कीमत पर ‘कन्फयूज’ राहुल

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राफेल सौदा तय प्रक्रिया के तहत हुआ है। कहीं कोई अनियमितता नहीं बरती गई है। सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में सरकार ने यही कहा है। इस मसले को लेकर विवाद काफी समय से चल रहा है। कई लोगों ने इस बाबत कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। कोर्ट ने सरकार से मूल्य तय करने की प्रक्रिया मांगी थी। सरकार ने गोपनीयता का हवाला देते हुए जानकारी देने से मना कर दिया था। तब कोर्ट ने सरकार को हलफनामा दायर करने का आदेश दिया था। इस मसले में सबसे बड़ा विवाद मूल्य को लेकर है। वह तब है जबकि सब कुछ बाहर आ चुका है।

रक्षा विशेषज्ञ निखिल गोखले अपनी किताब में लिखते हैं कि मुझे राफेल की फाइल देखने का मौका मिला। यह 2012-13 की बात है। फाइल में राफेल की कीमत 1.75 लाख करोड़ थी। यह बस राफेल की कीमत थी। उसमें रख-रखाव जैसे अन्य खर्च शामिल नहीं थे। उन्होंने राफेल सौदे की खरीद से जुड़े मसले पर विस्तार से लिखा है। उन्होंने बताया कि हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को लेकर दासॉल्ट आश्वस्त नहीं था। इससे तब कि रक्षा मंत्री एके एंटनी खासे परेशान थे। कीमत भी एक मसला बन चुका था। इसलिए एंटनी ने राफेल सौदे की फाइल वापस मंगा ली थी। हालांकि यह बात तब सामने नहीं आई थी। पर तत्कालीन रक्षा मंत्री इस बात का संकेत जरूर दे रहे थे कि राफेल सौदे में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। सबसे बड़ी अड़चन कीमत को लेकर फंसी थी। इसका जिक्र उस दौर की तमाम खबरो में आया है। जनवरी 2014 में डीएनए ने एक खबर की थी। उसमें लिखा है कि 2012 में जब राफेल खरीदने की बात तय हो गई थी तब यह सौदा 90 हजार करोड़ रुपये का हो गया था।

राफेल सौदा तय प्रक्रिया के तहत हुआ है। कहीं कोई अनियमितता नहीं बरती गई है। सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में सरकार ने यही कहा है।

जनवरी 2014 में वह बढकर दो लाख करोड़ रुपये पहुंच गया था। मतलब यह हुआ कि जो सौदा 2007 में 10 बिलियन डालर का था, वह जनवरी 2014 तक 30 बिलियन डालर का हो गया था। राफेल की कीमत को लेकर इंस्टीट्यूट आॅफ पीस एंड कांफिलिक्ट स्टडी ने 2012 में एक शोध रिपोर्ट छापी थी। पत्रकार अभिजीत मित्रा ने इसे तैयार किया था। उसमें कीमत के खेल पर विस्तार से चर्चा की गई थी। उसने फ्रेंच सीनेट के हवाले से लिखा गया था कि प्रति राफेल की कीमत 1,550 करोड़ रुपये से कम नहीं होगी। यह बात 2012 में साफ हो गई थी कि राफेल की कीमत कितनी होने वाली है। बावजूद इसके राफेल की कीमत को लेकर राजनीति हो रही है। राहुल गांधी का अलग आरोप है। उनका दावा है कि कतर और मिस्र से भी ज्यादा कीमत पर सरकार ने राफेल खरीदा है। उनका दूसरा आरोप यह है कि सरकार कीमत नहीं बता रही है। राहुल गांधी या तो झूठ बोल रहे हैं या फिर उन्हें जानकारी नहीं है।

सरकार सदन में कई बार राफेल की कीमत बता चुकी है। रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे कई बार सदन के पटल पर राफेल की कीमत बता चुके हैं। राफेल की कीमत महज 670 करोड़ रुपये हैं। वे आगे कहते हैं कि इसमें हथियार और भारतीय परिपेक्ष्य में जो बदलाव होने है, उसकी कीमत शामिल नहीं है। जहां तक कतर और मिस्र ने जो विमान खरीदा है, उससे तुलना की बात है तो इसके बारे में भी राहुल गांधी के पास जानकारी नहीं है। इकोनामिक्स टाइम्स की खबर के मुताबिक कतर ने प्रति राफेल 2200 करोड़ रुपये अदा किया है, वही मिस्र ने 1800 करोड़ रुपये अदा किया। इसके विपरीत अगर भारत की बात करें तो उसने महज 1600 करोड़ रुपये एक राफेल की कीमत चुकाई है। इस हिसाब से भारत ने कतर और मिस्र की तुलना में बेहद सस्ता विमान खरीदा है। लेकिन राहुल गांधी को इसकी खबर नहीं है। राफेल के मामले में उनका गणित गड़बड़ा गया है।

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