जनेऊ और टीपू

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18वीं सदी के अन्यायी और अत्याचारी मुस्लिम शासक टीपू सुल्तान की जयंती पर कर्नाटक में विवाद होना ही था। 10 नवंबर को इस आततायी शासक की जयंती सरकारी स्तर पर मनायी गयी। भाजपा ने विरोध प्रदर्शन की घोषणा की थी, उसने किया भी। कमाल यह कि इस पर सत्तारूढ़ जनता दल सेकुलर और कांग्रेस के बीच तनातनी और तल्खी देखी गयी। कांग्रेस ने जयंती कार्यक्रम में खुलकर हिस्सा लिया। जनता दल सेकुलर ने किनारा कर लिया। वोट बैंक की राजनाति दोनों पर हावी है। कांग्रेस को मुसलमानों का वोट चाहिए तो जनता दल सेकुलर को अपने मैसूर के हिंदू जनाधार को बचाना था। हालांकि दोनों दल ‘सेकुलर डीएनए’ के हैं।

जयंती का कार्यक्रम सरकारी था। विधानसभा सौंध में मनाया गया। जद (सेकुलर) के मुख्यमंत्री कुमार स्वामी आयोजन में नहीं गये। कांग्रेस के नेताओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। सरकार में वरिष्ठ मंत्री डीके शिव कुमार आयोजन में नेतृत्वकारी भूमिका में थे। सुरक्षा चौक चौबंद थी। विरोध कर रहे भाजपा के दो विधायकों समेत हजारों कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया गया। कुमार स्वामी का विरोध करने के लिए कांग्रेस ने अपने मुस्लिम नेताओं को आगे कर दिया। पूर्व मंत्री तनवीर सैत ने तो मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति को मुस्लिम समाज का अपमान तक बता दिया। तनवीर ने प्रकारांतर से टीपू का यशोगान किया। सरकार में कांग्रेस कोटे के राज्यमंत्री जमीर अहमद खान कहां पीछे रहने वाले थे। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया से मुलाकात कर उनका सम्मान किया। टीपू को कुशल शासक बताया। जयंती का विरोध कर रही भाजपा को जमकर खरी-खोटी सुनायी।

उल्लेख करना जरूरी है कि सिद्धारमैया ने ही 2015 में मुख्यमंत्री रहते हर साल 10 नवंबर को टीपू जयंती मनाने का सिलसिला शुरू किया। भाजपा प्रारंभ से ही इसका विरोध कर रही है। कुमार स्वामी ने भी इसका विरोध किया था। टीपू सुल्तान ने मैसूर के राजा से लड़कर कमान लेते समय हजारों हिंदुओं का कत्लेआम किया था। जाहिर है वे जनेऊधारी थे। अब सवाल उठता है कि छोटी-छोटी बातों पर त्वरित प्रतिक्रिया देने वाले जनेऊधारी राहुल गांधी इस पर क्यों नहीं बोल रहे हैं? हिंदू वोट के लिए पहले गुजरात चुनाव में मंदिर-मंदिर घूमे और अब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मंदिरों का चक्कर लगा रहे हैं।

साफ है कि उनका मंदिर और जनेऊ-प्रेम केवल हिंदू वोटों के लिए है। एंटनी कमेटी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में हार का कारण हिंदू वोटों के व्यापक छिटकाव को बताया था। कहा था कि कांग्रेस की छवि मुस्लिम समर्थक पार्टी की बन गई थी। अब राहुल गांधी उस छवि को तोड़ने में जुटे हैं लेकिन खुले मन से नहीं। इसीलिए चुप हैं। इतिहास की किताबों में टीपू सुल्तान का मंहिमामंडन किया गया है। कांग्रेस और उसके समर्थक वामपंथी लेखकों ने ऐसा ही इतिहास लिखा और लिखवाया। इस इतिहास में हुमायूं, बाबर, शाहजहां और औरंगजेब के बारे में बहुतायत जानकारी दी गयी है लेकिन चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक, शिवाजी और राणा प्रताप जैसे योद्धाओं का जिक्र कम ही आता है। ऐसा जानबूझकर किया गया। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेÞकर ने समयोचित टिप्पणी की, जो गौर करने लायक है। उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस पाखंडी पार्टी है। टीपू सुल्तान ने हिंदुओं और ईसाइयों की हत्या की। मंदिर और गिरिजाघरों को गिराया।’ ऐसे में जनेऊधारी राहुल गांधी की चुप्पी बहुत कुछ कहती है।

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