गुनहगार ‘निदान’

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बिहार के आश्रय गृहों की समस्या को लेकर सर्वोच्च न्यायालय भी बैठा नहीं रहा। इस मामले में दाखिल की गई याचिकाओं की सुनवाई करते हुए इसने मुजफ्फरपुर से लेकर बिहार के अन्य सभी मिलते जुलते मामले में जांच सीबीआई को सौंप दी है। हालांकि इस मामले की सूची में निदान संस्था शामिल नहीं है। 

माज को कलंकित व कलुषित करने वाली घटनाओं की जद में भारतीय प्रजातंत्र के अभ्युदय स्थल के रूप स्थापित बिहार का वैशाली भी है। ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक लिच्छवी वंश के साम्राज्यकाल में वहां शासनकर्ता का चयन कुछ कुलीनों द्वारा किया जाता था।
कहानी तो पुरानी है, ठीक उसी तरह जिस तरह लीची के लिए मशहूर बिहार का शहर मुजμफरपुर मानवता को तार-तार कर देने वाला आश्रयगृह यौन हिंसा की घटना का गवाह बना। लेकिन वैशाली जिला मुख्यालय हाजीपुर का सूत्रधार भी वही बिहार सरकार का समाज का कल्याण करने वाला समाज कल्याण विभाग है जिसके पटना में काम करने वाले कर्मी मुजμफरपुर मामले के अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर के एनजीओ सेवा संकल्प एवं विकास समिति को भिखारियों के लिए आश्रयगृह चलाने के लिए एक करोड़ की परियोजना हस्तगत करवा रहे थे। उसी वक्त बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग के लिए मुजμफरपुर में पदस्थापित सहायक निदेशक देवेश कुमार ठाकुर के खिलाफ थाने में प्राथमिकी दर्ज करवा रहे थे।

हाजीपुर के ‘निदान’ की कहानी भी मुजμफरपुर की यौन हिंसा के मामले से अलग नहीं है क्योंकि निदान की आर्थिक समस्या का निदान भी बिहार का वही सामाजिक कल्याण विभाग कर रहा था। जब यहां भी बात यौन हिंसा तक पहुंच गई तो पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की । तीन लोगों की गिरμतारी भी हुई। लेकिन अभी तक निदान के कर्ताधर्ता के खिलाफ किसी ने अंगुली नहीं उठाई। दस्तावेजी साक्ष्यों के मुताबिक निदान के कार्यकारी निदेशक अरविंद सिंह हैं। निदान का जाल देश भर में फैला है। हालांकि कांग्रेस पार्टी से भी उनकी शागिर्दी की चर्चा भी पटना के आम लोगों में है।
निदान की ओर से जारी एक स्मारिका के मुताबिक निदान एक मिशन है जो आम लोगों को सशक्त करने जैसे सामाजिक काम कर रही है। लेकिन इसके विपरित निदान की ओर से चलाई जा रही अल्पावासगृह के बारे में वहां रहने वाली फिजा (नाम बदला हुआ) कहती हैं कि गृह के कर्मियों का व्यवहार तो उनके प्रति ठीक है लेकिन डीपीएम सर जिनका नाम मनमोहन है, कार्तिक सर और प्रियंका दीदी का व्यवहार हम लोगों के साथ ठीक नहीं था। पिछले दो महीने से मनमोहन सर और प्रियंका दीदी जब भी अल्पावास गृह में आते थे तो मनमोहन सर अकेले में एक हॉल में बुलाते थे। वहां से बाकी लड़कियों को हटा देते थे और गलत नीयत से शरीर को सहलाते थे। वे हम लोगों को गलत नजर से देखते थे। उसी अल्पावास गृह में रहने वाली दिपाली कहती हैं कि डीपीएम सर अकेले में लड़कियों को ऊपर एक हॉल में बुलाते थे। वे बारी-बारी से लड़कियों को बुलाते थे और बाकी को वहां से हटा देते थे। उनके जाने के बाद लड़कियों को रोते देखा जाता था पर वे बताती नहीं थीं।

हिंसा संचिका के अवलोकन से पता चला कि बलिकागृह में रहने वाली कुछ महिलाएं वहां के हालात से तंग आकर भाग गई थीं। इस घटना को लेकर पुलिस में प्राथमिकी भी दर्ज की गई।

यहीं रहने वाली राजलक्ष्मी की कहानी तो अजीब ही है। वह चिल्ला रही हैं और कुछ पूछने पर कहती हंै कि सर दर्द हो रहा है, कोई दवाई मंगवा दिया जाए। अब कहने वाले तो कहेंगे ही कि इतना सब होते हुए भी सामाजिक समस्याओं की निदान का दम भरने वाली निदान क्या कर रही थी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। उक्त बयान लड़कियों ने हाजीपुर न्यायालय में दंड प्रक्रिया संहिता-164 के तहत दर्ज करवाई थी और इसके बाद मामले में आरोपियों की गिरμतारी की गई।
हालांकि वैशाली के जिलाधिकारी के आदेश पर इस मामले में अनुमंडल पदाधिकारी (हाजीपुर) की अध्यक्षता में बनाई गई जांच समिति के प्रतिवेदन में तो निदान के बारे में कुछ और ही बात कही गई है।
जिलाधिकारी के निर्देश पर अनुमंडल पदाधिकारी, अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी, जिला कल्याण पदाधिकारी, जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (आईसीडीएस) व सहायक निदेशक बाल संरक्षण ईकाई ने मिलकर अल्पावास गृह का निरीक्षण किया । निरीक्षण के क्रम में अल्पावास गृह की संचालक संस्था निदान के प्रतिनिधि राकेश त्रिपाठी (सीनियर प्रोग्राम मैनेजर) व प्रमोद सिंह (प्रोग्राम मैनेजर) तथा अल्पावास गृह (वैशाली) की प्रशिक्षण सह पुनर्वास पदाधिकारी करुणा कुमारी भी उपस्थित थीं। अल्पावास गृह के दैनिक कार्यों के संचालन की जिम्मेदारी करुणा कुमारी की होती है। वह एक प्रकार से केयर टेकर की भूमिका में हैं। जांच प्रतिवेदन के इस हिस्से में स्पष्ट किया गया है कि अल्पावास गृह के संचालन में निदान की अहम भूमिका थी। लेकिन निदान के खिलाफ जांच या कार्रवाई क्यों नहीं की गई, यह किसी की समझ से परे है।
निरीक्षण के उपरांत की गई टिप्पणी में कहा गया है कि अल्पावास गृह में निदान संस्था की एक अन्य परियोजना ‘संचय’ का भी संचालन किया जाता है। इस परियोजना से संबंधित कर्मचारी एवं अन्य व्यक्ति भी अल्पावास गृह में बेरोक-टोक जाते आते रहते हैं। लाख टके का सवाल है कि जब राकेश त्रिपाठी ने इस संवाददाता को इस मुद्दे पर सिर्फ गोल-गोल घुमाने का काम किया। उक्त निरीक्षण प्रतिवेदन में आगे कहा गया है कि अल्पावास गृह का संचालन वर्ष-2016 से किया जा रहा है। अल्पावास गृह के संचालन हेतु प्रत्येक वर्ष अल्पावास गृह की सहभागी संस्था निदान तथा इसके कर्मियों का अनुबंध नवीनीकरण जिला पदाधिकारी की अनुशंसा पर महिला विकास निगम (बिहार सरकार) द्वारा किया जाता रहा है। संचिका के अवलोकन से ज्ञात होता है कि तत्कालीन जिला पदाधिकारी द्वारा 22 जून 2017 को ही वित्तीय वर्ष-2016-2017 हेतु संस्था एवं इसके कर्मियों के अनुबंध नवीनीकरण से संबंधित प्रस्ताव पर संस्था के कार्यों को असंतोषजनक पाते हुए उसको तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त करने का आदेश दिया गया था। संस्था के कर्मियों को सेवा विस्तार की अनुमति प्रदान नहीं की गई थी। कहने की जरूरत नहीं है कि निदान मन मर्जी और अवैध रूप से अल्पावास गृह के संचालन को अंजाम देता रहा।
प्रतिवेदन में निदान की हठधर्मी को स्पष्ट करते हुए आगे कहा गया है कि जिला पदाधिकारी के आदेश के बावजूद निदान संस्था के द्वारा ही वर्तमान समय तक अल्पावास गृह का संचालन किया जाता रहा तथा सभी कर्मी भी कार्यरत हैं। संस्था को कार्यमुक्त किए जाने के जिला पदाधिकारी के स्पष्ट आदेश तथा अनुंबध समाप्ति के पश्चात दो वित्तीय वर्ष बीत जाने के बावजूद अल्पावास गृह का संचालन निदान तथा इसके कर्मियों के द्वारा किया जाना घोर अश्चर्यजनक तथा गंभीर चिंता का विषय है।
अल्पावास गृह के संचालन के प्रमुख उद्देश्य को भी प्रतिवेदन में स्पष्ट किया गया है। इसमें चर्चा की गई है कि अल्पावास गृह का मुख्य उद्देश्य परिवार एवं समाज में घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, ‘ऊमेन ट्रैफिकिंग, दहेज अथवा अन्य कारणों से प्रताड़ित महिलाओं की समस्याओं के निराकरण करना है। लेकिन निदान की मनमर्जी का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।
बिहार के आश्रय गृहों की समस्या को लेकर देश का सर्वोच्च न्यायालय भी बैठा नहीं रहा। इस मामले में दाखिल की गई याचिकाओं की सुनवाई करते हुए इसने मुजμफरपुर से लेकर बिहार के अन्य सभी मिलते जुलते मामले में जांच सीबीआई को सौंप दी है। हालांकि इस मामले की सूची में निदान संस्था शामिल नहीं है।
जबकि अगर परिस्थितियों पर गौर किया जाए तो निदान के हालात मुजμफरपुर से भी बदतर बने हुए थे। उक्त जांच प्रतिवेदन में ही कहा गया है कि संचिका के अवलोकन से पता चला कि बलिकागृह में रहने वाली कुछ महिलाएं वहां के हालात से तंग आकर भाग गई थीं। इस घटना को लेकर पुलिस में प्राथमिकी भी दर्ज की गई। प्रशिक्षण-सह-पुनर्वास पदाधिकारी की ओर से प्राथमिकी की छायाप्रति भी उपलब्ध करवाई गई लेकिन उन संवासिनियों के मौजूदा स्थिति को लेकर कोई संतोषजनक उत्तर निदान की ओर से नहीं दिया गया।

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