जीत का श्रेय भारतीय सैनिकों को

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प्रथम विश्वयुद्ध तीन महाद्वीपों यूरोप, एशिया और अफ्रीका के देशों में लड़ा गया। अपार जन-धन की हानि हुई। इस भयानक युद्ध में 11 लाख भारतीय सैनिक भी शामिल रहे। न सिर्फ सैनिक बल्कि भारत से 1.72 लाख घोड़े, खच्चर, बैल, ऊंट,टट्टू और दूध देने वाली मवेशी भी भेजे गए।

भारत समेत दुनिया के कई देशों में 11 नवंबर को प्रथम विश्वयुद्ध समाप्ति का शताब्दी समारोह मनाया गया। फ्रांस में इस अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में करीब पचास देशों के राष्ट्राध्यक्ष और प्रतिनिधियों ने भाग लिया। भारत की तरफ से उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने इस कार्यक्रम में शिरकत किया। फ्रांसीसी राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। इस दौरान फ्रांस के विलर्स गुस्लां शहर में प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की याद में निर्मित भव्य ‘इंडियन वार मेमोरियल’ उद्घाटन करते हुए उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि, ‘‘फ्रांस के विलर्स गुस्लां शहर में भारतीय सशस्त्र बलों के स्मारक का उद्घाटन कर बेहद खुश हूं। यह उन हजारों भारतीय सैनिकों को महान सम्मान है जिनकी बहादुरी और समर्पण ने दुनिया भर में प्रशंसा बटोरी।’’
देश की स्वतंत्रता के बाद भारत द्वारा फ्रांस में निर्मित यह अपनी तरह का पहला स्मारक है। इस स्मारक के निर्माण की घोषणा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जून, 2018 में पेरिस के अपने दौरे के समय की थी। प्रथम विश्वयुद्ध समाप्ति शताब्दी के उपलक्ष्य में भारत आए ब्रिटिश संसद हाउस आॅफ कामंस के स्पीकर नई दिल्ली स्थित इंडिया गेट जाकर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि अपर्ति की।

प्रथम विश्वयुद्ध समाप्ति शताब्दी समारोह की तरह ही 2014 में प्रथम विश्वयुद्ध शताब्दी स्मरणोत्सव का आयोजन किया गया था। नई दिल्ली में 30 अक्टूबर, 2014 को संपन्न हुए प्रथम विश्व युद्ध शताब्दी समारोह कार्यक्रम में ब्रिटिश रक्षा सचिव माइकल फैलोन और भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली एवं सेना प्रमुख जनरल दलवीर सिंह शामिल हुए थे। तब ब्रिटेन ने प्रथम विश्वयुद्ध को स्मरण करने के लिए 4 वर्षों तक महोत्सव मनाने की घोषणा की थी। इम्पीरियल वार म्यूजियम ने कार्यक्रम का आयोजन करके छात्रों और शिक्षकों को वेस्टर्न फ्रंट की युद्ध भूमियों की यात्रा के लिए एक कोष भी बनाया था। ब्रिटेन का मानना है कि प्रथम विश्व युद्ध से उबरना संभव नहीं होता यदि कई देशों द्वारा योगदान और बलिदान न दिया जाता। ऐसे में यह जरूरी है कि हम इस साझे प्रयास को न भूलें और उस भयानक युद्ध से मिले सबक को नई पीढि़यों तक पहुंचाने की कोशिश करते रहें। इस स्मृति समारोह का विषय- स्मृति, युवा और शिक्षा निर्धारित किया गया था।

प्रथम विश्वयुद्ध से मिले सबक को अगली पीढि़यों तक पहुंचाने के लिए संपन्न चार वर्षीय कार्यक्रमों में हर साल प्रथम विश्वयुद्ध की एक प्रमुख घटना को याद किया गया। जिसमें अप्रैल 2015 में गैलिपोली, 2016 में जटलैंड की लड़ाई और सोम्मे का प्रथम युद्ध, 2017 में पैस्चेंडील और 2018 में आर्मिस्टिस दिवस मनाया गया। प्रथम विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों तरफ से भारतीय सैनिकों ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 28 जुलाई, 1914 को शुरू हुआ प्रथम विश्व युद्ध लगभग 52 माह तक चलने के बाद 11 नवंबर, 1918 को समाप्त हुआ था। इसमें दुनिया की सभी बड़ी शक्तियां शामिल हुर्इं । युद्ध में कुल 7 करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया जिनमें से 90 लाख शहीद हुए। भारत प्रथम विश्व युद्ध में सबसे अधिक सैनिक भेजने वाले देशों में एक था। देश उस समय ब्रिटेन के अधीन था।

प्रथम विश्व युद्ध तीन महाद्वीपों यूरोप, एशिया और अफ्रीका के साथ ही धरती, आकाश और समुद्र में लड़ा गया। इस युद्ध में अपूर्णनीय जन-धन की क्षति हुई जिसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक इस महायुद्ध में करीब एक करोड़ लोगों की जान गई और इससे दोगुने घायल हुए। उस समय की पीढ़ी के लिए यह जीवन की दृष्टि बदल देने वाला अनुभव था। उस दौरान करीब आधी दुनिया हिंसा की चपेट में थी।

प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय सैनिकों की भूमिका
प्रथम विश्वयुद्ध में भारत सबसे अधिक सैनिक भेजने वाला देश था। 11 लाख भारतीय सैनिकों को विश्वयुद्ध के दौरान विभिन्न देशों में भेजा गया। जिसमें लगभग 62,000 सैनिक मारे गए और 67,000 घायल हो गए थे। युद्ध के दौरान कुल 74,187 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी। भारतीय थल सेना और नौ सेना के साथ ही आर्मी μलाइंग में भी भारतीयों ने अपनी सेवा दी। बंगाल से लेबर बटालियन की भी नियुक्ति की गई थी। भारतीय थल सेना की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण और विशिष्ट रही कि वह फ्रांस और μलैंडर्स, गैलीपॉली के ऐंजैक्स, मेसोपोटैमिया, फिलिस्तीन और उत्तरी अफ्रीका सहित युद्ध के लगभग सभी मोर्चे पर शामिल हुई थी। भारतीय सैनिकों को कुल 11 विक्टोरिया क्रॉस मिले, पर उनमें से 2 नेपाली नागरिक और 3 उन सैनिकों को मिला जिनका जन्म वर्तमान पाकिस्तान में हुआ था।

दरवान सिंह नेगी
भारतीय सैनिकों को 1911 तक विक्टोरिया क्रॉस के लिए योग्य नहीं माना जाता था। उन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी का ‘इंडियन आॅर्डर आॅफ मेरिट’ प्रदान किया जाता था। लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय सैनिकों की बहादुरी और बलिदान ने ब्रिटिश साम्राज्य को कानून बदलने पर मजबूर कर दिया।
39 वीं गढ़वाल राइफल्स के सैनिक दरवान सिंह नेगी को पहला विक्टोरिया क्रॉस मिला। 23-24 नवंबर, 1914 को फ्रांस के फेस्टुबर्ट के पास मोर्चे पर तैनात दरवान सिंह नेगी सिर और हाथ में कई घाव लगने के बावजूद दुश्मन से लड़ते रहे। इसके साथ ही सैनिक खुदादाद खान, 55वीं फ्रंटियर फोर्स के जमादार मीर दस्त, तीसरी गोरखा राइफल्स के राइफलमैन कुलबीर थापा, 41वीं डोगरा रेजीमेंट के लाला को 21 जनवरी, 1916 को मेसोपोटामिया के युद्ध में, 89 वीं पंजाबी रेजीमेंट के शाहमद खान को 12-13 अप्रैल 1916 को मेसोपोटामिया युद्ध, 28वीं लाइट कैवलरी के गोबिंद सिंह, तीसरी गोरखा राइफल्स के करण बहादुर थापा को मिस्र और बदलू सिंह को फिलिस्तीन में जॉर्डन नदी के किनारे दुश्मनों का मजबूती से मुकाबला करने के लिए विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया।

प्रथम विश्वयुद्ध का कारण
प्रथम विश्वयुद्ध का असली कारण तो औद्योगिक क्रांति के कारण सभी बड़े देशों की उपनिवेश स्थापित करने की लालसा थी। जहां से वे कच्चा माल प्राप्त कर मशीनों से बनाई गई वस्तुओं को ऊंची दामों पर बेच कर लाभ कमाना चाहते थे। इस लालच में यूरोपीय देशों ने साम्राज्य विस्तार के लिए अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाने के साथ ही एक दूसरे देशों से गुप्त कूटनीतिक संधियां कीं। इस प्रक्रिया में राष्टÑों के बीच परस्पर अविश्वास और वैमनस्य बढ़ा और युद्ध अनिवार्य हो गया। लेकिन इसका तात्कालिक कारण आॅस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य के युवराज आर्क ड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड और उनकी पत्नी सोफी की हत्या था। जिनकी 28 जून, 1914 को बोस्रिया की राजधानी साराएवो में एक सर्बियाई राष्टÑवादी गैवरिलो प्रिंसिप ने हत्या कर दी थी। एक माह बाद आॅस्ट्रिया ने सर्बिया के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया। रूस, फ्रांस, इटली, अमेरिका और ब्रिटेन ने सर्बिया तो जर्मनी,हंगरी,बुल्गारिया और आॅटोमन साम्राज्य ने आॅस्ट्रिया का पक्ष लिया। उसके बाद शुरू हुआ घटनाक्रम प्रथम विश्व युद्ध कहलाया। विश्व युद्ध खत्म होते होते चार बड़े साम्राज्य रूस, जर्मनी, आॅस्ट्रिया-हंगरी और उस्मानिया ढह गए। यूरोप की सीमाएं फिर से निर्धारित हुई और अमेरिका एक महाशक्ति बन कर उभरा।

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