कांग्रेस पूर्वोत्तर से पूरी तरह बाहर

0
57

मिजोरम विधानसभा चुनाव में मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) को बड़ी जीत मिली। पिछले चुनावों में 40 में से 34 सीटें जीतने वाली कांग्रेस इस चुनाव में पांच सीटों पर ही सिमट कर रह गई। मुख्यमंत्री लाल थनहावला दो स्थानों से उम्मीदवार थे। दो स्थानों से हार गये। इसी के साथ पूर्वोत्तर से कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया हो गया। दरअसल 10 वर्षों के कांग्रेस शासनकाल में राज्य का विकास ठप रहा। एक तो राज्य सरकार के पास आय के सीमित संसाधन हैं, ऊपर से भ्रष्टाचार का बोलबाला रहा। दूसरी ओर केंद्र सरकार द्वारा उपलब्ध करवाए गए धन इसलिए खर्च नहीं किए गए क्योंकि राज्य सरकार का हिस्सा खर्च करने में लालथनहावला सरकार असमर्थ रही।

जो भी केंद्रीय योजना मद के धन मिजोरम सरकार द्वारा खर्च किए गए- उन खर्चों का सही हिसाब केंद्र सरकार के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। वजह से केंद्र सरकार द्वारा अगली किस्तें आवंटित नहीं की गई। यह वजह थी कि राज्य में चाहे सड़कों की स्थिति हो या अन्य आधारभूत ढांचे सभी जर्जर हो चुके थे। दुर्गम पहाड़ों पर बसे इस राज्य के लोगों के समक्ष आवागमन की बड़ी समस्या इस दौरान पैदा हो गई। राज्य की सभी सड़कें खस्ताहाल अवस्था में होने की वजह से छोटी सी दूरी तय करने में भी काफी वक्त लग जाता है। कांग्रेस ने ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया जिनको राज्य की जनता ने लंबे समय तक देखा है। जिनके पास न तो विकास का कोई स्पष्ट विजन था और न ही उनके तौर तरीके जनता को रास आने वाले थे।

कांग्रेस ने अधिकांश उम्मीदवार रिटायर्ड लोगों को बनाए। और तो और 80 वर्षीय मुख्यमंत्री के उम्मीदवार लालथनहावला के उम्र दराज होने का मुद्दा भी चुनाव के दौरान काफी गरमाया रहा। कांग्रेस की सरकार द्वारा शराब से प्रतिबंध हटा लेने को भी चुनाव में जमकर उछाला गया। ऐसा दर्शाया गया कि कांग्रेस शराब को खुली छूट देकर मिजोरम की पीढ़ी दर पीढ़ी को बर्बाद कर रही है। शराब का मुद्दा चुनाव के दौरान अपने पूरे शबाब पर रहा। राज्य में बिजली की घोर किल्लत भी कांग्रेस के भविष्य को अंधकार की ओर ले जाने का एक कारण बनी।

कांग्रेस अपने घोषणापत्र में किसी स्पष्ट योजना का खाका जनता के सामने प्रस्तुत नहीं कर सकी। पार्टी द्वारा नई आर्थिक विकास नीति, न्यू लैंड यूज पॉलिसी, छात्रों में लैपटॉप बांटने, बेघरों को घर देने, हेल्थ केयर स्कीम, नशा मुक्ति एवं पुनर्वास की योजना, आपदा प्रबंधन, खेल के लिए आधारभूत ढांचा विकसित करने, तकनीकी शिक्षण संस्थान खोलने, सोलर पावर प्लांट लगाने, टूरिज्म डेवलपमेंट, पत्रकारों के कल्याण की योजनाएं लाने जैसे कई सब्जबाग घोषणा पत्र के दौरान दिखाए गए। लेकिन, मतदाताओं के मन में यह स्पष्ट सवाल कौंधता रहा कि 10 वर्षों के शासनकाल में आखिर कांग्रेस ने यह सब क्यों नहीं किया? राज्य की जनता जहां कांग्रेस से सत्ता वापस लेना चाह रही थी। वहीं, एमएनएफ जनता की दुखती रगों को सहला रही थी।

एमएनएफ का आर्थिक आत्मनिर्भरता एवं मिजो अस्मिता का नारा मतदाताओं को खूब रास आया। एमएनएफ प्रमुख तथा राज्य के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके जोरमथंगा ने जहां खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता के साथ ही मिजो जनजाति की भावना से जुड़े चकमा एवं रियांग से संबंधित मुद्दों के स्थायी समाधान करने का स्पष्ट कार्यक्रम प्रस्तुत किया। यहां तक कि एनजीओ कोआॅर्डिनेशन कमिटी एवं यंग मिजो एसोसिएशन के फरमान के अनुसार एमएनएफ ने चकमा बहुल सीट पर अपने उम्मीदवार भी सबसे बाद में खड़े किए। एमएनएफ ने कांग्रेस के सभी वादों की पोल इस प्रकार खोलने में सफल रही कि कांग्रेस चारों खाने चित हो गयी। इसका सीधा लाभ एमएनएफ को मिला। उसने शराब पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का भी वादा किया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here