कांग्रेस के ‘सज्जन’

सज्जन (सिर्फ नाम का) को नए साल की पहली सुबह का सूरज जेल से देखना होगा। 34 साल से वह इस कैद से बचता फिर रहा था। वह भी एक साधारण अपराध के लिए नहीं, भीषण नरसंहार के मुख्य गुनहगार के रूप में कुख्यात होने के बावजूद। सिर्फ इसलिए कि उसे कांग्रेस का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। वह कांग्रेस का बड़ा नेता था। उसने कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या पर निर्दोष सिखों को मौत के घाट उतारने को आतुर भीड़ का नेतृत्व किया था। इसलिए न्यायाधीश ने सजा सुनाते हुए देश विभाजन के बाद 84 के दंगों को सबसे बड़ा नरसंहार बताया। साफ कहा कि जांच एजेंसियों ने राजनीतिक कारणों से मुख्य गुनहगार के खिलाफ मामले को कमजोर किया। इसलिए जब सज्जन कुमार को सजा सुनाई जा रही थी तो पीड़ित पक्ष के वकील एच.एस.फूल्का रो पड़े। सजा सुनाते हुए उस भीषण नरसंहार को याद कर न्यायाधीश की आंखें भी नम हो आईं, आवाज भर्रा गई। न्यायालय परिसर में जमा पीड़ित महिलाएं तो फूट-फूट कर रो पड़ीं। उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि 84 के सबसे बड़े खलनायक को उम्र कैद की सजा होते वे देख पाएंगी।
17 दिसम्बर को आए इस ऐतिहासिक फैसले ने सिखों की टूटती उम्मीदों और न्याय व्यवस्था से दरकते विश्वास को नई मजबूती दी है। सिखों के खिलाफ कांग्रेस के सुनियोजित नरसंहार के सबसे बड़े प्रतीक को अंतिम सांस तक जेल में रखने की सजा के एलान ने सिख समुदाय के जख्मों पर मरहम लगाने का काम किया है। हालांकि यह उनके लिए काफी नहीं है। वे सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को फांसी की सजा होते देखना चाहते हैं। उनकी सूची में अगला नाम कमलनाथ का भी है, जो सजा सुनाए जाने वाले दिन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे। इसलिए सिख समाज का गुस्सा उस गांधी परिवार से भी है, जो इन सब हत्यारों को संरक्षण देता रहा है, दे रहा है। यहां तक कि सज्जन कुमार भी सजा सुनाए जाने तक कांग्रेस के सदस्य थे। सजा सुनाए जाने के बाद ही उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता से त्यागपत्र दिया।

पीड़ित सिख समाज को 1984 के सबसे बड़े गुनहगारों में से एक सज्जन कुमार को उसके पाप की सजा दिलाने में 34 साल लग गए। यह इतना लंबा समय है कि उस दंगे की आग में झुलसे और अपनों को खो चुके बच्चे अब जवान हो गए और कुछ जवानी की दहलीज लांघ चुके हैं। यह भी एक संयोग है कि उसी दौर में बच्चे से जवां हुए राहुल गांधी उसी दिन तीन राज्यों में मिली चुनावी सफलता के लिए कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के सिर पर सेहरा बांध रहे थे। इधर 34 साल पहले कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की करतूतों के लिए सजा सुनाई जा रही थी। सजा सुनाते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि वह मानवता के खिलाफ अपराध था। न्यायाधीश मुरलीधर की यह टिप्पणी उस पूरे दौर की तस्वीर सामने लाती है- यह आजादी के बाद की सबसे बड़ी हिंसा थी। इस दौरान पूरा तंत्र फेल हो गया था। यह हिंसा राजनीतिक फायदे के लिए करवाई गई थी। आरोपित राजनीतिक संरक्षण का फायदा उठाकर सुनवाई से बच निकले।
इसलिए सवाल कांग्रेस पर ही है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सबसे बड़ा राजनीतिक फायदा उसके बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी को ही मिला

जुझारू जगदीश कौर को सलाम!
दिल्ली हाईकोर्ट ने सज्जन कुमार के साथ छह लोगों को सजा सुनाई। साथ ही न्यायाधीश- एस. मुरलीधर और विनोद गोयल ने जगदीश कौर को भी सलाम किया जिन्होंने अपने परिवार के पांच लोगों के कत्ल के मुकदमे की लगातार पैरवी की। इस बीच कांग्रेस सरकार और दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने जगदीश कौर के खिलाफ ही झूठे मामले बनाये, जेल भेजा, भरपूर उत्पीड़न किया, लेकिन वे जरा भी विचलित नहीं हुईं। उन्हीं के कारण सज्जन कुमार को इस साल के आखिरी दिन यानी सोमवार (31 दिसंबर) तक न्यायालय के सामने आत्मसमर्पण करना है। सर्वोच्च न्यायालय ने सजा बहाल रखी तो जीवन के अंतिम दिन तक उन्हें जेल काटनी पड़ेगी। हाईकोर्ट के इस फैसले से यह भी साफ हुआ कि दिल्ली पुलिस का दामन भी सिख दंगे के खून से सना है। एक नंवबर 1984 को राजनगर गुरूद्वारे पर पुलिस आती है, सभी सिखों से उनके कृपाण आदि ले लेती है। इसके बाद पुलिस उन सिखों को सज्जन कुमार के साथी बलवान खोखर और महेन्द्र यादव के साथ चल रही भीड़ को सौंप कर चली जाती है। सज्जन कुमार खुद एक सभा में यह कहता सुनाई दिया था- इंदिरा गांधी को सरदारों ने मारा। हमारी मां को मारा। इसके बाद महेंद्र यादव और बलवान खोखर ने किस तरह कत्लेआम मचाया, उसका दर्दनाक वर्णन भी मर्माहत कर सकता है। न्यायालय ने निचली अदालत से बरी कर दिए गए सज्जन कुमार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई तो पूर्व कांग्रेस विधायक महेन्द्र यादव और किशन खोखर की तीन साल की सजा को बढ़ाकर 10 साल कर दिया। इसी के साथ कांगे्रसी पार्षद बलबान खोखर, कैप्टन भागमल और गिरधारी लाल को आजीवन कारावास की सजा को भी बहाल रखा।

था। उस राजनीतिक लाभ के लिए वे सिखों के नरसंहार को भी भुला बैठे। श्रीमती इंदिरा गांधी की मौत के बाद इंडिया गेट पर हुई शांति सभा में उनका एक विशेष वाक्य कांग्रेस और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की अमानवीयता का पूरा काला अध्याय सामने लाता है। राजीव गांधी ने तब कहा था- ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो आसपास की कुछ धरती हिल ही जाती है।’ दिल्ली की सड़कों पर लगभग 3000 सिखों और देश भर में कुल मिलाकर 3500 के आसपास हुई सिखों की निर्मम हत्या उन्हें बस थोड़ी सी धरती हिलना जैसा लगा था। हिंसा के वे दृश्य भी इतना दर्दनाक थे कि मानवता छोड़िए, दानवता भी एक क्षण के लिए कराह उठी। गले में टायर पड़े जिंदा जलते और सड़क पर भागते लोगों के दृश्यों की अनदेखी आखिर कोई कैसे कर सकता था। पर अपनी मां की हत्या से उपजी सहानूभुति को भुनाने के लिए उन्होंने तत्काल चुनाव भी करा लिए थे। तब दिल्ली की सड़कों पर घूमने वाले आटो में कांग्रेसियों ने वे पोस्टर भी लगाए थे, जिनमें पगड़ी पहने आटो चालक को आतंकवादी बताते हुए पूछा जाता था- कहीं आप किसी आतंकवादी के साथ तो नहीं। उस उन्माद के दौर में ही राजीव गांधी ने भारतीय राजनीति के इतिहास का सबसे बड़ा जनादेश प्राप्त किया था।

सज्जन कुमार के खिलाफ आया यह फैसला लंबी सुरंग में दूर दिखाई दे रही एक टिमटिमाती रोशनी की तरह है। यह सिर्फ पालम की राजनगर कालोनी में हुए एक सिख परिवार के पांच लोगों के कत्लेआम से जुड़ा है। इससे पहले मामला कब दर्ज हुआ, कितनी बार दर्ज हुआ, कैसे खारिज हुआ, कब नया आयोग बना और कब सीबीआई जांच के लिए दिया गया, यह एक अलग इतिहास है। सच यह है कि कांग्रेसी शासनकाल में किसी भी बड़े कांग्रेसी दंगाई के खिलाफ कोई मामला ही दर्ज नहीं हुआ। दर्ज भी हुआ तो जांच एजेंसियों को कोई सुबूत ही नहीं मिला। जबकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही कांग्रेसियों द्वारा प्रायोजित सिख विरोधी दंगों में अकेले दिल्ली में तब 2733 सिख मारे गए थे। मारे जाने वालों में 85 साल के बूढ़े से लेकर दो साल के बच्चे तक थे। सिख दंगों को लेकर कई अदालतों में मामले अब तक चल रहे हंै। कुछ तो बंद भी कर दिए गए लेकिन कई अभी भी चल रहे हैं। उनमें से एक मुकदमा जगदीश टाइटलर के खिलाफ भी है। वही टाइटलर जो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बहुत करीबी हुआ करते थे और इंदिरा गांधी के प्यादे।

84 के उस सिख विरोधी दंगों की सच्चाई किसी को आज भी देखनी हो तो गुरुद्वारा रकाबगंज जाए। वहां एक पूरी दीवार पर उस नरसंहार की तस्वीरें लगाई गई हैं। जिस पर लिखा है सच की दीवार। यहां हर साल एक नंवबर से तीन नवंबर तक पाठ होता है और उस दंगे में मरे हुए लोगों की आत्मा की शांति के लिए अरदास की जाती है। सज्जन को सजा मिलने के बाद कांग्रेस में से पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ही थे जिन्होंने स्वागत किया। यह भी उनकी राजनीतिक मजबूरी थी। इससे पहले इसी साल उन्होंने पंजाब विधानसभा में कहा था ‘दंगों के दौरान मैं गुरुद्वारा रकाबगंज में पीड़ितों से मिला। कई लोग डरे-सहमे थे और कुछ बोल तक नहीं पा रहे थे। मैंने तब कुछ लोगों से बात की और उन्होंने चार-पांच लोगों का नाम लिया, जिनमें एचकेएल भगत, सज्जन कुमार, अर्जुन दास और धर्मदास शास्त्री शामिल थे।’ बड़ी बात यह कि कैप्टन अमरिंदर बड़ी साफगोई से अपने मित्र जगदीश टाइटलर का नाम लेना भूल गए। इन सब कांग्रेसियों का नाम गिनाने के बाद पंजाब के सरदार मुख्यमंत्री ने सदन में कहा कि इन लोगों की भूमिका थी, कांग्रेस की नहीं। आजाद भारत में हुए सबसे बड़े नरसंहार और एक देशभक्त समाज के खिलाफ कांग्रेसियों की हिंसा का इससे ज्यादा मजाक और क्या उड़ाया जा सकता था? पर न्यायालय ने साफ कर दिया। वह हिंसा सुनियोजित थी। राजनीतिक साजिश का हिस्सा थी। अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। अपराधी मुक्त नहीं रहे। कांग्रेस भी कभी उस महापाप से मुक्त नहीं हो पाएगी।

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