाद प्रत्येक राज्य को हर साल कराधान में अनिवार्य 14% की वृद्धि हो रही है। तथ्य यह है कि निर्धारकों को अपने कारोबार की घोषणा अब न केवल अप्रत्यक्ष कर के प्रभावित आंकड़े के साथ करना है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि कर निर्धारण में उनसे उत्पन्न आयकर का खुलासा किया गया है। 2014-15 में जीडीपी अनुपात पर अप्रत्यक्ष कर 4.4% था। जीएसटी के बाद यह कम से कम 1 प्रतिशत अंक बढ़कर 5.4% तक चढ़ गया है।
छोटे करदाताओं को 97,000 करोड़ रुपये, जीएसटी निर्धारकों को 80,000 करोड़ रुपये की वार्षिक आयकर राहत देने के बावजूद टैक्स कलेक्शन बढ़ा है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों करों की दरें कम कर दी गई हैं, लेकिन टैक्स कलेक्शन बढ़ गया है। टैक्स बेस का विस्तार किया गया है। प्री-जीएसटी 31% कर दायरे में आने वाली 334 वस्तुओं पर कर कटौती देखी गई है।
सरकार ने इन संसाधनों का इस्तेमाल बेहतर बुनियादी ढांचा निर्माण, सामाजिक क्षेत्र और ग्रामीण भारत के विकास के लिए किया है। इससे बेहतर क्या हो सकता है कि आज गांव सड़कों से जुड़ें हैं, हर घर बिजली पहुंच रही है, ग्रामीण स्वच्छता का दायरा 92% पहुंच चुका है, आवास योजना सफल हो रही है, 8 करोड़ गरीब घरों तक गैस कनेक्शन पहुंचा है। दस करोड़ परिवारों को आयुष्मान भारत का लाभ मिल रहा है।
सब्सिडी वाले भोजन पर 1,62,000 करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे हैं, किसानों के लिए एमएसपी में 50% की वृद्धि और सफल फसल बीमा योजना। यह अर्थव्यवस्था का औपचारीकरण है जिससे 13 करोड़ उद्यमियों को मुद्रा लोन मिला है। सातवां वेतन आयोग चंद हμतों के भीतर लागू किया गया था और वन रैंक वन पेंशन का वादा पूरा किया गया। अधिक व्यवस्थित अर्थव्यवस्था यानि अधिक राजस्व, गरीबों के लिए अधिक संसाधन, बेहतर बुनियादी ढांचा, और हमारे नागरिकों के लिए बेहतर गुणवत्ता वाला जीवन।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here