छत्तीसगढ़ में गले नहीं उतर रही भाजपा की हार

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छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह की सरकार की पराजय विस्मित करने वाली है। लगातार पंद्रह वर्षों तक जन-विकास के कार्य करने और राज्य को डेढ़ सौ वर्षों की भूख से होने वाली अकाल मौतों से मुक्ति दिलाने के बावजूद भाजपा का हार जाना आसानी से लोगों के गले नहीं उतर पाया है। सारी स्थितियों को सम्यक विवेचन करने के बाद निष्कर्ष यही निकलता है कि अफसरशाही के भ्रष्टाचार और अहंकार ने आम आदमी को न केवल सरकार से विमुख कर दिया बल्कि उसे सबक सिखाने के लिए अनेक दिग्गज नेताओं को भी धूल चटा दी।

सन 2003 में जब बड़े बहुमत से भाजपा की सरकार बनी थी तो प्रदेश कंगाली का शिकार था। भुखमरी से होने वाली मौतों के लिए ओडिशा के कालाहांडी के बाद छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्रों का नाम मीडिया की सुर्खियों में उछला करता था। प्राय: प्रति वर्ष बस्तर एवं अन्य वनवासी बहुल क्षेत्रों में दूषित पेयजल के कारण बड़ी संख्या में होने वाली मौतों का मुद्दा संसद के दोनों सदनों में उठा करता था। इन दोनों अभिशापों से छत्तीसगढ़ को मुक्त कराने में भाजपा सरकार ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। एक रुपये किलो की दर से 35 लाख से अधिक परिवारों को प्रतिमाह 30 किलो चावल उपलब्ध कराने के निर्णय ने सरकार को राष्ट्रीय ख्याति दिलाई। छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की न केवल देश भर में सराहना हुई बल्कि अनेक राज्यों ने अपने विशेषज्ञों की टीम इस प्रणाली की सफलता का अध्ययन और उसके क्रियान्वयन के लिए रायपुर भेजी।

रमन सरकार ने नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के इस सिद्धांत को गंभीरता से समझा कि अकाल से होने वाली मौतों का मुख्य कारण यह होता था कि खाद्यान्न विपुलता में उपलब्ध होने के बावजूद लोग भूखे इसलिए मरते थे कि उनकी अन्न खरीद सकने की आर्थिक क्षमता नहीं होती थी। बहुत सस्ती दरों पर निर्धन परिवारों को दूरस्थ क्षेत्रों तक पर्याप्त अनाज पहुंचाने का जो कीर्तिमान भाजपा सरकार ने कायम किया, उसे विस्मृत नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार आर्थिक दृष्टि से कमजोर परिवारों को चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने में भी सरकार की सराहना हुई। वनोपज बीन कर आजीविका चलाने वाले आदिवासी परिवारों को पत्थरों और कांटों से बचाने के लिए जो महत्वकांक्षी चरण पादुका अभियान चलाया गया, उसने भी वनवासियों का मन जीतने में पर्याप्त सफलता हासिल की। लेकिन जब स्थानीय छुटभइये नेताओं और भ्रष्ट कर्मचारियों की मिलीभगत से दोनों जनहितैषी योजनाएं पटरी से उतरने लगीं तो तीसरे कार्यकाल में सरकार के विरुद्ध असंतोष का अंकुरण होने लगा।

चंद प्रभावशाली अफसरों के भ्रष्टाचार और अहंकार ने जनता को सरकार से विमुख करना शुरू कर दिया। इन अफसरों की चांडाल चौकड़ी ने मुख्यमंत्री की इस कदर घेरेबंदी करना शुरू कर दिया कि वह रμता- रμता जनता के साथ ही भाजपा के परंपरागत शुभचिंतकों से भी कटते चले गये। कुछ मंत्रियों के अलावा स्वंय को राज्य के नीति निर्माता कहने वाले चुनिंदा अफसरों के गुट ने जहां अकूत संपदा अर्जित की, वहीं सत्ता को जमीनी यथार्थ से रू-ब-रू नहीं होने दिया। उन हितैषियों को भी सरकार से दूर कर दिया, जिनकी 2003 से लगातार तीन बार भाजपा की सरकारें बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी। जनसंघ के समय जो परिवार पार्टी के लिए वातावरण बनाने में जुटे रहे थे, उन्होंने भी हाथ खींच लिए।

तीसरे कार्यकाल में डॉ.रमन सिंह सरकार की कुछ नीतिगत प्राथमिकताओं ने ग्रामीणों, गृहणियों और युवाशक्ति को आहत किया। लगातार पंद्रह वर्षों तक सत्ता में बने रहने के बावजूद राज्य सरकार सिंचाई के रकबे का अपेक्षा के अनुरूप विस्तार नहीं कर पाई। छत्तीसगढ़ का किसान आज भी मानसून की वर्षा पर निर्भर रहने को विवश है। कभी अल्पवृष्टि तो कभी अतिवृष्टि की मार उस पर रह रहकर पड़ती रहती है। आदिवासी क्षेत्रों में भी भ्रष्ट तंत्र और राजनीति ने विकास के लिए आवंटित धन में भरपूर सेंध लगाई।

नक्सलियों के विरुद्ध रमन सरकार ने सघन अभियान चलाए। उनमें सफलता भी मिली, लेकिन आदिवासी, पुलिस और नक्सलियों के दोनों के बीच पिसता हुआ लहूलुहान होता रहा। जिस बस्तर में दो चुनावों तक भाजपा को क्रमश: 11 और 10 सीटें मिली थी वहां 2013 में केवल 4 और इस बार सिर्फ एक ही सीट हासिल हो पाई। वहां की पूरी चौदह विधानसभा सीटों पर कांग्रेस कब्जा करने में सफल हो गई। सरकारी दुकानों से शराब बेचे जाने की नीति ने गृहणियों को बड़ी संख्या में भाजपा सरकार से विमुख कर दिया।

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