जमीनी चुनाव में भी माकपा साफ

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त्रिपुरा में लंबे समय तक शासन करने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) वर्तमान दौर में अपनी जमीन पूरी तरह से खो चुकी है। कांग्रेस की बची खुची जमीन भी खिसक चुकी है। कांग्रेस राज्य में पिछले 25 वर्षों से अपने लिए स्थान खोजने में जुटी रही। बावजूद उसे बीते विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा। कहते हैं राजनीतिक पार्टियों का कद कितना बड़ा है, यह उसके जमीनी स्तर के समर्थक और कार्यकर्ताओं की संख्या के आधार पर तय होता है। त्रिपुरा में पिछले 25 वर्षों तक विधानसभा से लेकर ग्राम पंचायत स्तर के सभी चुनाव में वामपंथी पार्टियां एकतरफा जीत हासिल करती रहीं।

अन्य किसी पार्टी को त्रिपुरा में किसी भी स्तर के चुनाव में जीत नसीब नहीं होती थी। चालू वर्ष के फरवरी महीने में विधानसभा का चुनाव हुआ और मार्च में भारी बहुमत के साथ भाजपा और आईपीएफटी गठबंधन सरकार में राज्य की सत्ता पर काबिज हो गईं। सत्ता परिवर्तन होने के साथ-साथ राज्य में अचानक वामपंथ का किला ध्वस्त होने लगा। सरकार के जाने से जितनी बड़ी क्षति माकपा को नहीं हुई, उससे बड़ा आघात वामपंथी पार्टियों को उस समय लगा जब दो वर्ष का समय शेष रहते हुए भी पंचायत स्तर के उसके प्रतिनिधि इस्तीफा देकर सत्ताधारी पार्टी भाजपा में शामिल होने लगे। देखते ही देखते पंचायत स्तर के 3,386 सदस्यों ने अपना इस्तीफे दे दिया। हालांकि कुछ सीटें चुने हुए प्रतिनिधियों के निधन से पहले ही खाली थीं। इस्तीफा देने वालों में ग्राम पंचायत समिति के 3,207 सदस्य, पंचायत समिति के 161 सदस्य और जिला परिषद के 18 सदस्य शामिल हैं। बात इस्तीफा देने तक ही नहीं रुकी बल्कि, 100 से अधिक ऐसे पंचायत सदस्य थे जो विधानसभा चुनाव में वामपंथी पार्टियों की करारी हार के बाद राज्य को छोड़कर भूमिगत हो गए। इस तरह से वामपंथी पार्टियों की जमीन अचानक ही पूरी तरह से दरक गई।

इस्तीफा देने वाले ग्राम पंचायत सदस्य, पंचायत समिति और जिला परिषद के सदस्यों ने अपने पदों से त्यागपत्र देने की अलग-अलग वजहें गिनाई। कुछ ने कहा कि वे शारीरिक अस्वस्थता के चलते अपना इस्तीफा दे रहे हैं। जबकि, कुछ ने कहा कि वे अपनी इच्छा से इस पद को छोड़ रहे हैं। कुछ ने कहा कि वामपंथी सरकार ने जबरन उन्हें इस पद पर बने रहने का दबाव डाल रखा था। जैसे ही उन्हें मौका मिला वे पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने कहा कि वे बहुत पहले ही भाजपा में शामिल होना चाहते थे, लेकिन सत्ताधारी पार्टी का बोलबाला और दबाव ऐसा था कि वे डर के मारे वामपंथ को छोड़ नहीं पा रहे थे। देखते ही देखते कुल तीन श्रेणियों में 3,386 चुने हुए प्रतिनिधियों ने इस्तीफा दे दिया। इसके चलते इन पदों के लिए मध्यावधि चुनाव कराया गया। पंचायत स्तर के इस चुनाव के लिए वामपंथी पार्टियों को एक अदद उम्मीदवार खोजने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी।

नतीजा यह हुआ कि भाजपा के 3075 पंचायत उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए गए। इस तरह 96 फीसद भाजपा उम्मीदवार पंचायत चुनाव निर्विरोध जीत गए। 30 सितम्बर को 132 ग्राम पंचायत सदस्य और 7 पंचायत समिति के सदस्यों के लिए उपचुनाव करवाए गए। हालांकि 18 जिला परिषद के उम्मीदवार पहले ही निर्विरोध चुन लिये गये थे। 3 अक्टूबर को हुई मतगणना के बाद वामपंथी पार्टी माकपा का एकमात्र उम्मीदवार लखीपुर से जीत हासिल कर पाया। जबकि कांग्रेस के तीन उम्मीदवार इसबपुर, कइयाजिखाउरा और नूरपुर से जीत हासिल करने में सफल रहा। राज्य की सत्ता में साझीदार आईपीएफटी अकेले उपचुनाव में उतरी थी। कुछ सीटों पर भाजपा और आईपीएफटी के बीच सीधी लड़ाई देखने को मिली। इसमें आईपीएफटी को कुछ सीटों पर सफलता भी मिली। ज्ञात हो कि आईपीएफटी जनजातीय क्षेत्रीय पार्टी है। इसका जनाधार पहाड़ी इलाकों में है।

पंचायत स्तर के 3 श्रेणियों के लिए हुए उप चुनाव में भाजपा 99 फीसद से अधिक सीटों पर कब्जा करने में सफल रही। कुल मिलाकर देखा जाए जमीनी स्तर के उप चुनाव में पूर्व सत्ताधारी पार्टी माकपा और कांग्रेस का राज्य से पूरी तरह से सफाया हो गया। कारण जमीनी स्तर पर उसके पास न तो कार्यकर्ता बचे हैं और न ही समर्थक। जबकि कांग्रेस पहले से ही राज्य में अपनी जमीन पूरी तरह से खो चुकी है। आने वाले समय में राज्य में वामपंथ को फिर से खड़ा होने में कड़ी मशक्कत करनी होगी।

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