जोगी बने कांग्रेस की मुसीबत

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अजित जोगी कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के प्रभाव वाली कुछ चुनिन्दा सीटों पर उसे हराने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इसके लिए उन्होंने बहुजन समाज पार्टी को अपने पाले में खींचकर कांग्रेसी नेतृत्व को चारों खाने चित कर दिया। जोगी-माया गठबंधन अगर थोड़ा-बहुत वोटों में सेंध लगाने में सफल हुआ तो कांग्रेस का नुकसान तय है।

छत्तीसगढ़ में विधानसभा का चुनाव अंतिम चरण में है। राज्य में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) चौथी बार अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए जूझ रही है तो प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस रमन सरकार की नाकामियों को जनता के सामने रख रही है। इस चुनाव में इन दोनों प्रमुख दलों के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है। हालांकि इससे पहले के चुनावों में भी छत्तीसगढ़ में इन्हीं दोनों पार्टियों के बीच सीधी लड़ाई होती रही है और तीनों बार भाजपा ने सरकार बनाने में सफलता हासिल की है। इस बार लड़ाई काफी दिलचस्प है। कांग्रेस से अलग होने के बाद राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी अलग पार्टी बनाकर भाग्य आजमाने के लिए पहली बार चुनाव मैदान में उतर गए हैं। इससे कई क्षेत्रों में लड़ाई त्रिकोणीय होने से चुनाव की रोचकता काफी बढ़ गई है।
देखा जाए तो छत्तीसगढ़ परंपरागत रूप से कांग्रेस का अभेद्य किला रहा है जिसे संघ विचार परिवार ने दशकों की मेहनत और संघर्ष से फतह कर लिया। कांग्रेस के क्षत्रपों में आपसी मनमुटाव और मुख्यमंत्री बनने को लेकर जो गलाकाट होड़ मची है, उससे पार्टी के कार्यकर्ताओं और प्रचार अभियान पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। सीडी कांड जैसी अरुचिकर घटनाओं से मतदाताओं विशेषकर महिलाओं और बुजुर्गों के बीच अच्छा संदेश नहीं गया। बहरहाल, राजनांदगांव में भाजपा मुख्यमंत्री रमन सिंह की जीत के प्रति आश्वस्त तो हैं, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी और कांग्रेस प्रत्याशी करुणा शुक्ला ने मुकाबले को बेहद रोचक बना दिया है। पूरे देश की नजर इस हाई-प्रोफाइल सीट पर लगी है। करुणा जी-जान से प्रचार में जुटी हैं। राजनांदगांव के कांग्रेसियों में भी उत्साह की लहर है। रायपुर दक्षिण से कद्दावर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का किला दरकता नहीं दिखता जबकि रायपुर पश्चिम से अन्य ताकतवर मंत्री राजेश मूणत कांग्रेस के युवा प्रत्याशी विकास उपाध्याय से बुरी तरह जूझ रहे हैं। वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल भाजपा के मोतीलाल साहू के मुकाबले थोड़े मजबूत दिख रहे हैं। पूर्व में उनकी जीत को लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे थे। जगदलपुर में भाजपा प्रत्याशी संतोष बाफना कांग्रेस के रेखचंद जैन से कड़े मुकाबले में जूझ रहे हैं। कोंडागांव में पूर्व मंत्री लता उसेंडी निवर्तमान कांग्रेस विधायक मोहन मरकाम को हराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं। नारायणपुर में मंत्री केदार कश्यप और उनके समर्थक जीत के प्रति आश्वस्त दिखते हैं, लेकिन वह भी कड़े मुकाबले में हैं।

बीते चुनावों पर एक नजर
नवंबर, 2003 में छत्तीसगढ़ विधानसभा की 90 सीटों के लिए पहला चुनाव हुआ। तब भाजपा ने 50 सीटों पर जीत हासिल की थी। कांग्रेस को 37 सीटें मिली थीं। इस चुनाव में बसपा को 2 सीटें और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को एक सीट पर जीत मिली थी। वर्तमान में जकांछ के मुखिया अजीत जोगी भी 2003 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी में ही थे। इससे पहले वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे। लेकिन अब जोगी कांग्रेस से अलग हो चुके हैं। भाजपा को इस चुनाव में 39.26 फीसदी और कांग्रेस को 36.71 फीसदी मत मिले थे। वर्ष 2008 के चुनाव में भाजपा 50 सीटें जीतने में सफल हुई। तब कांग्रेस ने 38 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस चुनाव में भी बसपा को 2 सीटें मिली थीं। चुनाव में भाजपा को 40.33 और कांग्रेस को 38.63 फीसदी वोट मिले थे। वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा को 49 सीटें और कांग्रेस को 38 सीटें मिली थीं। तब बसपा को एक और एक निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनाव जीता था। इस चुनाव में भाजपा को 41.04 फीसदी और कांग्रेस को 40.29 फीसदी वोट मिले थे।

पर लगी है। करुणा जी-जान से प्रचार में जुटी हैं। राजनांदगांव के कांग्रेसियों में भी उत्साह की लहर है। रायपुर दक्षिण से कद्दावर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का किला दरकता नहीं दिखता जबकि रायपुर पश्चिम से अन्य ताकतवर मंत्री राजेश मूणत कांग्रेस के युवा प्रत्याशी विकास उपाध्याय से बुरी तरह जूझ रहे हैं। वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल भाजपा के मोतीलाल साहू के मुकाबले थोड़े मजबूत दिख रहे हैं। पूर्व में उनकी जीत को लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे थे। जगदलपुर में भाजपा प्रत्याशी संतोष बाफना कांग्रेस के रेखचंद जैन से कड़े मुकाबले में जूझ रहे हैं। कोंडागांव में पूर्व मंत्री लता उसेंडी निवर्तमान कांग्रेस विधायक मोहन मरकाम को हराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं। नारायणपुर में मंत्री केदार कश्यप और उनके समर्थक जीत के प्रति आश्वस्त दिखते हैं, लेकिन वह भी कड़े मुकाबले में हैं।

रायगढ़ में भाजपा विधायक रोशन अग्रवाल अपनी ही पार्टी के विजय अग्रवाल की बगावत से हालकान हैं। खरसिया में पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल के विधायक बेटे उमेश पटेल को पूर्व आईएएस अधिकारी ओपी चौधरी कांटे की टक्कर दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ की कोरबा सीट भी काफी हाई-प्रोफाइल हो गई है जहां सांसद बंसीलाल महतो के बेटे विकास महतो भाजपा प्रत्याशी हैं तो कांग्रेस के तीन बार के विधायक जयसिंह अग्रवाल उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं। अंतागढ़ सीट पर सांसद विक्रम उसेंडी भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं, जीत को लेकर भी निश्चिंत हैं। उसेंडी के सामने कांग्रेस ने अनूप नाग को अपना प्रत्याशी बनाया है। अंबिकापुर सीट पर विपक्ष के नेता टीएस सिंहदेव चुनाव मैदान में हैं और उन्हें भाजपा उम्मीदवार अनुराग सिंहदेव चुनौती दे रहे हैं।

युवाओं पर सभी दलों की निगाहें
वर्ष 2000 में मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ अब 18 वर्ष का हो गया है। राज्य के दोनों प्रमुख दल इस चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले नए वोटरों लुभाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। भाजपा राज्य में चौथी बार सरकार बनाने के लिए जनता दरबार के अलावा नए वोटरों पर डोरे डाल रही है और अपना प्रचार अभियान भी इन्हीं मतदाताओं को ध्यान में रखकर चला रही है। मोबाइल, लैपटाप, साइकिल वितरण और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलावों का फायदा इसी वर्ग को हुआ है। कांग्रेस भी नौजवानों के इसी वर्ग को रिझाने में जुटी है, लेकिन एक स्पष्ट कार्यक्रम का अभाव और पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता को लेकर युवा-मन में संशय की वजह से कांग्रेसी योजना सिरे नहीं चढ़ पा रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जकांछ) के नेता अमित जोगी स्वयं ही नौजवान हैं, लेकिन उनके तौर-तरीके इतने जुदा हैं कि एक आम कस्बाई और ग्रामीण युवक उनके साथ सहज महसूस नहीं करता है। इसके अलावा आम आदमी पार्टी (आप) शहरों के शिक्षित नौजवानों और बेरोजगारों को अपील तो करती है, लेकिन स्थानीय नेतृत्व की कमी और आप नेता अरविन्द केजरीवाल के नाटकीय रुख की वजह से उनकी पार्टी युवाओं के बीच पैठ बनाने में नाकाम रही है। 

इससे पहले भाजपा ने वर्ष 2013 का चुनाव कांग्रेस से महज 0.72 फीसद के अंतर से जीती थी। इतने मामूली अंतर को पाटने में कांग्रेस को कोई खास मशक्कत नहीं करनी पड़ती बशर्ते वह पिछले सालों में अपने लुंज-पुंज संगठन को चुस्त-दुरुस्त कर लेती। वहीं मई 2013 में माओवादियों के भीषण रक्तपात में अपने कई दिग्गज नेताओं को खोने के बावजूद कांग्रेस जनता में न तो सहानुभूति तक पैदा कर सकी और न ही इतने जघन्य हत्याकांड का कोई लाभ उठा सकी। कांग्रेस की इन्हीं परंपरागत और स्वाभाविक कमजोरियों को देखते हुए भाजपा के रणनीतिकार सत्ता में वापसी के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त नजर आ रहे हैं। यहां एक चर्चा आम रही है कि पिछले चुनावों तक पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कांग्रेस में रहते हुए भी अंदरखाने भाजपा को मदद पहुंचाते रहे। लेकिन इस चुनाव में दोनों दल अब जोगी के कारण होने वाले नुकसान और फायदे का लेखा-जोखा लगाने में व्यस्त हैं।
देखा जा रहा है कि जोगी कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के प्रभाव वाली कुछ चुनिन्दा सीटों पर कांग्रेस को हराने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इसके लिए जोगी ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को अपने पाले में खींचकर कांग्रेसी नेतृत्व को चारों खाने चित्त कर दिया। जोगी- माया गठबंधन अगर थोड़ा-बहुत वोटों में सेंध लगाने में सफल हुआ तो कांग्रेस का नुकसान तय है। वहीं इस चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) भी दिल्ली की अपार सफलता के बाद अपने पांव पसारने में लगी है, लेकिन छत्तीसगढ़ में कमजोर नेतृत्व और स्पष्ट नीति के अभाव में इस नए-नवेले दल के बहुत चहेते नहीं बन पाए हैं। हालांकि सुदूर बस्तर से लेकर रायपुर और सरगुजा तक पार्टी के नेता मतदाताओं को लुभाने के लिए दिल्ली मॉडल की नुमाइश करने से भी नहीं चूक रहे हैं।
भाजपा ने राम मंदिर आंदोलन के बूते राजनैतिक रूप से जो मजबूती हासिल की। उससे सांगठनिक रूप से पहले से ही सशक्त पार्टी शिखर पर पहुंचने में कामयाब हुई। आज भाजपा के पास संगठन की शक्ति तो है ही, हाल के वर्षों में पार्टी ने चुनावी रणनीति और प्रबंधन में भी जो बेजोड़ कौशल हासिल किया है। कांग्रेस उसके मुकाबले दूर- दूर तक कहीं नहीं ठहरती है। छत्तीसगढ़ में पार्टी की वैतरणी पार लगाने का जिम्मा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के कंधों पर है। ऐसे में भाजपा परेशानी के बावजूद बहुत आश्वस्त दिखती है। कांग्रेस के नेता एक तरफ छत्तीसगढ़ के मतदाताओं को राफेल का गणित समझाकर वोट हासिल करना चाहते हैं तो दूसरी तरफ कर्जमाफी के जरिए किसानों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इसके जरिए मतदाताओं को अपने पक्ष में किस हद तक ला पाएंगे, इसका कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं दिख रहा है।

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