किसान आंदोलनों की गूंज

उन्हें क्या पता था कि आजादी के 71 साल बाद भी भारतीय किसानों की दशा में खास सुधार नहीं होगा। किसान पहले महाजनों और सूदखोरों के चंगुल में थे तो अब बैंकों के। विभिन्न सरकारों द्वारा खुद को किसान हितैषी होने के दावे के बाद भारतीय किसानों पर लगभग 13 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। यह कर्ज उन्हें किसी भी तरह से जीने नहीं दे रहा है। इसीलिए किसान आत्महत्या कर रहे हैं। सड़क पर भी उतर रहे हैं। मोदी सरकार ने ही पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस केहर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच को बताया था कि देश में हर साल लगभग 12 हजार किसान आर्थिक तंगी और कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या कर रहे हैं। सरकार के लिए ही नहीं, किसी देश के लिए भी यह शर्म की बात है कि उसके अन्नदाता लोगों के पालन में खुद की जिंदगी की आहुति दे रहे हैं।

किसान भी जानते हैं कि आत्महत्या उनकी समस्या का समाधान नहीं है। फसल का लागत मूल्य और उपज के लिए आवश्यक संसाधन अगर मिल जाए तो उनकी नारकीय जिंदगी खुशहाली में बदल सकती है, लेकिन ये दो चीजें नहीं हो पा रही हैं। संसाधन का टोटा लगातार बना हुआ है और लागत-लाभ का मूल्य उन्हें कोई देने को तैयार नहीं है। लागत की गणना का आधार त्रुटिपूर्ण है तो समर्थन मूल्य की घोषणा के बावजूद उनकी उपज को समय पर खरीद कर उन्हें पैसा देने की व्यवस्था दुरुस्त नहीं है, जबकि राज्य हो या केंद्र की सरकार, पार्टी कोई भी हो, सबका दावा है कि उन्होंने किसानों की समस्या को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। एनडीए सरकार ने अपने गठन के पहले दिन ही किसानों को खुशहाल बनाने का संकल्प दिखाया। प्रधानमंत्री मोदी ने जब अपने कार्यालय में पहला दिन गांधी की प्रतिमा बिठाकर राजकाज शुरू किया तो उनके मन में किसानों को कर्ज के भंवर से निकालने का प्रण था और उन्होंने एक के बाद एक किसान-हित में कई फैसले भी लिए, किसानों की माली हालत भी सुधरी लेकिन उतनी नहीं जितनी सुधरनी चाहिए थी। भारतीय किसानों की कर्ज चुकाने की क्षमता दिन प्रति दिन कम होती जा रही है।

केंद्र सरकार के लिए किसान हित सर्वोपरि

2022 तक देशभर के किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य को हासिल करने के लिए मोदी सरकार कृषि के साथ-साथ पशुधन, डेयरी, पॉल्ट्री और मत्स्य पालन को भी खूब प्रोत्साहन दे रही है। वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार केंद्र सरकार ग्रामीण और कृषि क्षेत्र पर 2,90,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। किसानों को समर्पित मोदी सरकार की कुछ खास योजनाएं।

सॉयल हेल्थ कार्ड

प्रधानमंत्री कृषि कौशल योजना

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना

नीम कोटेड यूरिया,

खाद सब्सिडी का सीधे खाते में भुगतान

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना

किसानों को सस्ता कृषि कर्ज

कृषि एप की लांचिंग

ई-कृषि मंडी

ई- पशुहाट

आर्गेनिक खेती को बढ़ावा

किसानों के लिए बिजली की अलग फीडर लाइन

पीएम सहज बिजली हर घर योजना

कृषि उत्पाद और पशुधन विपणन (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम 2017 लागू

देश में दालों और तिलहनों की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य के ऊपर खरीफ 2017-18 के लिए बोनस की घोषणा

रिजर्व बैंक के आकड़ों को देखें तो पता चलता है कि वर्ष 2017 में कृषि क्षेत्र को दिये गये कुल कर्ज में से 60 हजार करोड़ का कर्ज एनपीए हो चुका है। यानी इतने रुपये के कृषि ऋण गैर निष्पादित संपत्ति घोषित हो चुका है। जबकि वर्ष 2012 से 2017 तक में यह आकड़ा 24 हजार करोड़ रुपये का था। एनपीए घोषित कृषि कर्ज कुल एनपीए का सिर्फ साढ़े आठ प्रतिशत है। देश का कुल बैंकिग एनपीए 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक का है। भारतीय किसान उन उद्योगपतियों की तरह नहीं है कि कर्ज लेकर चंपत हो जाए। उनका कर्ज उनकी जिंदगी के लिए एक फांस की तरह है जिससे निकलने के लिए या तो वे अपनी जिंदगी को ही समाप्त कर रहे हैं या फिर संघर्ष पर उतारू हो रहे हैं। और संघर्ष भी किससे ? सरकार से, बीमार व्यवस्था से और उनकी समस्या के प्रति मूक बधिर की तरह पेश आने वाली अफसरशाही से। यदि यह कहें कि वर्ष 2018 किसान आंदोलन वर्ष रहा तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। नवंबर के अंत में दिल्ली में किसानों का एक विशाल प्रदर्शन हुआ। देश के लभगभग सभी राज्यों के किसान रामलीला मैदान में इकट्ठा हुए।

अपनी तकलीफ बताने और सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए अलग अलग तरह से प्रदर्शन किया। तमिलनाडु के किसान नंगे बदन हाथों में मानव खोपड़ी लेकर मार्च में भाग लिया तो मध्य प्रदेश की दो बहनें हाथों में तख्ती लेकर यह बताया कि कर्ज से परेशान होकर उनके पिता ने आत्म हत्या कर ली और अब उनके पास जीविका के लिए कुछ नहीं। गुजरात और मध्य प्रदेश के आदिवासी लोगों को यह समझाते रहे कि किस तरह पानी के बिना उनका जीवन नरक बना हुआ है। दिल्ली ही नहीं, किसानों ने देश के हर भाग से अपनी आवाज उठाई, मार्च किया, विरोध प्रदर्शन किया।

जेल भी गए और गोलियां भी खाई। शुरुआत मध्य प्रदेश के मंदसौर से हुई जहां उग्र किसान आंदोलन पर पुलिस ने फायरिंग की और इसमें पांच किसान मारे गए। वहां की शिवराज सरकार ने ‘भावांतर योजना’ शुरू की लेकिन बिचौलियों के कारण वह प्रभाव नहीं छोड़ सकी। महाराष्ट्र में भी किसान उद्वेलित हुए। मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस मुंबई आये किसानों के पास खुद चल कर गए और उनकी मांगें मानी। किसान शांति पूर्वक लौट गए। लेकिन कर्नाटक में किसानों की मांग पर वहां जेडीएस और कांग्रेस की सरकार ने कोई कान नहीं दिया। मजबूरन हजारों किसान पिछले महीने बेंगलूरू में जमा हुए। गन्ना का समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग की और चुनाव के दौरान कर्ज माफी के लिए किए गए वायदे को पूरा करने की याद दिलाई तो मुख्यमंत्री कुमार स्वामी ने किसानों को गुंडा करार दिया और दमनात्मक कर्रवाई की। यही हाल पंजाब में भी रहा। किसानों ने बकाया गन्ना मूल्य के भुगतान के लिए सरकार की काफी मिन्नतें की लेकिन जब उनकी बात नहीं सुनी गई तो फिर किसानों ने दौसा के पास रेल पटरी जाम कर दी।

एक दिन में 71 ट्रेनों को रूट बदलना पड़ा। किसान नाहक नहीं, उद्वेलित हो रहे हैं, उनकी समस्या वाकई विकराल होती जा रही है। इस कारण वह खेती छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं। इसका असर भारत की विकास दर पर भी हो रहा है। इस वर्ष कृषि विकास दर सिर्फ ढाई प्रतिशत रही है। अनाज उत्पादन में तो सिर्फ आधे प्रतिशत की वृद्धि हुई है। लेकिन विडंबना देखिए, अर्थशास्त्र का नियम कहता है कि उत्पादन कम होेने पर कीमत बढ़ती है, लेकिन किसानों के मामले में परिणाम इसका उल्टा हो रहा है। आलू उत्पादक मूल्य न मिलने के कारण आलू सड़कों पर फेंक कर जा रहे हैं, प्याज और लहसुन उत्पादक अपनी उपज नाले में गल रहे हैं। कुछ किसानों ने विरोध स्वरूप बिके प्याज की राशि प्रधानमंत्री को भेज दी, क्योंकि इतनी कम कीमत मिली कि उस राशि से कुछ कर ही नहीं सकते। देश के 79 फीसदी किसान तो छोटी जोत और सीमांत किसान की श्रेणी में हैं जिनकी खेती का सबसे प्राथमिक लक्ष्य अपना भरण पोषण करना है।

14 फीसद किसानों के पास तो अपनी भूमि ही नहीं है। किसानों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो इन हालत में खेती बाड़ी छोड़कर शहरों में मजदूरी करना ज्यादा पसंद कर रही है। सीएसडीएस ने हाल ही में देश के 18 राज्यों के 137 जिलों और 274 गांवों में सर्वेक्षण कर बताया कि 62 प्रतिशत छोटे किसान यदि कोई दूसरा जीविका का साधन मिले तो किसानी छोड़ने के लिए तैयार हैं। ऐसे में अगर किसानों की हालत सुधारनी है तो छोटी जोत के किसानों को केंद्र में रखकर नीतियां बनानी होंगी। 

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