कैंसर की दवा पर परीक्षण

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कैंसर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बीमारी है। पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ताजी रिपोर्ट ने सभी के माथे पर चिंता की लकीरों को और भी गहरा दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार कैंसर के इस साल एक करोड़ 80 लाख नये मामले सामने आ सकते हैं और इनमें से 96 लाख लोगों की इस कारण से मौत हो सकती है। यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बीमारी है। कैंसर पर शोध करने वाली डब्ल्यूएचओ की विशेषज्ञ संस्था आइएआरसी की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर पांच में एक पुरुष को कैंसर हो रहा है जबकि महिलाओं के मामले में यह अनुपात हर छह में से एक है।

भारत में 2018 में कैंसर के महिलाओं के 5,87,249 और पुरुषों के 5,70,045 नये मामले आने की संभावना है। इसमें से 7,84,821 लोगों की मौत हो सकती है। उधर भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के ताजे शोध के अनुसार केरल, कर्नाटक, असम, मिजोरम, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड में कैंसर के सबसे ज्यादा मरीज सामने आ रहे हैं दुनिया में जिस तेजी से यह रोग बढ़ रहा है, उसी तेजी के साथ इससे निपटने के उपाय किये जा रहे हैं। पर इसका उपचार अभी इतना महंगा है कि विकासशील देशों के रोगी उसे वहन नहीं कर सकते हैं। भारत में वैकल्पिक चिकित्सा के क्षेत्र में काम करने वाली एक अग्रणी संस्था डीएस रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने कैंसर रोगियों के लिए एक सस्ती औषधि बनायी है। इसका परीक्षण भी किया जा चुका है।

कोलकाता के जाधवपुर विश्वविद्यालय के नैदानिक अनुसंधान केन्द्र (सीआरसी) के निदेशक डॉ. टी.के. चटर्जी के अनुसार- ‘डीएस रिसर्च सेंटर की पोषक ऊर्जा से तैयार की गई औषधि सर्वपिष्टी के पशुओं पर किये गये परीक्षण के परिणाम उत्साहजनक पाये गये हैं। यदि पशुओं के शरीर पर सर्वपिष्टी का प्रयोग किये जाने के बाद सीआरसी ने उत्साहजनक परिणाम प्राप्त किये हैं तो ऐसे ही परिणाम इसे मानव शरीर पर प्रयोग करने से भी प्राप्त किये जा सकते हैं, जो कैंसर उपचार के इतिहास में युगान्तकारी घटना होगी। सीआरसी विभिन्न रोगों के लिए दवाइयों का नैदानिक परीक्षण करता है। इसी सिलसिले में उन्होंने सर्वपिष्टी का भी नैदानिक परीक्षण किया था। किसी दवाई की प्रभावकारिता का स्तर सुनिश्चित करने के लिए सामान्यत: दो प्रकार का परीक्षण किया जाता है- पहला, औषधीय (फार्माकोलॉजिकल) परीक्षण और दूसरा, विष विद्या सम्बन्धी (टाक्सीकोलॉजिकल) परीक्षण। ये परीक्षण आयातित सफेद चूहों पर किये गये। पशु शरीर में कैंसर कोशिकाओं को प्रविष्ट कराया गया और जब ट्यूमर निर्मित हो गया, तब हमने दवा देना शुरू किया। ‘पोषक ऊर्जा’ के परीक्षण की स्थिति में 14 दिनों बाद जो प्रतिक्रियायें देखी गयीं, उनमें कोशिकाओं की संख्या स्पष्ट रूप से कम होना शुरू हो गई थी। पशु शरीर में कोई अल्सर पैदा नहीं हुआ।

ट्यूमर विकास दर 46 प्रतिशत तक कम हो गई थी और दवाई की विषाक्तता लगभग शून्य थी। ऐसे सकारात्मक परिणाम हाल के समय में नहीं देखे गये थे। इस औषधि में कैंसर को रोकने और उससे लड़ने की अपरिमित संभावनाएं हैं।’ वर्ष 982 में सेंटर ने कैंसर की औषधि तैयार की। इस औषधि के परीक्षण के लिए प्रारम्भ से ही नीति बनी कि केवल ऐसे रोगियों की तलाश की जाए जिन्हें अस्पताली चिकित्सा के धर्मकांटे ने चिकित्सा के लिए अयोग्य मानकर अन्तिम रूप से छोड़ दिया हो। खोजबीन करके इस तरह के रोगियों तक पोषक ऊर्जा की खुराकें पहुंचायी जाने लगीं। उन्हें यह भी कह दिया गया कि अपने कष्टों के निवारण के लिए और स्वास्थ्य के विकास के लिए जो भी औषधियां वे लेते रहे हैं उन्हें लेते रहें। सेंटर के वैज्ञानिक डॉ. उमाशंकर तिवारी के निर्देशन में परीक्षण अभियान शुरू हुआ। अन्तत: औषधि की सफलता और उसके प्रभाव-परिणाम की सकारात्मकता, रोगियों के अपने अनुभवों तक सीमित नहीं रही, वह जांच रिपोर्टों से भी प्रमाणित हुई और पारम्परिक चिकित्सा के वर्तमान सूत्रपातों को अक्सर विस्मित भी करती रही। डॉ. चटर्जी के परीक्षण से यह साबित हो गया है कि यह औषधि कैंसर रोगियों के लिए बहुत कारगर है। इस सफलता की सूचना केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री के साथ ही डब्ल्यूएचओ को भेजी गई है। अब तक 926 रोगियों की सूचना डब्ल्यूएचओ को उनके सभी विवरण और उपचार प्रलेखों के साथ तीन चरणों में भेजी गई है। सूची में उन रोगियों के नाम शामिल हैं जो कभी मस्तिष्क, अग्नाशय, यकृत, रक्त, गर्भाशय, स्तन लगभग सभी प्रकारों के कैंसर से पीड़ित रह चुके हैं- और अब सामान्य और स्वस्थ जिंदगी जी रहे हैं।

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